Wednesday, June 13, 2012

अल्पसंख्यक कोटे पर रोक से शीर्ष अदालत का इंकार

अल्पसंख्यक कोटे पर रोक से शीर्ष अदालत का इंकार

Wednesday, 13 June 2012 13:58

नयी दिल्ली, 13 जून (एजेंसी) धर्म के नाम पर अल्पसंख्यकों को 4.5 फीसदी उप कोटा दिए जाने को लेकर सरकार के कदम पर सवाल उठाया।

उच्चतम न्यायालय ने आज आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगाने से इंकार कर दिया जिसके तहत उक्त उप कोटे के प्रावधान को रद्द कर दिया गया है।

न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति जे एस खेहड़ की पीठ ने कहा ''हमारा इरादा स्थगन जारी करने का नहीं है।''
इसके साथ ही पीठ ने उस याचिकाकर्ता को नोटिस जारी किए जिसकी जनहित याचिका पर आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय ने, आईआईटी जैसे कें्रदीय शैक्षिक संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग के 27 फीसदी आरक्षण में से अल्पसंख्यकों को 4.5 फीसदी उप कोटा दिए जाने के प्रावधान को रद्द कर दिया था।
पीठ के समक्ष कें्रदीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने वह दस्तावेज पेश किए जिनके आधार पर उसने उप कोटा बनाया था। पीठ ने सवाल किया ''क्या आप धर्म के आधार पर वर्गीकरण कर सकते हैं?''
पीठ ने यह भी कहा कि 22 दिसंबर 2011 को उप कोटा के मुद्दे पर जारी कार्यालय ज्ञापन :ऑफिस मेमोरेंडम: को विधायी समर्थन प्रापत नहीं था।
अन्य पिछड़ा वर्ग के 27 फीसदी आरक्षण में अल्पसंख्यकों को 4.5 फीसदी उप कोटा मुहैया कराने के गणित पर सवाल उठाते हुए पीठ ने सरकार से जानना चाहा कि क्या इसके लिए कोई संवैधानिक या वैधानिक समर्थन है।

पीठ ने कहा ''हम पूछ रहे हैं कि क्या 4.5 फीसदी उप कोटे को संवैधानिक या वैधानिक समर्थन था या नहीं।''
इसके बाद पीठ ने कहा ''दूसरा सवाल है कि क्या कार्यालय ज्ञापन को संवैधानिक या वैधानिक समर्थन था या नहीं।''
अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल गौरव बनर्जी ने उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाने पर विचार करने का आग्रह करते हुए कहा कि आईआईटी के लिए काउंसलिंग जारी है। उनका कहना था कि आईआईटी के 325 प्रतिभागियों का चयन अल्पसंख्यकों के लिए 4.5 फीसदी उप कोटे के तहत ही किया गया है।

बहरहाल, पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाने का उसका इरादा नहीं है। पीठ के अनुसार, अल्पसंख्यकों के 27 फीसदी आरक्षण में से उप कोटा तय किए जाने के गणित में अस्पष्टता है।
पीठ की राय थी कि अल्पसंख्यकों के उपकोटे का असर अन्य पिछड़ा वर्ग पर पड़ेगा।
न्यायालय ने एक बार फिर उप कोटा तय करते समय वैधानिक निकायों जैसे राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग :एनसीएम: और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग :एनसीबीसी: से परामर्श न करने पर सवाल उठाया।
पीठ ने कहा ''आपने एनसीएम और एनसीबीसी की उपेक्षा क्यों की। ये दोनों सर्वाधिक महत्वपूर्ण वैधानिक निकाय हैं।''
इससे पहले, न्यायाधीशों ने गौरव बनर्जी से कहा कि उसके समक्ष पेश किए गए यं  दस्तावेज उच्च न्यायालय में पेश कियं जाने चाहिए थे ।
बनर्जी ने कहा कि उच्च न्यायालय को लग रहा था कि यह उप कोटा सभी अल्पसंख्यकों के लिए है। इस पर पीठ ने कहा ''ऐसा इसलिए, क्योंकि यह बात कार्यालय ज्ञापन में थी।''
उन्होंने कहा कि बौद्ध और पारसी जैसे सभी धार्मिक अल्पसंख्यक 4.5 फीसदी उप  कोटे की सूची में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि धार्मिक अल्पसंख्यकों में अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण प्राप्त है लेकिन 4.5 फीसदी उप कोटा मुसलमानों के या ईसाई धर्म ग्रहण करने वालों के निचले रैंक को दिया गया है।
बनर्जी ने कहा कि 4.5 फीसदी उप कोटे के लिए अल्पसंख्यकों में अन्य पिछड़ा वर्ग की पहचान के लिए पहला आधार यह था वह सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े हों तथा धार्मिक अल्पसंख्यक हों।
इस पर पीठ ने कहा ''यही मुश्किल है। आप यह आकलन किस तरह कर सकते हैं?''
केंद्र ने कल ही उच्चतम न्यायालय के समक्ष वह ''प्रासंगिक'' सामग्री और दस्तावेज पेश किए थे जिनके आधार पर उसने 4.5 फीसदी उप कोटा तय किया था।
उच्चतम न्यायालय ने 11 जून को मानव संसाधन विकास मंत्रालय से अपने समक्ष यह सामग्री और दस्तावेज पेश करने को कहा था।

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