Sunday, June 10, 2012

मूल्‍यांकन की दृष्टि से मंटो को दुबारा पढ़े जाने की है जरूरत : नामवर सिंह

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Written by News Desk Category: [LINK=/index.php/dekhsunpadh]खेल-सिनेमा-संगीत-साहित्य-रंगमंच-कला-लोक[/LINK] Published on 10 June 2012 [LINK=/index.php/component/mailto/?tmpl=component&template=youmagazine&link=fa17488854c86eb6de38e5045aa0f911413966cf][IMG]/templates/youmagazine/images/system/emailButton.png[/IMG][/LINK] [LINK=/index.php/dekhsunpadh/1554-2012-06-10-09-06-18?tmpl=component&print=1&layout=default&page=][IMG]/templates/youmagazine/images/system/printButton.png[/IMG][/LINK]
: [B]मंटो की जन्‍मशती समारोह में विमर्श करने जुटे साहित्यिक दिग्‍गज[/B] : इलाहाबाद : शहर इलाहाबाद और यहां की अदबी रवायत व गंगा-जमुनी तहज़ीब के लिए आज का दिन यादगार बन गया क्‍योंकि विभाजन की त्रासदी, स्‍त्री विषयक मुद्दों पर बेवाकी से कलम चलाने वाले कथाकार सआदत हसन मंटो के विचारों को जीवंत कर दिया हिंदी के नामचीन साहित्‍यकारों ने। अवसर था महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के इलाहाबाद क्षेत्रीय केंद्र व हिन्‍दुस्‍तानी एकेडमी के संयुक्‍त तत्‍वावधान में आयोजित 'मंटो एकाग्र' पर दो दिवसीय (09-10 जून) जन्‍मशती समारोह का। मंटो के विचारों के बहाने, उनकी कहानी खोल दो, काली शलवार, ठंडा गोश्‍त, नंगी आवाजें, धुआं सहित विभाजन की त्रासदी, स्‍त्री-पुरूषों संबंधों पर बेवाक् चर्चाएं होती रहीं।

 

वर्धा विश्‍वविद्यालय द्वारा 'बीसवीं सदी का अर्थ : जन्‍मशती का संदर्भ' श्रृंखला के अंतर्गत आठवें कार्यक्रम के तहत 'मंटो एकाग्र' समारोह के उदघाटन सत्र की अध्‍यक्षता करते हुए विश्‍वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो.नामवर सिंह बोले, समाज में जो घटित होता था मंटो वही लिखते थे। वे दकियानूसी समाज से ऊपर की बात करते थे-खासकर स्‍त्री पुरूष संबंधों पर। उनके लिखे पांच कहानियों पर अश्‍लीलता के आरोप में मुकदमे चले। उस समय उसने जो कुछ लिखा, वह वर्तमान समय में लिखता तो उसपर अश्‍लीलता का आरोप नहीं लगता। मंटो उनमें से नहीं था जिनकी लेखनी तो पाक साफ होती किंतु वैयक्तिक जीवन तो ईश्‍वर ही जाने। मंटो को मूल्‍यांकन की दृष्टि से दुबारा पढ़े जाने की जरूरत है।

नया ज्ञानोदय के संपादक रवीन्‍द्र कालिया ने कहा कि मंटो में एक शरारती जज्‍बा था जिसके चलते वह अपनी कहानियों का शीर्षक विवादित रखते थे। बंटवारे के समय पाकिस्‍तान जाते समय मंटो ने अपने फिल्‍म इंडस्‍ट्री के मित्र गोप और अशोक के साथ पाकिस्‍तान और हिन्‍दुस्‍तान जिंदाबाद के नारे लगाए थे। उन्‍होंने कहा कि हिंदी में कई गोर्की मिल जाएंगें। सभी अपने-अपने गोर्की तलाश लेते हैं। हिंदी में कोई मंटो नहीं हैं, उर्दू में भी दूसरे नहीं हैं। कहा जाता है कि वह वेश्‍यागामी था ऐसा बिल्‍कुल नहीं है, बस उनपर लिखने में उनका मन लगता था, केवल लोगों में उसको लेकर भ्रम है अपने परिवार के साथ बीबी बच्‍चों से उसके लगाव इस बात के सबूत हैं। बंटवारे के समय मंटो के पाकिस्‍तान चले जाने पर उन्‍होंने अफसोस जताया।

बतौर विशिष्‍ट वक्‍ता कुलपति विभूति नारायण राय बोले, कई बार कई बड़े फैसले थोड़े से भावुक क्षण में ले लिये जाते हैं, मंटो का पाकिस्‍तान जाने का फैसला भी कुछ ऐसा ही था। मंटो समाज के घृणात्‍मक पक्ष को बड़े बेबाकी से अपने लेखन में लाते थे, समाज में उसकी क्‍या प्रतिक्रिया होगी उसकी वे परवाह नहीं करते थे। प्रगतिशील लेखक संघ से दुराव था। उस समय के प्रगतिशील खांचे में वो बंधने को तैयार नहीं थे। यह भी सच है कि उनका सही मूल्‍यांकन प्रगतिवादी ही कर सकते हैं।

लखनऊ के आबिद सुहैल ने कहा कि यात्रा ही सआदत हसन से मंटो हो जाने तक की यात्रा थी। मुंबई में ही उन्‍हें फिल्‍मों से दौलत भी मिला और वहां की गरीबी व स्त्रियों की खासकर वेश्‍याओं की विवशताओं एवं मनोदशाओं-विविध परिस्थितियों से परिचय मिला। उन्‍हें खरीददारी व दोस्‍तों में दौलत खर्च करने की आदत थी। उन्‍होंने एक नये खांचे में रखकर सआदत और मंटो को दो रूपों में देखने का प्रयास किया। संचालन प्रो.ए.ए.फातमी ने किया तथा प्रो. संतोष भदौरिया ने आभार व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि वर्धा विश्‍वविद्यालय द्वारा बीसवी सदी का अर्थ और जन्‍मशती का संदर्भ श्रृंखला के तहत यह आठवां आयोजन है। चार आयोजन उपेन्‍द्र नाथ अश्‍क, फैज अहमद फैज, भुवनेश्‍वर और मंटो का कार्यक्रम संगम नगरी में हुआ। नागार्जुन को पटना में और केदारनाथ अग्रवाल को बांदा में याद करने के लिए हम सभी इकट्ठा हुए थे। उन्‍होंने कहा कि यह सभागार छोटा पड़ गया पर यहां के साहित्‍य प्रमियों का दिल बड़ा है। संगम नगरी के साहित्‍य प्रेमी बड़ी संख्‍या में उपस्थित थे।

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