Friday, August 25, 2017

रवींद्र का दलित विमर्श -10 नियति से अभिसार का सच और भारत तीर्थ का हश्र ईश्वर और धर्म के नाम अपराधियों का तांडव,देश में न संविधान है और कानून का राज विशुद्धता के नाम पर ,धर्म के नाम पर देशभक्ति का कारोबार और धर्म कर्म के नाम पर सत्ता में शामिल होकर कारपोरेट मुनाफा कमाने वाले कटकटेला अंधियारे के कारोबारी भगवा ब्रिगेड का भारत की संस्कृति,भारत की धार्मिक विरासत और भारत के इतिहास के खिलाफ

रवींद्र का दलित विमर्श -10

नियति से अभिसार का सच और भारत तीर्थ का हश्र ईश्वर और धर्म के नाम अपराधियों का तांडव,देश में न संविधान है और कानून का राज

विशुद्धता के नाम पर ,धर्म के नाम पर देशभक्ति का कारोबार और धर्म कर्म के नाम पर सत्ता में शामिल होकर कारपोरेट मुनाफा कमाने वाले कटकटेला अंधियारे के कारोबारी भगवा ब्रिगेड का भारत की संस्कृति,भारत की धार्मिक विरासत और भारत के इतिहास के खिलाफ,हिंदू धर्म के खिलाफ और मनुष्यता के खिलाफ भारत की नियति से बलात्कार है।भारत माता की जयजयकार करते हुए,वंदे मातरम गाते हुए देश की हत्या का यह युद्ध अपराध है।

धर्म के नाम सांप्रदायिक तौर पर विभाजित देश के मानस का यह हाल है कि सैकडो़ं बच्चों के आक्सीजन के बिना तड़पकर मर जाने के बाद,प्राकृतिक आपदाओं के शिकार लाखों लोगों के चरम संकट के बीच सिरे से तटस्थ है लेकिन धर्म कर्म के नाम पर अपराधी राम रहीम के नाम पर हुजूम के हुजूम लोग अपने ही धर्म,भाषा और क्षेत्र के लोगों को मारने और खुद मरने को उतारु है।

जिन लोगों ने गांधी की हत्या कर दी,रवींद्र को निषिद्ध किया,जो लोग ब्रिटिश हुकूमत का साथ दे रहे थे,जो लोग गुजरात नरसंहार और सिखों के कत्लेआम,असम और पूर्वोत्तर में नरसंहार को अंजाम दे रहे थे,वे ही हमारे भाग्यविधाता हैं और हमारी साधु संतों,गुरुओं,फकीरों,बाउलों की महान पंरपरा के खिलाफ भगवा चोला पहनकर धर्म की कारपोरेट कंपनियों के तमाम मैनेजर बने अपराधी तत्व देश में अमन चैन की फिजां को जहरीली बना रहे हैं और हम लोग खामोश तमाशबीन है।


पलाश विश्वास

बेहद जल्दी में लिख रहा हूं और टाइपिंग में वर्तनी व्याकरण की गलतियां हो सकती है।हम आज रवींद्र पर अपनी चर्चा को थोड़ी विलंबित करने की सोच रहे थे।क्योंकि अभीतक वह संवाद शुरु नहीं हो सका है,जो हमारा मकसद है।

कल ही हमने भारत के भविष्य की चर्चा की चर्चा करते हुए रवींद्र के निबंध सभ्यता के संकट और डा.अमर्त्य सेन के रवींद्र और गांधी के संवाद के परिप्रेक्ष्य में भारत की परिकल्पना के बारे में नोबेल डाटआर्ग की चर्चा की थी,जिसे आज अमलेंदु ने वीडियों पर पढ़कर सुनाया और हम इसे अहिंदी भाषी पाठकों तक शेयर करने में लगे थे।आज रवींद्र साहित्य से हमने कुछ शेयर नहीं किया है।लेकिन रवींद्र के भारत के भविष्य को लेकर जो अंदेशा था और सत्ता हस्तातंरण के भारत के भविष्य के सांप्रदाटिक रुप में अंध राष्ट्रवाद के तहत खंडित राष्ट्रीयता को लेकर जो आतंक के चित्र हैं,वे हरियाणा,राजधानी नई दिल्ली और पंजाब में खुलकर सामने आ गये हैं।

अंग्रेजी हुकूमत के अंत पर स्वतंत्रता की मध्यरात्रि को भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने जो ट्रिस्ट विद डेस्टिनी का विश्वविख्यात भाषण में नियति के साथ अभिसार के कथानक के साथ नये भारत के निर्माण का संकल्प किया था,सीधे स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय जनता की ऐतिहासिक जीत की लड़ाई का नेतृत्व करते हुए संविधान सभा में पहुंचे हमारे पुरखों ने नये भारत का संविधान रचते हुए भारत की विविधता,बहुलता और सहिष्णुता के मानव धम्म की प्रस्तावना के साथ समता और न्याय पर आधारित जो भारत बनाने का संकल्प किया था,प्रार्थना सभा में गांधी की हत्या के बाद भारत विभाजन के होलोकास्ट की पृष्ठभूमि में आत्मघाती गृहयुद्ध का वह नजारा आर्यावर्त के प्राचीन भूगोल और महाभारत के इंद्रप्रस्थ को केंद्रित बेलगाम हिंसा के उत्सव में दोबारा देखने को मजबूर हैं।

अदालती फैसले के बाद बलात्कार के आरोप में दोषी पाये गये एक राम रहीम गुरु के चेलों ने कानून अपने हाथ में ले लिया है और पंजाब की कांग्रेस सरकार,नई दिल्ली में आप की सरकार के बावजूद कानून और व्यवस्था,पुलिस प्रशासन के लिए सीधे जिम्मेदार केंद्र सरकार और इस हिंसा के तांडव के एपिसेंटर हरियाणा की संघी सरकार  हिंसा की आशंका और कानून व्यवस्था अमन चैन बनाये रखने के लिए फैसले से पहले जो चेतावनी जारी की है,उसके विपरीत धर्म के नाम सीधे सड़कों पर उतरकर जिस तरह से बेगुनाह आम जनता पर हमले करके अब तक मिली खबरों के मुताबिक कम से कम 30 लोगों को मौत के घाट उतार दिया है,वह भारत की नियति का सच है जो बाबाओं और बाबियों के हवाले हैं।

विशुद्धता के नाम पर ,धर्म के नाम पर देशभक्ति का कारोबार और धर्म कर्म के नाम पर सत्ता में शामिल होकर कारपोरेट मुनाफा कमाने वाले कटकटेला अंधियारे के कारोबारी भगवा ब्रिगेड का भारत की संस्कृति,भारत की धार्मिक विरासत और भारत के इतिहास के खिलाफ,हिंदू धर्म के खिलाफ और मनुष्यता के खिलाफ भारत की नियति से बलात्कार है।

भारत माता की जयजयकार करते हुए,वंदे मातरम गाते हुए देश की हत्या का यह युद्ध अपराध है।

धर्म के नाम सांप्रदायिक तौर पर विभाजित देश के मानस का यह हाल है कि सैकडो़ं बच्चों के आक्सीजन के बिना तड़पकर मर जाने के बाद,प्राकृतिक आपदाओं के शिकार लाखों लोगों के चरम संकट के बीच सिरे से तटस्थ है लेकिन धर्म कर्म के नाम पर अपराधी राम रहीम के नाम पर हुजूम के हुजूम लोग अपने ही धर्म,भाषा और क्षेत्र के लोगों को मारने और खुद मरने को उतारु है।

यही रवींद्र के भारत तीर्थ की नियति है और धर्म की राजनीति का हश्र यही है।ईश्वर और धर्म के नाम खुलेआम कत्लेआम करने वाले और संवैधानिक पदों से उनका बचाव करने वाले गुजरात नरसंहार संस्कृति के कातिलों के हावले हमने भारत का भविष्य छोड़ दिया है।

सत्ता हस्तातंरण के बाद भारत का भविष्य क्या होगा,इसके लिए सिर्फ गांधी,अंबेडकर और रवींद्र ही चिंतित नहीं थे,भारतीय बहुजन समाज के दलितों,पिछड़ों,आदिवासियों, अल्पसंख्यकों को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान फासीवादी नाजी ताकतों के सांप्रदायिक मंसूबे से यही अंदेशा था।

महात्मा ज्योतिबा फूले और गुरुचांद ठाकुर को आशंका थी कि सत्ता हस्तातंरण के बाद पूरे देश पर नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व कायम हो जायेगा और ब्रिटिश हुकूमत के दौरान उन्हें मिले हकहकूक छिन जायेंगे।

हूबहू वही हो रहा है लेकिन बहुसंख्य बहुजन जनता का समूचा नेतृत्व उसी नस्ली सत्तावर्ग में शामिल है और बहुजन बहुसंख्य जनता धर्म और राष्ट्रवाद के नाम पर उनकी पैदल सेना में तब्दील है।

मंडल कमीशन की रपट लागू होने के बाद कमंडल की राजनीति के तहत मंदिर मस्जिद विवाद के तहत देश का धर्मांध ध्रूवीकरण रवींद्र का सभ्यता का संकट है तो मंडल कमीशन के मुताबिक पिछड़ों को जनसंख्या के मुताबिक अवसर देने के कार्यभार के तहत पिछड़ों की गिनती अभी तक नहीं हुई है और नस्ली विषमता की राजनीति के तहत नस्ली फासिज्म का राजकाज पिछड़ों को फिर तीन भागों में बांटने पर आमादा है।

समता और न्याय के लक्ष्यों का यह त्रासद अंत है और कोई पूछने वाला नहीं है कि संविधान का क्या हुआ,कानून के राज का क्या हुआ,क्याइसके लिए चीन,अमेरिका,इजराइल या पाकिस्तान जिम्मेदार हैं।

अदालती फैसले बेमतलब हो गये हैं।सुविधा के मुताबिक अपराधियों और युद्ध अपराधियों को फिर कत्लेआम के लिए खुल् ला छोड़ा जा जा रहा है।

निजता का मौलिक अधिकार को मान्यता मिल गयी है लेकिन फिर भी सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करते हुए आधार परियोजना लागू करके आम जनता के कत्लेआम का कारपोरेट हिंदुत्व का एजंडा लागू है।

जिन लोगों ने गांधी की हत्या कर दी,जो लोग ब्रिटिश हुकूमत का साथ दे रहे थे,जो लोग गुजरात नरसंहार और सिखों के कत्लेआम,असम और पूर्वोत्तर में नरसंहार को अंजाम दे रहे थे,वे ही हमारे भाग्यविधाता हैं और हमारी साधु संतों,गुरुओं,फकीरों,बाउलों की महान पंरपरा के खिलाफ भगवा चोला पहनकर धर्म की कारपोरेट कंपनियों के तमाम मैनेजर बने अपराधी तत्व देश में अमन चैन की फिजां को जहरीली बना रहे हैं और हम लोग खामोश तमाशबीन है।


Thursday, August 24, 2017

रवींद्र का दलित विमर्श- नौ रवींद्र अपने जीवन में भारत के भविष्य को लेकर इतने चिंतित क्यों थे? खंडित राष्ट्रीयता,विभाजन की नियति और फासीवाद की दस्तक इसकी मुख्य वजहें हैं। पुरखों के भारतवर्ष की हत्या कर रहा है डिजिटल हिंदू कारपोरेट सैन्य राष्ट्र! पलाश विश्वास

रवींद्र का दलित विमर्श- नौ

रवींद्र अपने जीवन में भारत के भविष्य को लेकर इतने चिंतित क्यों थे?

खंडित राष्ट्रीयता,विभाजन की नियति और फासीवाद की दस्तक इसकी मुख्य वजहें हैं।

पुरखों के भारतवर्ष की हत्या कर रहा है डिजिटल हिंदू कारपोरेट सैन्य राष्ट्र!

पलाश विश्वास

हमने समकालीन ज्वलंत सवालों के संदर्भ में रवींद्र के दलित विमर्श पर संवाद का प्रस्ताव रखा था।इसी सिलसिले में रवींद्र की भारत परिकल्पना की आज चर्चा कर रहे हैं।इसी सिलसिले में निराधार आधार पर आधारित कारपोरेट डिजिटल हिंदू राष्ट्र की चर्चा जरुरी है जो हमारे पुरखों के भारत वर्ष की हत्या कर रहा है।

निजता का अधिकार  मौलिक अधिकार है,सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला है।अब इस फैसले से पहले नागरिकों के शरीर पर नागरिकों के हक न होने का हलफनामा दायर करने वाली भारत सरकार का दावा है कि यह फैसला उसके नजरिये के मुताबिक है।इसका सीधा मतलब है कि निजता को मौलिक अधिकार मान लिये जाने के बावजूद आधार परियोजना के तहत नागरिकों के निजता के अधिकार का हनन करते हुए उनके निजी तथ्यों को कारपोरेट कंपनियों को शेयर करने का सिलसिला रुकने वाला नहीं है।क्योंकि यह गैरजरुरी जनसंख्या के सफाये के नरसंहारी एजंडा है जिसके मार्फत अर्थव्यवस्था और राष्ट्रव्यवस्था पर नस्ली वर्चस्व बहाल रखकर जीवन के हर क्षेत्र में नस्ली रंगभेद के तहत दलितों,पिछड़ों,आदिवासियों,गैर नस्ली और विधर्मी समुदायों,किसानों,मेहनतकशों के बहिस्कार और निगरानी की योजना है।

नागरिकों की न निगरानी न सिर्फ राष्ट्र कर रहा है बल्कि देशी विदेशी निजी कंपनियां और दुनियाभर के आपराधिक माफिया गिरोह को भी नागरिकों की निजी जानकारियां दी जा रही हैं क्योंकि जरुरी सेवाओं के लिए आधार की अनिवार्यता की वजह से गैरसरकारी अज्ञात तत्वों के हवाले नागरिकों के आधार तथ्य के साथ साथ उनकी उंगलियों की छाप भी हैं जिससे साइबर जालसाजी से लेकर जान माल का गंबीर खतरा भी है क्योंकि नागरिकों की क्रयशक्ति के आधार पर बैंक बैलेंस और चल अचल संपत्ति की जानकारियां भी निजी कंपनियों के साथ साथ अज्ञात और आपराधिक तत्वों तक शेयर करने की अनिवार्यता है।

मोबाइल,फोन,मेल के जरिये क्रेडिट कार्ड,बैंक लोन और खरीददारी के तमाम आफर इन्हीं तथ्यों के आधार पर नागरिकों को चौबीसों घंटे थोकभाव से मिल रहे हैं क्योंकि मोबाइल और गैस कनेक्शन से लेकर यात्रा टिकट तक आधार की अनिवार्यता है।आधार परियोजान जारी रहा तो निजता का अधिकार का कोई मतलब नहीं है।

इस सिलसिले में हम लगातार चर्चा करते रहे हैं और आप हस्तक्षेप के पुराने आलेखों को पढ़ सकते हैं।

अब सवाल यह है कि कारपोरेट फंडिंग से चलने वाली राजनीति क्या कारपोरेट नस्ली  वर्चस्व के डिजिटल इंडिया के खिलाफ नागरिकों के मौलिक अधिकारों के हक में खड़े होने की हिम्मत करेंगी क्योंकि राजनीति ने अभी तक इसका विरोध नहीं किया है क्योंकि सत्ता वर्ग की राजनीति दरअसल नस्ली वर्चस्व की राजनीति है और वह अन्याय,असमानता,उत्पीड़न,अत्याचार,बेदखली और नरसंहार संस्कृति के समर्थन में खड़ी है।उसके तमाम तर्क भी अंध राष्ट्रवाद और सैन्य हिंदू राष्ट्र के वर्ण वर्ग वर्चस्व के हित में हैं।

गौरतलब है कि एक बेहद अहम फैसले के तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार, यानी राइट टू प्राइवेसी को मौलिक अधिकारों, यानी फन्डामेंटल राइट्स का हिस्सा करार दिया है। नौ जजों की संविधान पीठ ने 1954 और 1962 में दिए गए फैसलों को पलटते हुए कहा कि राइट टू प्राइवेसी मौलिक अधिकारों के अंतर्गत प्रदत्त जीवन के अधिकार का ही हिस्सा है। राइट टू प्राइवेसी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आती है। अब  लोगों की निजी जानकारी सार्वजनिक नहीं होगी। हालांकि आधार को योजनाओं से जोड़ने पर सुनवाई आधार बेंच करेगी। इसमें 5 जज होंगे।

रवींद्रनाथ ने 7 अगस्त,1941 को अपनी मृत्यु से पहले 14 मई,1941 को शांतिनिकेतन में पढ़े अपने निबंध सभ्यता के संकट में भारतीय मानस के सांप्रदायिक ध्रूवीकरण के आधार पर फासीवादी राष्ट्रवाद के खिलाफ चेतावनी दे गये।इस निबंध के पहले ही वाक्य में खंडित भारतीय राष्ट्रीयता का चित्र इस तरह प्रस्तुत किया हैः

আজ আমার বয়স আশি বৎসর পূর্ণ হল, আমার জীবনক্ষেত্রের বিস্তীর্ণতা আজ আমার সম্মুখে প্রসারিত। পূর্বতম দিগন্তে যে জীবন আরম্ভ হয়েছিল তার দৃশ্য অপর প্রান্ত থেকে নিঃসক্ত দৃষ্টিতে দেখতে পাচ্ছি এবং অনুভব করতে পারছি যে, আমার জীবনের এবং সমস্ত দেশের মনোবৃত্তির পরিণতি দ্বিখণ্ডিত হয়ে গেছে, সেই বিচ্ছিন্নতার মধ্যে গভীর দুঃখের কারণ আছে।

(अनुवादःआज मेरे जीवन के अस्सी साल पूरे हो गये,मेरे जीवनक्षेत्र की विस्तीर्णता आज मेरे सामने प्रसारित है।पूर्वतम दिगंत पर जिस जीवन का आरंभ हुआ,उसके दृश्य दूसरे सिरे से निःसक्त दृष्टि से देख रहा हूं और मुझे इसका अनुभव हो रहा है कि मेरे जीवन और समूचे देश की मानसिकता द्विखंडित हो गयी है और इस विभाजन में दुःख के कारण है।)

रवींद्रनाथ की यह चेतावनी भारत विभाजन की भी चेतावनी है क्योंकि खंडित राष्ट्रीयता की नियति अंततः विभाजन की त्रासदी है।वे इस सच को जानचुके थे कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का अंत दूर नहीं है और इससे भय़ंकर सछ उनके सामने शायद यह था कि जिस भारतवर्ष की परिकल्पना वे बना रहे थे,सत्ता हस्तातंरण के बाद वह भारत धर्म और राष्ट्रवाद के शिकंजे में सभ्यता के संकट का पर्याय बनने वाला है।हम बार बार यह निवेदन कर रहे हैं कि हमारा लिखा कोई शोध प्रबंध नहीं है और न यह किसी प्रकाशन के माध्यम से कहीं प्रकाशित होने वाला है। यह सोशल मीडिया पर रवींद्र के दलित विमर्श पर एक संवाद है,जिसकी अपनी सीमा है।हम विस्तार से संदर्भ और प्रसंग के साथ बातें रख नहीं सकते।इसलिए संदर्भ संबंधी नेट पर उपलब्ध सारी सामग्री मूल पाठ और वीडियो अलग से शेयर कर रहे हैं।उन्हें देखे बिना इस संवाद में शामिल होना मुश्किल है।

आज हमने सभ्यता के संकट का मूल बांग्ला पाठ शेयर किया है और इसका हिंदी अनुवाद मुझे नेट पर मिला नहीं है।कोलकाता के आलोचक अरुण माहेश्वरी ने दिल्ली में रवींद्रनाथ पर 2011 में आयोजित राष्ट्रीय सेमीनार में इस निबंध के अंतिम हिस्से का अनुवाद अपने वक्तव्य में शामिल किया है और वह वक्तव्य जनपक्ष में प्रकाशित हुआ है।संवाद के इस क्रम में अंत में वह हिस्सा हम दे रहे हैं।

इस निबंध में बारत की आजादी के बाद की स्थितियों के बारे में उन्होंने जो आशंका जतायी है,वह उनके जीवन काल में ही भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान फासीवादी नाजीवादी शक्तियों के धार्मिक राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक राजनीति के उथल पुथल परिदृश्य के संदर्भ में है,यह समझना मुश्किल नहीं है क्योंकि वे खंडित राष्ट्रीयता की बात शुरु में ही उसी तरह कर रहे हैं जैसे कि संविधान सभा में अपने पहले भाषण में बाबासाहेब भीमराव अबेडकर ने आपस में लड़ रहे कैंप के हवाले खंडित राष्ट्रीयता की बात की है।

रवींद्र ने भारती की स्वतंत्रता की भविष्यवाणी करते हुए जो अंदेशा जताया है,वर्तमान चुनौतियां उसी को सही साबित करती हैं।रवींद्र ने लिखा हैः

ভাগ্যচক্রের পরিবর্তনের দ্বারা একদিন না একদিন ইংরেজকে এই ভারতসাম্রাজ্য ত্যাগ করে যেতে হবে। কিন্তু কোন্‌ ভারতবর্ষকে সে পিছনে ত্যাগ করে যাবে, কী লক্ষ্মীছাড়া দীনতার আবর্জনাকে? একাধিক শতাব্দীর শাসনধারা যখন শুষ্ক হয়ে যাবে তখন এ কী বিস্তীর্ণ পঙ্কশয্যা দুৰ্বিষহ নিস্ফলতাকে বহন করতে থাকবে। জীবনের প্রথম-আরম্ভে সমস্ত মন থেকে বিশ্বাস করেছিলুম যুরোপের সম্পদ অন্তরের এই সভ্যতার দানকে। আর আজ আমার বিদায়ের দিনে সে বিশ্বাস একেবারে দেউলিয়া হয়ে গেল। আজ আশা করে আছি, পরিত্রাণকর্তার জন্মদিন আসছে আমাদের এই দারিদ্র্যলাঞ্ছিত কুটীরের মধ্যে; অপেক্ষা করে থাকব, সভ্যতার দৈববাণী সে নিয়ে আসবে, মানুষের চরম আশ্বাসের কথা মানুষকে এসে শোনাবে এই পূর্বদিগন্ত থেকেই। আজ পারের দিকে যাত্রা করেছি—পিছনের ঘাটে কী দেখে এলুম, কী রেখে এলুম, ইতিহাসের কী অকিঞ্চিৎকর উচ্ছিষ্ট সভ্যতাভিমানের পরিকীর্ণ ভগ্নস্তূপ! কিন্তু, মানুষের প্রতি বিশ্বাস হারানো পাপ, সে বিশ্বাস শেষ পর্যন্ত রক্ষা করব। আশা করব, মহাপ্রলয়ের পরে বৈরাগ্যের মেঘমুক্ত আকাশে ইতিহাসের একটি নির্মল আত্মপ্রকাশ হয়তো আরম্ভ হবে এই পূর্বাচলের সূর্যোদয়ের দিগন্ত থেকে। আর-একদিন অপরাজিত মানুষ নিজের জয়যয়যাত্রার অভিযানে সকল বাধা অতিক্রম করে অগ্রসর হবে তার মহৎ মৰ্যাদা ফিরে পাবার পথে। মনুষ্যত্বের অন্তহীন প্রতিকারহীন পরাভবকে চরম বলে বিশ্বাস করাকে আমি অপরাধ মনে করি।

अरुण माहेश्वरी का अनुवाद इस प्रकार हैः

"एक न एक दिन भाग्यचक्र पलटा खायेगा, और अंग्रेजों को अपना भारतीय साम्राज्य छोड़कर जाना होगा। लेकिन किस तरह के भारत को वे पीछे छोड़ जायेंगे?...जीवन के प्रथम भाग में मेरा हार्दिक विश्वास था कि सभ्यता-दान ही योरोप की आन्तरिक सम्पत्ति है। आज जब जीवन से विदा होने का दिन समीप आ रहा है मेरे इस विश्वास का दिवाला निकल चुका है। ...लेकिन मनुष्य के प्रति विश्वास खो देना पाप है। अन्तिम क्षण तक इस विश्वास की रक्षा करूंगा। ...जो लोग प्रबल और प्रतापशाली है उनकी शक्ति, गर्व और आत्माभिमान अजेय नहीं है। ...निश्चय ही इस सत्य का हमें प्रमाण मिलेगा...

इससे पहले फासीवादी नाजी खतरे को रेखांकित करते हुए वे लिखते हैंः

इसी बीच मैंने देखा कि योरप में मूर्तिमन्त र्बबरता अपने नखदन्त बाहर निकालकर विभीषिका की तरह बढ़ती जा रही है। मानव-जाति को पीड़ित करने वाली इस महामारी का पाश्चात्य सभ्यता की मज्जा में जन्म हुआ। वहां से उठकर आज उसने मानव-आत्मा का अपमान करते हुए दिग्दिगन्तर के वातावरण को कलुषित कर दिया है। हमारे अभागे, निःसहाय, जकड़े हुए देश की दरिद्रता में क्या हमें उसका आभास नहीं मिलता?

रवींद्र अपने जीवन में भारत के भविष्य को लेकर इतने चिंतित क्यों थे?

खंडित राष्ट्रीयता,विभाजन की नियति और फासीवाद की दस्तक इसकी मुख्य वजहें हैं।

रवींद्रनाथ का भारतवर्ष भारत के इतिहास,दर्शन और सांस्कृतिक लोकतंत्र की समग्र विरासत पर आधारित है जिसे वे खंडित होते हुए देख रहे थे।

डा.अमर्त्यसेन ने रवींद्र की आशंका और चेतावनी के मद्देनजर नेहरु की जेल डायरी के हवाले से नोबेल प्राइज डाटआर्ग पर रवींद्र की भारत परिकल्पना और गांधी और रवींद्र के बीच निरंतर जारी संवाद पर लिखे अपने आलेख में लिखा हैः


In his prison diary, Nehru wrote: "Perhaps it is as well that [Tagore] died now and did not see the many horrors that are likely to descend in increasing measure on the world and on India. He had seen enough and he was infinitely sad and unhappy." Toward the end of his life, Tagore was indeed becoming discouraged about the state of India, especially as its normal burden of problems, such as hunger and poverty, was being supplemented by politically organized incitement to "communal" violence between Hindus and Muslims. This conflict would lead in 1947, six years after Tagore's death, to the widespread killing that took place during partition; but there was much gore already during his declining days. In December 1939, he wrote to his friend Leonard Elmhirst, the English philanthropist and social reformer who had worked closely with him on rural reconstruction in India (and who had gone on to found the Dartington Hall Trust in England and a progressive school at Dartington that explicitly invoked Rabindranath's educational ideals):5

"It does not need a defeatist to feel deeply anxious about the future of millions who, with all their innate culture and their peaceful traditions are being simultaneously subjected to hunger, disease, exploitations foreign and indigenous, and the seething discontents of communalism."

How would Tagore have viewed the India of today? Would he see progress there, or wasted opportunity, perhaps even a betrayal of its promise and conviction? And, on a wider subject, how would he react to the spread of cultural separatism in the contemporary world?

(Tagore and His India

by Amartya Sen*,/www.nobelprize.org)


इस निबंध में रूस,चीन और जापान में विभिन्न राष्ट्रीयताओं के सहअस्तित्व के आधार पर पश्चिम के साम्राज्यवादी राष्ट्रवाद के विपरीत नये सिरे से राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया की उन्होंने विस्तार से चर्चा की है।

भारत में मुसलमानों,अस्पृश्यों को बराबरी का द्रजा न दिये जाने की चर्चा वे बार बार करते रहे हैं और भारती की मुख्य समस्या वे नस्ली विषमता मानते हुए विविधता में एकता को इस समस्या का समाधान बताते रहे हैं।यूरोप के नस्ली संघर्षों और रंगभेदी विषमता के विपरीत सोवियत संघ और चीन में मुसलमानों को बराबारी देने की बात वे सिलसिलेवार कहते हैं तो पश्चिम एशिया के इस्लामी राष्ट्रों के नस्ली सामाजिक य़थार्थ को सामने रखते हुए नये भारत की परिकल्पना पेश करते हैं।


पश्चिम में अंध राष्ट्रवाद के फासीवाद और नाजीवाद से हिंसा और युद्ध से ध्वस्त पृथ्वी का कोना कोना घूमने के बाद गुरुदेव विश्वयुद्धों के विध्वंस का सच का सामना करते हुए सभ्यता के खतरों से बेहद चिंतित थे।मनुष्यता का धर्म और राष्ट्रवाद पर लिखे निबंधों में इसीलिए उन्होंने बार बार सहिष्णुता,विविधता और बहुलता की भारतीय विरासत की बात करते हुए समानता और न्याय पर आधारित मनुष्यता के वैश्विक भूगोल और विश्व मानव की बात करते हुए अंध राष्ट्रवाद और धार्मिक कटट्रता के खिलाफ मनुष्यता के आदर्शों औऱ भारतीय साझा विरासत के आध्यात्म के जरिये विश्वशांति की बातें की हैं।



अरुण माहेश्वरी ने लिखा हैः

इसमें शक नहीं कि यह विश्वयुद्ध  रवीन्द्रनाथ के जीवन की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना था। वस्तुतः 1939 से लेकर अपनी मृत्यु (7 अगस्त 1941) तक वे इस युद्ध की परिस्थितियों के बारे में लगातार चिंतित रहे। इस युद्ध में वे साफ तौर पर पूरी मनुष्यता के अस्तित्व पर खतरे को देख रहे थे और इसीलिये फासिस्ट ताकतों के खिलाफ मित्र शक्तियों के प्रति उनकी सहानुभूति और समर्थन में किसी प्रकार का कोई संकोच नहीं था। रूस का अनुभव उनके साथ था और उसके प्रति प्रकट सहानुभूति भी। अपने अंतिम दिनों के इसीकाल में कवि ने अंतिम इच्छा के रूप में 'सभ्यता का संकट' ऐतिहासिक लेख लिखा जिसे 14 मई 1941 के दिन शान्तिनिकेतन में पढ़ा गया। कवि तब अस्सी साल के हो गये थे। इस लेख का प्रारंभ वे इन शब्दों से करते हैंः


"आज मेरे जीवन के अस्सी वर्ष पूर्ण हुए। अपने जीवन-क्षेत्र का दीर्घ विस्तार आज मेरे सामने आता है।                   ...  "पाश्चात्य जातियों को अपनी सभ्यता पर जो गर्व है उसके प्रति श्रद्धा रखना अब असंभव होगया है। वह सभ्यता हमें अपना शक्ति रूप दिखा चुकी है लेकिन मुक्ति रूप नहीं दिखा सकी। मनुष्य का मनुष्य के साथ वह सम्बन्ध, जो सबसे अधिक मूल्यवान है और जिसे वास्तव में सभ्यता कहा जा सकता है, यहां नहीं मिलता। ...


इसी बीच मैंने देखा कि योरप में मूर्तिमन्त र्बबरता अपने नखदन्त बाहर निकालकर विभीषिका की तरह बढ़ती जा रही है। मानव-जाति को पीड़ित करने वाली इस महामारी का पाश्चात्य सभ्यता की मज्जा में जन्म हुआ। वहां से उठकर आज उसने मानव-आत्मा का अपमान करते हुए दिग्दिगन्तर के वातावरण को कलुषित कर दिया है। हमारे अभागे, निःसहाय, जकड़े हुए देश की दरिद्रता में क्या हमें उसका आभास नहीं मिलता?


"एक न एक दिन भाग्यचक्र पलटा खायेगा, और अंग्रेजों को अपना भारतीय साम्राज्य छोड़कर जाना होगा। लेकिन किस तरह के भारत को वे पीछे छोड़ जायेंगे?...जीवन के प्रथम भाग में मेरा हार्दिक विश्वास था कि सभ्यता-दान ही योरोप की आन्तरिक सम्पत्ति है। आज जब जीवन से विदा होने का दिन समीप आ रहा है मेरे इस विश्वास का दिवाला निकल चुका है। ...लेकिन मनुष्य के प्रति विश्वास खो देना पाप है। अन्तिम क्षण तक इस विश्वास की रक्षा करूंगा। ...जो लोग प्रबल और प्रतापशाली है उनकी शक्ति, गर्व और आत्माभिमान अजेय नहीं है। ...निश्चय ही इस सत्य का हमें प्रमाण मिलेगा...


महामानव का आगमन है।

दिशा-दिशा में घास का तिनका-तिनका रोमांचित है।

देवलोक में शंख बज उठा...

'जय-जय-जय रे मानव अभ्युदय' -"


रवीन्द्रनाथ के जीवन के इस पूरे आख्यान को यदि कोई गहराई से देखेगा तो उसे इसमें शुरू से अंत तक महाविश्व के महामानव की प्रतिमा का एक ऐसा सूत्र पिरोया हुआ दिखाई देगा जिस प्रतिमा को उन्होंने अपने जीवन के प्रारंभ में ही अपने आध्यात्मिक संस्कार से हृदय में बहुत गहरे बसा लिया था, और उम्र की अंतिम घड़ी तक वे उसी महामानव की जयकार का गीत गाते रहे। उसमें किसी भी प्रकार की लघुता का कोई स्थान नहीं था।


रवीन्द्रनाथ टैगोर की आध्यात्म-आधारित विश्व-दृष्टि ( जनपक्ष में प्रकाशित) से साभार

(यह लेख हाल में दिल्ली में इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोसिअलिस्ट एजुकेसन द्वारा आयोजित रवीन्द्रनाथ पर राष्ट्रीय सेमिनार (१६-१७ दिसम्बर २०११)में पढ़ा गया था. )


रवींद्र का दलित विमर्श- नौ रवींद्र अपने जीवन में भारत के भविष्य को लेकर इतने चिंतित क्यों थे? खंडित राष्ट्रीयता,विभाजन की नियति और फासीवाद की दस्तक इसकी मुख्य वजहें हैं। पुरखों के भारतवर्ष की हत्या कर रहा है डिजिटल हिंदू कारपोरेट सैन्य राष्ट्र! पलाश विश्वास

रवींद्र का दलित विमर्श- नौ

रवींद्र अपने जीवन में भारत के भविष्य को लेकर इतने चिंतित क्यों थे?

खंडित राष्ट्रीयता,विभाजन की नियति और फासीवाद की दस्तक इसकी मुख्य वजहें हैं।

पुरखों के भारतवर्ष की हत्या कर रहा है डिजिटल हिंदू कारपोरेट सैन्य राष्ट्र!

पलाश विश्वास

हमने समकालीन ज्वलंत सवालों के संदर्भ में रवींद्र के दलित विमर्श पर संवाद का प्रस्ताव रखा था।इसी सिलसिले में रवींद्र की भारत परिकल्पना की आज चर्चा कर रहे हैं।इसी सिलसिले में निराधार आधार पर आधारित कारपोरेट डिजिटल हिंदू राष्ट्र की चर्चा जरुरी है जो हमारे पुरखों के भारत वर्ष की हत्या कर रहा है।

निजता का अधिकार  मौलिक अधिकार है,सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला है।अब इस फैसले से पहले नागरिकों के शरीर पर नागरिकों के हक न होने का हलफनामा दायर करने वाली भारत सरकार का दावा है कि यह फैसला उसके नजरिये के मुताबिक है।इसका सीधा मतलब है कि निजता को मौलिक अधिकार मान लिये जाने के बावजूद आधार परियोजना के तहत नागरिकों के निजता के अधिकार का हनन करते हुए उनके निजी तथ्यों को कारपोरेट कंपनियों को शेयर करने का सिलसिला रुकने वाला नहीं है।क्योंकि यह गैरजरुरी जनसंख्या के सफाये के नरसंहारी एजंडा है जिसके मार्फत अर्थव्यवस्था और राष्ट्रव्यवस्था पर नस्ली वर्चस्व बहाल रखकर जीवन के हर क्षेत्र में नस्ली रंगभेद के तहत दलितों,पिछड़ों,आदिवासियों,गैर नस्ली और विधर्मी समुदायों,किसानों,मेहनतकशों के बहिस्कार और निगरानी की योजना है।

नागरिकों की न निगरानी न सिर्फ राष्ट्र कर रहा है बल्कि देशी विदेशी निजी कंपनियां और दुनियाभर के आपराधिक माफिया गिरोह को भी नागरिकों की निजी जानकारियां दी जा रही हैं क्योंकि जरुरी सेवाओं के लिए आधार की अनिवार्यता की वजह से गैरसरकारी अज्ञात तत्वों के हवाले नागरिकों के आधार तथ्य के साथ साथ उनकी उंगलियों की छाप भी हैं जिससे साइबर जालसाजी से लेकर जान माल का गंबीर खतरा भी है क्योंकि नागरिकों की क्रयशक्ति के आधार पर बैंक बैलेंस और चल अचल संपत्ति की जानकारियां भी निजी कंपनियों के साथ साथ अज्ञात और आपराधिक तत्वों तक शेयर करने की अनिवार्यता है।

मोबाइल,फोन,मेल के जरिये क्रेडिट कार्ड,बैंक लोन और खरीददारी के तमाम आफर इन्हीं तथ्यों के आधार पर नागरिकों को चौबीसों घंटे थोकभाव से मिल रहे हैं क्योंकि मोबाइल और गैस कनेक्शन से लेकर यात्रा टिकट तक आधार की अनिवार्यता है।आधार परियोजान जारी रहा तो निजता का अधिकार का कोई मतलब नहीं है।

इस सिलसिले में हम लगातार चर्चा करते रहे हैं और आप हस्तक्षेप के पुराने आलेखों को पढ़ सकते हैं।

अब सवाल यह है कि कारपोरेट फंडिंग से चलने वाली राजनीति क्या कारपोरेट नस्ली  वर्चस्व के डिजिटल इंडिया के खिलाफ नागरिकों के मौलिक अधिकारों के हक में खड़े होने की हिम्मत करेंगी क्योंकि राजनीति ने अभी तक इसका विरोध नहीं किया है क्योंकि सत्ता वर्ग की राजनीति दरअसल नस्ली वर्चस्व की राजनीति है और वह अन्याय,असमानता,उत्पीड़न,अत्याचार,बेदखली और नरसंहार संस्कृति के समर्थन में खड़ी है।उसके तमाम तर्क भी अंध राष्ट्रवाद और सैन्य हिंदू राष्ट्र के वर्ण वर्ग वर्चस्व के हित में हैं।

गौरतलब है कि एक बेहद अहम फैसले के तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार, यानी राइट टू प्राइवेसी को मौलिक अधिकारों, यानी फन्डामेंटल राइट्स का हिस्सा करार दिया है। नौ जजों की संविधान पीठ ने 1954 और 1962 में दिए गए फैसलों को पलटते हुए कहा कि राइट टू प्राइवेसी मौलिक अधिकारों के अंतर्गत प्रदत्त जीवन के अधिकार का ही हिस्सा है। राइट टू प्राइवेसी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आती है। अब  लोगों की निजी जानकारी सार्वजनिक नहीं होगी। हालांकि आधार को योजनाओं से जोड़ने पर सुनवाई आधार बेंच करेगी। इसमें 5 जज होंगे।

रवींद्रनाथ ने 7 अगस्त,1941 को अपनी मृत्यु से पहले 14 मई,1941 को शांतिनिकेतन में पढ़े अपने निबंध सभ्यता के संकट में भारतीय मानस के सांप्रदायिक ध्रूवीकरण के आधार पर फासीवादी राष्ट्रवाद के खिलाफ चेतावनी दे गये।इस निबंध के पहले ही वाक्य में खंडित भारतीय राष्ट्रीयता का चित्र इस तरह प्रस्तुत किया हैः

আজ আমার বয়স আশি বৎসর পূর্ণ হল, আমার জীবনক্ষেত্রের বিস্তীর্ণতা আজ আমার সম্মুখে প্রসারিত। পূর্বতম দিগন্তে যে জীবন আরম্ভ হয়েছিল তার দৃশ্য অপর প্রান্ত থেকে নিঃসক্ত দৃষ্টিতে দেখতে পাচ্ছি এবং অনুভব করতে পারছি যে, আমার জীবনের এবং সমস্ত দেশের মনোবৃত্তির পরিণতি দ্বিখণ্ডিত হয়ে গেছে, সেই বিচ্ছিন্নতার মধ্যে গভীর দুঃখের কারণ আছে।

(अनुवादःआज मेरे जीवन के अस्सी साल पूरे हो गये,मेरे जीवनक्षेत्र की विस्तीर्णता आज मेरे सामने प्रसारित है।पूर्वतम दिगंत पर जिस जीवन का आरंभ हुआ,उसके दृश्य दूसरे सिरे से निःसक्त दृष्टि से देख रहा हूं और मुझे इसका अनुभव हो रहा है कि मेरे जीवन और समूचे देश की मानसिकता द्विखंडित हो गयी है और इस विभाजन में दुःख के कारण है।)

रवींद्रनाथ की यह चेतावनी भारत विभाजन की भी चेतावनी है क्योंकि खंडित राष्ट्रीयता की नियति अंततः विभाजन की त्रासदी है।वे इस सच को जानचुके थे कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का अंत दूर नहीं है और इससे भय़ंकर सछ उनके सामने शायद यह था कि जिस भारतवर्ष की परिकल्पना वे बना रहे थे,सत्ता हस्तातंरण के बाद वह भारत धर्म और राष्ट्रवाद के शिकंजे में सभ्यता के संकट का पर्याय बनने वाला है।हम बार बार यह निवेदन कर रहे हैं कि हमारा लिखा कोई शोध प्रबंध नहीं है और न यह किसी प्रकाशन के माध्यम से कहीं प्रकाशित होने वाला है। यह सोशल मीडिया पर रवींद्र के दलित विमर्श पर एक संवाद है,जिसकी अपनी सीमा है।हम विस्तार से संदर्भ और प्रसंग के साथ बातें रख नहीं सकते।इसलिए संदर्भ संबंधी नेट पर उपलब्ध सारी सामग्री मूल पाठ और वीडियो अलग से शेयर कर रहे हैं।उन्हें देखे बिना इस संवाद में शामिल होना मुश्किल है।

आज हमने सभ्यता के संकट का मूल बांग्ला पाठ शेयर किया है और इसका हिंदी अनुवाद मुझे नेट पर मिला नहीं है।कोलकाता के आलोचक अरुण माहेश्वरी ने दिल्ली में रवींद्रनाथ पर 2011 में आयोजित राष्ट्रीय सेमीनार में इस निबंध के अंतिम हिस्से का अनुवाद अपने वक्तव्य में शामिल किया है और वह वक्तव्य जनपक्ष में प्रकाशित हुआ है।संवाद के इस क्रम में अंत में वह हिस्सा हम दे रहे हैं।

इस निबंध में बारत की आजादी के बाद की स्थितियों के बारे में उन्होंने जो आशंका जतायी है,वह उनके जीवन काल में ही भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान फासीवादी नाजीवादी शक्तियों के धार्मिक राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक राजनीति के उथल पुथल परिदृश्य के संदर्भ में है,यह समझना मुश्किल नहीं है क्योंकि वे खंडित राष्ट्रीयता की बात शुरु में ही उसी तरह कर रहे हैं जैसे कि संविधान सभा में अपने पहले भाषण में बाबासाहेब भीमराव अबेडकर ने आपस में लड़ रहे कैंप के हवाले खंडित राष्ट्रीयता की बात की है।

रवींद्र ने भारती की स्वतंत्रता की भविष्यवाणी करते हुए जो अंदेशा जताया है,वर्तमान चुनौतियां उसी को सही साबित करती हैं।रवींद्र ने लिखा हैः

ভাগ্যচক্রের পরিবর্তনের দ্বারা একদিন না একদিন ইংরেজকে এই ভারতসাম্রাজ্য ত্যাগ করে যেতে হবে। কিন্তু কোন্‌ ভারতবর্ষকে সে পিছনে ত্যাগ করে যাবে, কী লক্ষ্মীছাড়া দীনতার আবর্জনাকে? একাধিক শতাব্দীর শাসনধারা যখন শুষ্ক হয়ে যাবে তখন এ কী বিস্তীর্ণ পঙ্কশয্যা দুৰ্বিষহ নিস্ফলতাকে বহন করতে থাকবে। জীবনের প্রথম-আরম্ভে সমস্ত মন থেকে বিশ্বাস করেছিলুম যুরোপের সম্পদ অন্তরের এই সভ্যতার দানকে। আর আজ আমার বিদায়ের দিনে সে বিশ্বাস একেবারে দেউলিয়া হয়ে গেল। আজ আশা করে আছি, পরিত্রাণকর্তার জন্মদিন আসছে আমাদের এই দারিদ্র্যলাঞ্ছিত কুটীরের মধ্যে; অপেক্ষা করে থাকব, সভ্যতার দৈববাণী সে নিয়ে আসবে, মানুষের চরম আশ্বাসের কথা মানুষকে এসে শোনাবে এই পূর্বদিগন্ত থেকেই। আজ পারের দিকে যাত্রা করেছি—পিছনের ঘাটে কী দেখে এলুম, কী রেখে এলুম, ইতিহাসের কী অকিঞ্চিৎকর উচ্ছিষ্ট সভ্যতাভিমানের পরিকীর্ণ ভগ্নস্তূপ! কিন্তু, মানুষের প্রতি বিশ্বাস হারানো পাপ, সে বিশ্বাস শেষ পর্যন্ত রক্ষা করব। আশা করব, মহাপ্রলয়ের পরে বৈরাগ্যের মেঘমুক্ত আকাশে ইতিহাসের একটি নির্মল আত্মপ্রকাশ হয়তো আরম্ভ হবে এই পূর্বাচলের সূর্যোদয়ের দিগন্ত থেকে। আর-একদিন অপরাজিত মানুষ নিজের জয়যয়যাত্রার অভিযানে সকল বাধা অতিক্রম করে অগ্রসর হবে তার মহৎ মৰ্যাদা ফিরে পাবার পথে। মনুষ্যত্বের অন্তহীন প্রতিকারহীন পরাভবকে চরম বলে বিশ্বাস করাকে আমি অপরাধ মনে করি।

अरुण माहेश्वरी का अनुवाद इस प्रकार हैः

"एक न एक दिन भाग्यचक्र पलटा खायेगा, और अंग्रेजों को अपना भारतीय साम्राज्य छोड़कर जाना होगा। लेकिन किस तरह के भारत को वे पीछे छोड़ जायेंगे?...जीवन के प्रथम भाग में मेरा हार्दिक विश्वास था कि सभ्यता-दान ही योरोप की आन्तरिक सम्पत्ति है। आज जब जीवन से विदा होने का दिन समीप आ रहा है मेरे इस विश्वास का दिवाला निकल चुका है। ...लेकिन मनुष्य के प्रति विश्वास खो देना पाप है। अन्तिम क्षण तक इस विश्वास की रक्षा करूंगा। ...जो लोग प्रबल और प्रतापशाली है उनकी शक्ति, गर्व और आत्माभिमान अजेय नहीं है। ...निश्चय ही इस सत्य का हमें प्रमाण मिलेगा...

इससे पहले फासीवादी नाजी खतरे को रेखांकित करते हुए वे लिखते हैंः

इसी बीच मैंने देखा कि योरप में मूर्तिमन्त र्बबरता अपने नखदन्त बाहर निकालकर विभीषिका की तरह बढ़ती जा रही है। मानव-जाति को पीड़ित करने वाली इस महामारी का पाश्चात्य सभ्यता की मज्जा में जन्म हुआ। वहां से उठकर आज उसने मानव-आत्मा का अपमान करते हुए दिग्दिगन्तर के वातावरण को कलुषित कर दिया है। हमारे अभागे, निःसहाय, जकड़े हुए देश की दरिद्रता में क्या हमें उसका आभास नहीं मिलता?

रवींद्र अपने जीवन में भारत के भविष्य को लेकर इतने चिंतित क्यों थे?

खंडित राष्ट्रीयता,विभाजन की नियति और फासीवाद की दस्तक इसकी मुख्य वजहें हैं।

रवींद्रनाथ का भारतवर्ष भारत के इतिहास,दर्शन और सांस्कृतिक लोकतंत्र की समग्र विरासत पर आधारित है जिसे वे खंडित होते हुए देख रहे थे।

डा.अमर्त्यसेन ने रवींद्र की आशंका और चेतावनी के मद्देनजर नेहरु की जेल डायरी के हवाले से नोबेल प्राइज डाटआर्ग पर रवींद्र की भारत परिकल्पना और गांधी और रवींद्र के बीच निरंतर जारी संवाद पर लिखे अपने आलेख में लिखा हैः


In his prison diary, Nehru wrote: "Perhaps it is as well that [Tagore] died now and did not see the many horrors that are likely to descend in increasing measure on the world and on India. He had seen enough and he was infinitely sad and unhappy." Toward the end of his life, Tagore was indeed becoming discouraged about the state of India, especially as its normal burden of problems, such as hunger and poverty, was being supplemented by politically organized incitement to "communal" violence between Hindus and Muslims. This conflict would lead in 1947, six years after Tagore's death, to the widespread killing that took place during partition; but there was much gore already during his declining days. In December 1939, he wrote to his friend Leonard Elmhirst, the English philanthropist and social reformer who had worked closely with him on rural reconstruction in India (and who had gone on to found the Dartington Hall Trust in England and a progressive school at Dartington that explicitly invoked Rabindranath's educational ideals):5

"It does not need a defeatist to feel deeply anxious about the future of millions who, with all their innate culture and their peaceful traditions are being simultaneously subjected to hunger, disease, exploitations foreign and indigenous, and the seething discontents of communalism."

How would Tagore have viewed the India of today? Would he see progress there, or wasted opportunity, perhaps even a betrayal of its promise and conviction? And, on a wider subject, how would he react to the spread of cultural separatism in the contemporary world?

(Tagore and His India

by Amartya Sen*,/www.nobelprize.org)


इस निबंध में रूस,चीन और जापान में विभिन्न राष्ट्रीयताओं के सहअस्तित्व के आधार पर पश्चिम के साम्राज्यवादी राष्ट्रवाद के विपरीत नये सिरे से राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया की उन्होंने विस्तार से चर्चा की है।

भारत में मुसलमानों,अस्पृश्यों को बराबरी का द्रजा न दिये जाने की चर्चा वे बार बार करते रहे हैं और भारती की मुख्य समस्या वे नस्ली विषमता मानते हुए विविधता में एकता को इस समस्या का समाधान बताते रहे हैं।यूरोप के नस्ली संघर्षों और रंगभेदी विषमता के विपरीत सोवियत संघ और चीन में मुसलमानों को बराबारी देने की बात वे सिलसिलेवार कहते हैं तो पश्चिम एशिया के इस्लामी राष्ट्रों के नस्ली सामाजिक य़थार्थ को सामने रखते हुए नये भारत की परिकल्पना पेश करते हैं।


पश्चिम में अंध राष्ट्रवाद के फासीवाद और नाजीवाद से हिंसा और युद्ध से ध्वस्त पृथ्वी का कोना कोना घूमने के बाद गुरुदेव विश्वयुद्धों के विध्वंस का सच का सामना करते हुए सभ्यता के खतरों से बेहद चिंतित थे।मनुष्यता का धर्म और राष्ट्रवाद पर लिखे निबंधों में इसीलिए उन्होंने बार बार सहिष्णुता,विविधता और बहुलता की भारतीय विरासत की बात करते हुए समानता और न्याय पर आधारित मनुष्यता के वैश्विक भूगोल और विश्व मानव की बात करते हुए अंध राष्ट्रवाद और धार्मिक कटट्रता के खिलाफ मनुष्यता के आदर्शों औऱ भारतीय साझा विरासत के आध्यात्म के जरिये विश्वशांति की बातें की हैं।



अरुण माहेश्वरी ने लिखा हैः

इसमें शक नहीं कि यह विश्वयुद्ध  रवीन्द्रनाथ के जीवन की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना था। वस्तुतः 1939 से लेकर अपनी मृत्यु (7 अगस्त 1941) तक वे इस युद्ध की परिस्थितियों के बारे में लगातार चिंतित रहे। इस युद्ध में वे साफ तौर पर पूरी मनुष्यता के अस्तित्व पर खतरे को देख रहे थे और इसीलिये फासिस्ट ताकतों के खिलाफ मित्र शक्तियों के प्रति उनकी सहानुभूति और समर्थन में किसी प्रकार का कोई संकोच नहीं था। रूस का अनुभव उनके साथ था और उसके प्रति प्रकट सहानुभूति भी। अपने अंतिम दिनों के इसीकाल में कवि ने अंतिम इच्छा के रूप में 'सभ्यता का संकट' ऐतिहासिक लेख लिखा जिसे 14 मई 1941 के दिन शान्तिनिकेतन में पढ़ा गया। कवि तब अस्सी साल के हो गये थे। इस लेख का प्रारंभ वे इन शब्दों से करते हैंः


"आज मेरे जीवन के अस्सी वर्ष पूर्ण हुए। अपने जीवन-क्षेत्र का दीर्घ विस्तार आज मेरे सामने आता है।                   ...  "पाश्चात्य जातियों को अपनी सभ्यता पर जो गर्व है उसके प्रति श्रद्धा रखना अब असंभव होगया है। वह सभ्यता हमें अपना शक्ति रूप दिखा चुकी है लेकिन मुक्ति रूप नहीं दिखा सकी। मनुष्य का मनुष्य के साथ वह सम्बन्ध, जो सबसे अधिक मूल्यवान है और जिसे वास्तव में सभ्यता कहा जा सकता है, यहां नहीं मिलता। ...


इसी बीच मैंने देखा कि योरप में मूर्तिमन्त र्बबरता अपने नखदन्त बाहर निकालकर विभीषिका की तरह बढ़ती जा रही है। मानव-जाति को पीड़ित करने वाली इस महामारी का पाश्चात्य सभ्यता की मज्जा में जन्म हुआ। वहां से उठकर आज उसने मानव-आत्मा का अपमान करते हुए दिग्दिगन्तर के वातावरण को कलुषित कर दिया है। हमारे अभागे, निःसहाय, जकड़े हुए देश की दरिद्रता में क्या हमें उसका आभास नहीं मिलता?


"एक न एक दिन भाग्यचक्र पलटा खायेगा, और अंग्रेजों को अपना भारतीय साम्राज्य छोड़कर जाना होगा। लेकिन किस तरह के भारत को वे पीछे छोड़ जायेंगे?...जीवन के प्रथम भाग में मेरा हार्दिक विश्वास था कि सभ्यता-दान ही योरोप की आन्तरिक सम्पत्ति है। आज जब जीवन से विदा होने का दिन समीप आ रहा है मेरे इस विश्वास का दिवाला निकल चुका है। ...लेकिन मनुष्य के प्रति विश्वास खो देना पाप है। अन्तिम क्षण तक इस विश्वास की रक्षा करूंगा। ...जो लोग प्रबल और प्रतापशाली है उनकी शक्ति, गर्व और आत्माभिमान अजेय नहीं है। ...निश्चय ही इस सत्य का हमें प्रमाण मिलेगा...


महामानव का आगमन है।

दिशा-दिशा में घास का तिनका-तिनका रोमांचित है।

देवलोक में शंख बज उठा...

'जय-जय-जय रे मानव अभ्युदय' -"


रवीन्द्रनाथ के जीवन के इस पूरे आख्यान को यदि कोई गहराई से देखेगा तो उसे इसमें शुरू से अंत तक महाविश्व के महामानव की प्रतिमा का एक ऐसा सूत्र पिरोया हुआ दिखाई देगा जिस प्रतिमा को उन्होंने अपने जीवन के प्रारंभ में ही अपने आध्यात्मिक संस्कार से हृदय में बहुत गहरे बसा लिया था, और उम्र की अंतिम घड़ी तक वे उसी महामानव की जयकार का गीत गाते रहे। उसमें किसी भी प्रकार की लघुता का कोई स्थान नहीं था।


रवीन्द्रनाथ टैगोर की आध्यात्म-आधारित विश्व-दृष्टि ( जनपक्ष में प्रकाशित) से साभार

(यह लेख हाल में दिल्ली में इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोसिअलिस्ट एजुकेसन द्वारा आयोजित रवीन्द्रनाथ पर राष्ट्रीय सेमिनार (१६-१७ दिसम्बर २०११)में पढ़ा गया था. )


Wednesday, August 23, 2017

रवींद्र का दलित विमर्श-आठ मजहबी सियासत के हिंदुत्व एजंडे से मिलेगी आजादी स्त्री को? जश्न मानने से पहले हकीकत की तस्वीरों के अलग अलग रुख को जरुर देख लें।फिजां में बिछी बारुदी सुरंगों का भी तनिक जायजा ले लीजिये। पलाश विश्वास

रवींद्र का दलित विमर्श-आठ
मजहबी सियासत के हिंदुत्व एजंडे से मिलेगी आजादी स्त्री को?
जश्न मानने से पहले हकीकत की तस्वीरों  के अलग अलग रुख को जरुर देख लें।फिजां में बिछी बारुदी सुरंगों का भी तनिक जायजा ले लीजिये।
पलाश विश्वास
तीन तलाक की प्रथा खत्म हो गयी है,यह दावा करना जल्दबाजी होगी।
इसी सिलिसिले सामाजिक,मजहबी बदलाव की किसी हलचल के बिना सियासती सरगर्मियां हैरतअंगेज हैं।
सवाल यह है कि अगर सचमुच तीन तलाक सुप्रीम कोर्ट के फैसले से खत्म हो गया है तो इसका श्रेय भारत सरकार,भारत के प्रधानमंत्री, संघ परिवार और सत्ता दल को कैसे जाता है।
सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट और न्यायपालिका क्या भारत सरकार,भारत के प्रधानमंत्री, संघ परिवार और सत्ता दल के मतहत हैं और उन्हींके निर्देश पर उनके फैसले बनते बिगड़ते हैं?
अगर ऐसा ही सच है तो बाकी तमाम नाजुक मामलों में भी सत्ता का हस्तक्षेप निर्णायक होगा।यह लोकतंत्र और संविधान के लिए बेहद खतरनाक स्थिति है। मुसलमान औरतों को न्याय दिलाने का श्रेय लूटने वाले पहले इस सवाल का जवाब दें।
बहरहाल हम रवींद्र के दलित विमर्श के तहत स्त्री मुक्ति के लिए भारत में उन्नीसवीं सदी से जारी मुक्ति संघर्ष की चर्चा करेंगे।
रवींद्र ,शरत और प्रेमचंद के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के परिप्रेक्ष्य और पृष्ठभूमि में स्त्री मुक्ति प्रसंग और आधुनिक भारत में मेहनतकश, दलित, पिछड़ी, आदिवासी,विधर्मी गरीब औरतों के हकहकूक की लड़ाई के संदर्भ में स्त्री अस्मिता और स्त्री स्वतंत्रता की चुनौतियों की जांच पड़ताल करके ही हम सामाजिक और मजहबी बदलाव की दिशा बना सकते हैं,जिनके बिना सियासती और कानूनी पहल भी बेमतलब हैं।
रवींद्र नाथ भारत की मूल समस्या सामाजिक मानते थे और इसकी जड़ें नस्ली विषमता मानते थे।रवींद्र साहित्य में नवजागरण और ब्रहमसमाज के प्रभाव से स्त्री मुक्ति प्रसंग बेहद मुखर हैं तो बौद्धमय भारत के आख्यानों के तहत स्त्री मुक्ति प्रसंग को उन्होंने समानता और न्याय की लड़ाई से भी जोड़ा है।उनकी तमाम नृत्य
नाटिकाएं चंडालिका, चित्रांगदा, रक्तकरबी, श्यामा, शाप मोचन स्त्री मुक्ति प्रसंग समता और न्याय के संघर्ष में बदल जाते हैं।
प्रेमचंद के गोदान में जिस तरह होरी धनिया की जीवन यंत्रणा है। अंधे सूरदास की आंखों में जैसे पूंजी के हमले से तबाह जनपद हैं,वैसा साहित्य आजाद भारत में भी लिखा नहीं गया है।सद्गति की कथा नस्ली रंगभेद की निरंतरता बनकर अब भी जारी है।इसके साथ ही शरतचंद्र  के कथासंसार में स्त्री अस्मिता की पक्षधरता शायद सबसे प्रबल है।लेकिन वहां स्त्री स्वतंत्रता का मुद्दा सामाजिक बदलाव का मुद्दा बना नहीं है क्योंकि स्त्री मुक्ति प्रसंग वहां सामाजिक न्याय और समानता के साथ जुड़े नहीं हैं।
आजाद भारत में स्त्री अस्मिता और स्त्री स्वतंत्रता के मुद्दे को लगभग सभी भारतीय भाषाओं की लेखिकाओं ने बेहद प्रामाणिकता के साथ उठाया है लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्त्री अस्मिता और स्वतंत्रता को जिस तरह रवींद्र और प्रेमचंद ने सामाजिक बदलाव,समता और न्याय के मुद्दों के साथ जोड़ा है,ऐसे पुरुष रचनाकारों की कमी खलती हैं।शरत जैसा हर स्थिति में स्त्री अस्मिता का पक्षधर लेखक बी कोई दूसरा नहीं हुआ।
बहरहाल,अगर हम बतौर दलील यह मान भी लेते हैं कि तीन तलाक का मसला हमेशा के लिए सुलझ गया है और कमसकम मुस्लिम महिलाएं आजाद हो गयी हैं और इसका श्रेय संघ परिवार,हिंदुत्व के एजंडे और भाजपा की केंद्र सरकार और उसके प्रधानमंत्री  को जाता है,तो यह इस लड़ाई को जारी रखने वाली तमाम महिलाओं और उनके साथ खड़े कानूनी, सामाजिक और मजहबी चुनौतियों का मुकाबला करने वाले संगठनों की लंबी लड़ाई को सिरे से खारिज करना होगा।
फिर इस फैसले में तीन तलाक को इस्लाम धर्म और संविधान दोनों के खिलाफ बताया गया है तो इस्लाम और संविधान के बारे में इन श्रेय लुटेरों की राय और नीयत को समझना भी जरुरी है।
भारतीय इतिहास से इस्लाम का नामोनिशां मिटाने वालों का इस्लाम से क्या वास्ता है,यह भी समझना होगा।
दूसरी तरफ,भारतीय संविधान को बदलकर जो संस्थागत तौर पर लगातार मनुस्मृति शासन लागू कर रहा है,स्त्री अस्मिता और स्त्री स्वतंत्रता के बारे में पवित्र धर्मग्रंर्थों के हवाले से उनके विचारों की पड़ताल भी जरुरी है।पाठक यह खुद कर सकते हैं तो हम इस पर खामखां ज्यादा वक्त जाया नहीं करेंगे।
रवींद्र साहित्य में स्त्री मुक्ति के विचार ब्रह्मसमाज के विचार रहे हैं और ब्रह्म समाज के विघटन के बाद आदि ब्रह्मसमाज बनने से पहले  आदि ब्रह्मसमाज आंदोलन में शामिल मुख्य लोगों को स्त्री स्वतंत्रता दल के रुप में बंगाल में जाना जाता रहा है।रवींद्र इसी आदि ब्रह्मसमाज के सचिव बनाये गये तथे
रवींद्र के समय में भी सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के राजा राममोहन राय और विद्यासागर के आंदोलन में शामिल तमाम  ब्रहम समाजी स्त्री अस्मिता और स्त्री स्वतंत्रता के मामले में उनके उतने भी प्रबल समर्थक नहीं थे।
इस बारे में उनमें मतभेद भी थे और रवींद्र साहित्य में भी स्त्री मुक्ति प्रसंग में इस द्वंद्व की मौजूदगी है।
आदि ब्रहमसमाज आंदोलन के स्त्री अधिकार दल भी नीतिगत तौर पर हिंदू समाज के संस्कारों से मुक्त नहीं थे।रवींद्रनाथ नैतिकता वादी इस शुद्धता के खिलाफ खड़े होकर स्त्री मुक्ति के पक्ष में खुलकर खड़े हो गये।
रवींद्र के उपन्यासों चोखेर बाली की विनोदिनी का विद्रोह नष्टनीड़ में नहीं है।तो घरे बाइरे और गोरा में स्त्री अस्मिता की दृष्टि कही ज्यादा प्रखर है।
रवींद्र के अपने घर जोड़ासांकू में उनके पिता महर्षि देवेंद्र नाथ ठाकुर अपने बेटों के पश्चिमी नवजागरण और आधुनिकता के तहत स्त्री को स्वतंत्रता देने के पक्ष में नहीं थे।रवींद्र परिवार की महिलाओं ने इस सीमाबद्धता को तोड़ने की कोशिशें की हैं.जिसका बहुत असर रवींद्र के चिंतन मनन पर हुआ है।
स्त्री मुक्ति का संघर्ष किसी धर्म,जाति,क्षेत्र,नस्ल,भाषा या अस्मिता के दायरे में सीमाबद्ध नहीं है।अब भी दुनियाभर में स्त्री तकनीक और विज्ञान,शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता के कारण हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के बावजूद लैंगिक रंगभेदी भेदभाव की वजह से घर बाहर समान रुप से असुरक्षित है।
अब भी स्त्री पितृसत्तात्मक समाज में जाति धर्म स्थान काल निर्विशेष निजी संपत्ति में शामिल है।इसलिए स्त्री अस्मिता या स्त्री स्वतंत्रता की लड़ाई एक निरंतर जारी रहने वाली लड़ाई है।समता और न्याय की लड़ाई का अंग है यह।
पश्चिमी देशों में नवजागरण से पहले स्त्री को नहाने तक की इजाजत नहीं थी क्योंकि धर्म स्त्री को सूरज की रोशनी के सामने खड़े होने का मौका देने को तैयार नहीं था।
भारत में उन्नीसवीं के नवजागरण के दौरान बहुआयामी सामाजिक बदलाव के आंदोलनों की वजह से स्त्री को नागरिक और मानवअधिकार मिलने शुरु हुए।
स्त्री को मनुष्य मानने में ही पितृसत्ता तैयार नहीं थी।
वह लड़ाई अब भी जारी है।
कुरान और हदीस में बताये गये कायदे कानून के खिलाफ तात्कालिक तौर पर तीन बार तलाक कहकर,लिखकर,नेट और तकनीक के जरिये संप्रेषित करने की इस्लामविरोधी धर्मविरोधी रिवाज पर छह महीने के लिए रोक लगायी गयी है।
संसद में कानून बनाने के बाद ही यह रोक स्थाई तौर पर लागू हो सकेगी लेकिन तलाक की दूसरी मजहबी पद्धतियों पर इसका कोई असर नहीं होगा।
गौरतलब है कि इससे पहले शाह बानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सत्ता की मजहबी सियासत के तहत बेकार कर दिया गया था तो मजहबी सियासत के मौजूदा दौर में जब तक संसद में कानून नहीं बन जाता,इसे मुस्लिम औरतों की निर्णायक जीत बताना जल्दबाजी होगी।
खासकर तब जबकि मुस्लिम समाज मजहब के मामले में अदालती हस्तक्षेप के खिलाफ है।सामाजिक तौर पर मुस्लिम पर्सनल बोर्ड जैसी संस्थाओं की पहल पर इस मुद्दे को सुलझाने की कोई कोशिश नहीं हुई है तो मजहबी सियासत के सत्ता समीकरण के तहत इस मसले का स्थाई हल निकलना फिलहाल मुश्किल ही दिखता है।
उन्नीसवीं सदी में बंगाल के नवजागरण के दौरान ब्राह्मसमाज आंदोलन के दौरान हिंदू समाज में सतीप्रथा पर कानूनन रोक लगी तो विधवा विवाह का प्रचलन शुरु हुआ।बाल विवाह,बेमेल विवाह पर रोक अब भी नहीं लग सकी।कानून बनने के बावजूद।
स्त्री शिक्षा के आंदोलन में बंगाल के नवजागरण के अलावा मतुआ आंदोलन, महात्मा ज्योतिबा फूले और माता सावित्री बाई फूले के आंदोलनों का भी असर रहा है।सामाजिक सुधार के लिए हिंदू समाज और इसके साथ ही मुस्लिम समाज में भी उन्नीसवीं सदी से निरंतर आंदोलन होते रहे हैं।
भारत में स्त्री को मिले तमाम हकहकूक इन सुधार आंदोलनों,ब्रह्म समाज आंदोलन और बंगाल के नवजागरण के सौजन्य से हैं तो बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के ब्रिटिश राज के श्रम मंत्री की हैसियत से बनाये गये श्रम कानून मातृत्व अवकाश कानून और भारतीय संविधान में समानता के अधिकारों के तहत मताधिकार की निरंतरता की वजह से हैं।
स्वतंत्रता संग्राम में स्त्रियों की बड़े पैमाने पर भागेदारी और अंग्रेजी हुकूमत के दौरान ही जीवन के विभिन्न क्षेत्रों स्त्री नेतृत्व  के विकास ने भी स्त्री सशक्तीकरण की दिशा बनायी।
उत्पादन प्रणाली और अर्थव्यवस्था में स्त्री की बढती हुई भूमिका की वजह से,ज्ञान विज्ञान और तकनीक में मिले समान अवसरों के कारण आधुनिक भारत में स्त्री अस्मिता की ठोस जमीन तैयार हुई है।
यह सारा कुछ एक निरंतर सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया है और सामाजिक मसलों को सुलझाने के लिए समाज और सामाजिक संगठनों की कारगर पहल के कारण यह प्रगति संभव हो सकी है।
यह सारा सामाजिक बदलाव सियासत या मजहबी सियासत की वजह से नहीं हुआ।हिंदू समाज की कुरीतियों को दूर करने में हिंदू समाज में व्यापक सहमति हुई तभी सती के महिमामंडन के बावजूद सती प्रथा प्रचलित नहीं है।
इसी तरह मजहबी रोक के बावजूद भिन्न धर्म और भिन्न जाति में विवाह का प्रचलन भी आम हो गया है और खाप पंचायतों की वजह से यह सामाजिक बदलाव रुका नहीं है और न रुकनेवाला है।
फिरभी समाज में पितृसत्ता का वर्चस्व नहीं टूटने की वजह से स्त्री अभी भी दासी,शूद्र,गुलाम,भोग्या  मानी जाती है।
लैंगिक भेदभाव खत्म नहीं हुआ है और सामाजिक वर्ग वर्ण वर्चस्व,बेदखली और नरसंहार संस्कृति के लिए स्त्री पर अत्याचार,स्त्री उत्पीड़न का सिलसिला लगातार तेज होता जा रहा है।
यह सारा खेल मनुस्मृति के स्थाई बंदोबस्त को भारत के संविधान ,कानून के राज और लोकतंत्र को खत्म करने के लिए चल रहा है तो समझा जा सकता है कि मजहबी सियासत के खिलाड़ियों की कितनी दिलचस्पी स्त्री अस्मिता और स्त्री की स्वतंत्रत्ता और उसके हक हकूक में होने वाली है।
जश्न मानने से पहले हकीकत की तस्वीरों  के अलग अलग रुख को जरुर देख लें।फिजां में बिछी बारुदी सुरंगों का भी तनिक जायजा ले लीजिये।
चूंकि स्त्री मुक्ति प्रसंग में बंगाल के नवजागरण की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है तो इसलिए इस सिलसिले में मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से यह ब्यौरा पेश है,जिसे इस बहुआयामी सामाजिक बदलाव के बारे में हमारी धारणा बन सकती है क्योंकि फिलहाल देश में सामाजिक बदलाव के लिए ऐसा कोई आंदोलन नहीं चला रहा है और सत्ता की राजनीति से समाज और धर्म को बदलने की मुहिम उसी हिंदुत्व के एजंडे के मुताबिक चल रही है,जिसकी मनुस्मृति व्यवस्था के खिलाफ उन्नीसवी सदी के सामाजिक ांदोलनों की वजह से आज स्त्री अस्मिता और स्वत्त्रता की बात हम कर रहे हैें।

इस अवधि का सुव्यव्यस्थित अध्ययन करने वाले इतिहासकार सुशोभन सरकार लिखते हैं, 'अंग्रेज़ी राज, पूँजीवीदी अर्थव्यवस्था और आधुनिक पश्चिमी संस्कृति का सबसे पहला प्रभाव बंगाल पर पड़ा जिससे एक ऐसा नवजागरण हुआ जिसे आमतौर पर बंगाल के रिनेसाँ के नाम से जाना जाता है। करीब एक सदी तक बदलती हुई आधुनिक दुनिया के प्रति बंगाल की सचेत जागरूकता शेष भारत के मुकाबले आगे रही। इस लिहाज़ से कहा जा सकता है कि भारत के आधुनिक जागरण में बंगाल द्वारा निभायी गयी भूमिका की तुलना युरोपीय रिनेसाँ के संदर्भ में इटली की भूमिका से की जा सकती है।' इतालवी रिनेसाँ की ही तरह बंगाल का नवजागरण कोई जनांदोलन नहीं था। इसकी प्रक्रिया और प्रसार भद्रलोक (उच्च वर्गों) तक ही सीमित था। भद्रलोक में भी नवजागरण का प्रभाव अधिकतर उसके हिंदू हिस्से पर ही पड़ा। इस दौरान कुछ मुसलमान हस्तियाँ भी उभरीं (जैसे, सैयद अमीर अली, मुशर्रफ हुसैन, साके दीन महमूद, काज़ी नज़रुल इस्लाम और रुकैया सखावत हुसैन), पर बंगाल का नवजागरण आंशिक रूप से ही मुसलमान नवजागरण कहा जा सकता है। मोटे तौर पर माना जाता है कि बंगाल के नवजागरण की शुरुआत राममोहन राय से हुई और रवींद्रनाथ ठाकुर के साथ उसका समापन हो गया। सुशोभन सरकार ने इसे पाँच चरणों में बाँट कर देखने का प्रयास किया है : पहली अवधि 1814 से 1933, जिसकी केंद्रीय हस्ती राजा राममोहन राय थे। 1814 में वे कोलकाता रहने के लिए आये और 1933 में उनका लंदन में देहांत हुआ। दूसरी अवधि उनकी मृत्यु से 1957 के विद्रोह तक जाती है। तीसरी अवधि 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना तक फैली हुई है। चौथी अवधि 1905 में बंगाल के विभाजन तक और पाँचवीं अवधि स्वदेशी आंदोलन से असहयोग आंदोलन और महात्मा गाँधी के नेतृत्व की शुरुआत तक यानी 1919 तक मानी गयी है। राममोहन राय के बारे में एक दृष्टांत है जिसे उनकी शख्सियत के रूपक की तरह पढ़ा जा सकता है। कहा जाता है कि उनके दो घर थे। खान-पान, वेषभूषा और रहन-सहन के लिहाज़ से एक में किसी विक्टोरियन जेंटिलमेन की भाँति रहते थे और दूसरे में पारम्परिक बंगाली ब्राह्मण की तरह। दरअसल, उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी पूर्व और पश्चिम का संश्लेषण। लेकिन, यह दृष्टांत भी उनके रूढ़िभंजक व्यक्तित्व को परिभाषित नहीं करता। 1820 में उनकी कृति 'परसेप्ट्स ऑफ़ जीसस' का प्रकाशन हुआ जिसमें ईसा के नैतिक संदेश को ईसाई तत्त्वज्ञान और चमत्कार कथाओं से अलग करके पेश किया गया था। बंगाल में सक्रिय ईसाई पादरी वर्ग उनकी इस कोशिश से नाराज़ हो गया। उसके विरोध के परिणामस्वरूप राममोहन राय ने ईसाई जनता के नाम तीन अपीलें जारी करके अपने विचारों को और स्पष्टता प्रदान की। इसी के साथ उन्होंने ब्राह्मनीकल मैग़ज़ीन का प्रकाशन करके हिंदू आस्तिकता के वैचारिक नैरंतर्य को वेदों के हवाले से रेखांकित करने की चेष्टा भी की। राममोहन ने अपने धार्मिक विचारों को धरती पर उतारने के लिए 20 अगस्त 1828 को 'ब्रह्म सभा' का गठन किया। इस प्रक्रिया का परिणाम 1830 में एक चर्च की स्थापना के रूप में निकला और ब्रह्म समाज आंदोलन शुरू हुआ जो लम्बे समय तक बंगाली समाज की चेतना को प्रभावित करता रहा। 1818 से 1829 के बीच राममोहन राय ने सती प्रथा जैसी बुराई पर आक्रमण करते हुए तीन रचनाएँ प्रकाशित कीं। सती प्रथा के ख़िलाफ़ जनमत बनाने और अंग्रेज़ों को उस पर प्रतिबंध लगाने के लिए मनाने का श्रेय उनके प्रयासों को ही दिया जाता है। राममोहन ने आधुनिक शिक्षा और विशेष तौर से स्त्री शिक्षा के प्रसार में अगुआ भूमिका निभायी। उन्हें बांग्ला गद्य का निर्माता भी कहा जाता है।
बंगाल रिनेसाँ के इस दौर में राममोहन के प्रयासों को दोहरे विरोध का सामना करना पड़ा। एक तरफ़ उनका विरोध राधाकांत देब, गौरीकांत भट्टाचार्य और भवानी चरण बनर्जी जैसे सुधार विरोधी परम्परानिष्ठ लेखक और विद्वान कर रहे थे, वहीं उन्हें फ़्रांसीसी क्रांति और इंगलिश रैडिकलिज़म से अनुप्राणित आलोचना का भी सामना करना पड़ा जिसका नेतृत्व 'यंग बंगाल' और उसके एंग्लो-इण्डिन नेता हेनरी विवियन डेरॉज़ियो के हाथों में था। यह अलग बात है कि डेरॉज़ियो के अनुयायी अपने कामों और वक्तृताओं से समाज को चौंकाने के अलावा कोई स्थाई असर नहीं डाल पाये। लेकिन, राममोहन की परम्परा के आधार पर समाज सुधारों का नरम कार्यक्रम उनकी मृत्यु के बाद भी जारी रहा। उसकी कमान देवेंद्रनाथ ठाकुर और अक्षय कुमार दत्त के हाथों में थी। इसी दौरान ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने बाल विवाह और बहुविवाह के ख़िलाफ़ मुहिम चलायी। हालाँकि यंग बंगाल आंदोलन 1842 में विधवा विवाह के पक्ष में आवाज़ उठा चुका था, पर विद्यासागर के प्रयासों से ही इसे लोकप्रिय आंदोलन का रूप मिला।
1857 के विद्रोह के बाद बंगाल के पुनर्जागरण ने साहित्यिक क्रांति और उसके ज़रिये राष्ट्रवादी चिंतन के युग में प्रवेश किया। नील की खेती करवाने वाले अंग्रेज़ों के जुल्मों के ख़िलाफ़ किसानों के संघर्ष में बंगाली बुद्धिजीवियों ने भी अपनी आवाज़ मिलायी। दीनबंधु मित्र के नाटक 'नील दर्पण' ने बंगाल के मानस को झकझोर दिया। माइकेल मधुसूदन दत्त ने उसका अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित किया जिसके ख़िलाफ़ अदालत ने एक हज़ार रुपये के ज़ुर्माने की सज़ा सुनायी। माइकेल ने 1860 में मेघनाद-वध की रचना करके नयी बंगाली कविता की सम्भावनाओं का उद्घोष किया। 1865 में बंकिम चंद्र चटर्जी का सूर्य उनके पहले ऐतिहासिक उपन्यास दुर्गेशनंदिनी के साथ बंगाली सांस्कृतिक क्षितिज पर उगा। 1873 में विषबृक्ष के ज़रिये उन्होंने सामाजिक उपन्यासों की परम्परा का सूत्रपात किया। 1879 में 'साम्य' शीर्षक से निबंध लिख कर बंकिम ने समतामूलकता और यूटोपियन समाजवाद के प्रति रुझान दिखाया, पर 1882 में आनंदमठ लिख कर वे देशभक्तिपूर्ण पुनरुत्थानवाद की लहर में बह गये। इसी रचना में दर्ज 'वंदेमातरम' गीत भारत के तीन राष्ट्रगीतों में से एक है। साहित्यिक उन्मेष के साथ- साथ बंगाली नवजागरण ने इतिहास लेखन (राजेंद्रलाल मित्र) और समाज-विज्ञान (बंगाल सोशल साइंस एसोसिएशन) के अन्य क्षेत्रों में योगदान की परम्परा का सूत्रपात भी किया। धार्मिक सुधारों और पुनरुत्थानवाद के लिहाज़ से भी यह दौर ख़ासा घटनाप्रद था। एक तरफ़ तो केशव चंद्र सेन के नेतृत्व में युवा ब्रह्म समाजी सुधार आंदोलन की अलख जगाये हुए थे, दूसरी तरफ़ वहाबी असंतोष खदबदा रहा था और नव- हिंदूवाद की पदचाप सुनायी दे रही थी। इसी अवधि में दक्षिणेश्वर के संत रामकृष्ण परमहंस ने अपने चुम्बकीय व्यक्तित्व के माध्यम से सभी धार्मिक आस्थाओं को पवित्र घोषित किया। ईसाई धर्मांतरण को हवा देने वाला प्रोटेस्टेंट उग्रवाद इससे कमज़ोर हुआ और परम्परा के पैरोकारों को थोड़ी राहत मिली। परमहंस के युवा शिष्य स्वामी विवेकानंद ने 1893 में वर्ल्ड रिलीजस कांफ्रेंस में दिये गये अपने भाषण से अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की और अपनी ख़ास शैली के आदर्शवादी राष्ट्रवाद का सूत्रीकरण किया। चार साल तक पश्चिम का दौरा करके लौटे तो 1897 में उनका राष्ट्रीय नायक की तरह स्वागत किया गया।
1861 के बाद की अवधि तो कुछ इस तरह की थी जिसमें बंगाली बुद्धिजीवी समाज का सबसे प्रिय शब्द 'राष्ट्रीय' बन गया। राजनारायण बोस, नवगोपाल मित्र, ज्योतिरिंद्रनाथ ठाकुर और भूदेव मुखर्जी की अगुआई में कई तरह की गतिविधियाँ चलीं जिनमें हिंदू मेले का आयोजन उल्लेखनीय था जो करीब दस साल तक कोलकाता को आलोड़ित करता रहा। 1870 के बाद की अवधि राजनीतिक आंदोलनों की अवधि थी जिसमें सुरेंद्रनाथ बनर्जी का नेतृत्व उभरा जिन्हें 'बंगाल के बेताज के बादशाह' के तौर पर जाना गया। सुरेंद्रनाथ के जुझारूपन कारण के कारण अंग्रेज़ उनका नाम बिगाड़ कर 'सरेंडर नॉट' बनर्जी भी कहते थे। 1876 में बनर्जी ने 'इण्डिन एसोसिएशन' की स्थापना की जिसके 1883 के राष्ट्रीय सम्मेलन में सभी भारतीयों के लिए एक राष्ट्रीय संगठन बनाने का विचार पैदा हुआ। इसका परिणाम 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ऐतिहासिक स्थापना के रूप में निकला। बंगाली बुद्धिजीवियों कांग्रेस की गतिविधियों में जम कर भागीदारी की और 1903 तक कांग्रेस अधिवेशनों की अध्यक्षता सात बार उनके खाते में गयी। बंगाल ने महाराष्ट्र और पंजाब के साथ मिल कर कांग्रेस के गरमदली धड़े की रचना करने में निर्णायक भूमिका निभायी।
बंगाल के नवजारण के आख़िरी दौर पर गिरीश चंद्र घोष जैसे नाटककार, बंकिम की परम्परा में रमेश चंद्र दत्त जैसे ऐतिहासिक और सामाजिक उपन्यासकार (जिन्हें हम महान आर्थिक इतिहासकार के तौर पर भी जानते हैं), मीर मुशर्रफ़ हुसैन जैसे मुसलमान कवि, जगदीश चंद्र बोस और प्रफुल्ल चंद्र राय जैसे वैज्ञानिकों की छाप रही। लेकिन, रवींद्रनाथ ठाकुर की प्रतिभा के सामने ये सभी प्रतिभाएँ फीकी पड़ गयीं। हिंदू मेले में अपनी देशभक्तिपूर्ण कविताओं के पाठ से सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने वाले रवींद्रनाथ ने अपने रचनात्मक और वैचारिक साहित्य से एक पूरे युग को नयी अस्मिता प्रदान की। उन्होंने अपने युग पर आलोचनात्मक दृष्टि फेंकी। 1901 में अपनी रचना नष्टनीड़ के ज़रिये वे बंगाली रिनेसाँ के ऐसे पैरोकारों को आड़े हाथों लेते नज़र आये जो अपने पारिवारिक जीवन में उन आदर्शों को लागू करने के लिए तैयार नहीं थे। 1913 में गीतांजलि के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले रवींद्रनाथ ने बंग- भंग विरोध और स्वदेशी आंदोलन की राजनीति को सर्वथा नये दृष्टिकोण से देखा। उन्होंने इस आंदोलन में मुसलमानों की न के बराबर भागीदारी पर अफ़सोस जताया और राष्ट्रवाद में निहित अशुभ आयामों की आलोचना प्रस्तुत की। गाँधी के साथ उनकी बहसों में आने वाले भारत की दुविधाओं की झलक देखी जा सकती थी।