Sunday, October 23, 2016

ভাষা পরে, জাতি আগে। ভেবে পুলকিত হই। আর কী হবার থাকে?

Sushanta Kar


এটা বেশ জমেছে অসমিয়া বাঙালি হিন্দুর একাংশ শঙ্কিত আসাম না কাশ্মীর হয়ে যায়। আর অসমিয়া হিন্দু-মুসলমানের আতঙ্ক অসম না ত্রিপুরা হয়ে যায়। দুটোর মধ্যে যে তফাৎ কোথায়, বহু ভেবেচিন্তেও পেলাম না। দুটোরই উৎস ব্যাপক পরজাতি বিদ্বেষ। হিন্দুত্ববাদী আশা করেন, সব মুসলমান হিন্দু হয়ে যাবেন। ঘরওয়াপসি তার চরম নজির। না হলেও মুসলমানে দুর্গাপুজো করাকে যেভাবে কেউ কেউ সাম্প্রদায়িক সম্প্রিতীর নজির হিসেবে দেখেন, প্রতিতুলনাতে মুহরমের তাজিয়াতেও বহু হিন্দু যখন যোগ দেন, সেসব খুব গুরত্ব পায় না সেসব 'অসাম্প্রদায়িক' হিন্দুর ভাবনাতে। অন্যদিকে অসমিয়া মাত্রেরই আশা অসমে সবাই অসমিয়া হয়ে যাবেন। যারা নিজেদের উগ্রজাতীয়তাবাদ বিরোধী বলে ভাবেন, তার মধ্যে বড় অংশ নিজেদের শ্রমিক শ্রেণির মার্ক্সবাদী তাত্ত্বিক বলেও ভাবেন, তাদেরও মনে বড় দুঃখ এতোদিন আসামে থেকেও বাঙালি হিন্দু অসমিয়া হলেন না। মুসলমানের এক অংশ কেমন তরতরিয়ে হয়ে গেছেন। অমলেন্দু গুহের মতো ব্যক্তিত্বের অসমিয়া চর্চা তাই যত সম্নান পায়, হোমেন বরগোঁহাই, বা নিরূপমা বরগোঁহাইর বাংলা চর্চা সেরকম মর্যাদা পায় না। মানে দাঁড়াল এই যে আসামে থাকলে আপনি হয় হিন্দুত্ববাদী হোন, অথবা অসমিয়া। মুসললমানত্ব নিয়ে দাঁড়ালে বহু বাঙালি হিন্দুও ক্ষেপে যাবেন, সেই বাঙালি হিন্দু--যার বাঙালিয়ানাকে সে নিজেও মনে করে ডাস্টবিনে ফেলে দেবার জিনিস। এ ব্যাপারে বরাক ব্রহ্মপুত্রের বাঙালির বিশেষ ইতর বিশেষ নেই। বরাক উপত্যকাতে ১৯ মে এলে শহুরে মধ্যবিত্তেরা কিছু ঢোল পিটিয়ে ১১ শহীদের পুজো টুজো করেন। হিন্দু-মুসলিম ভাই ভাই বলেন। সেসব শহুরে হুজুগে পনা। কেউ কেউ কাগজে এই নিয়ে নিবন্ধ লিখে বাহবা কুড়ান। মনে মনে সবাই জানেন, অসমে থাকতে হলে 'হিন্দুত্বই সেরা পথ'। সেদিন তাই এক কংগ্রেসী নেতাও বলেই ফেললেন, ভাষা পরে, জাতি আগে। ভেবে পুলকিত হই। আর কী হবার থাকে?


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हैकर्स और साइबर अपराधियों के निशाने पर है आपका आधार नंबर भी आधार नंबर बैंक खाते से जोड़ने के बहाने सांसदों पर निशाना तो आम लोगों का क्या हाल होना है पलाश विश्वास


हैकर्स और साइबर अपराधियों के निशाने पर है आपका आधार नंबर भी

आधार नंबर बैंक खाते से जोड़ने के बहाने सांसदों पर निशाना तो आम लोगों का क्या हाल होना है

पलाश विश्वास

माकपा के राज्यसभा सांसद ऋतव्रत बंदोपाध्याय को उनके बैंक एकाउंट को आधार नंबर से जोड़ने के बहाने साइबर अपराधी गिरोह ने टार्गेट बनाने की कोशिश की और तकनीकी तौर पर बेहतर युवा सांसद ने बैंक खाता और डिबिट कार्ड के सिलसिले में उनके सवालों से असल खतरा भांप लिया और तुंरत पुलिस से संपर्क किया।

हुआ यह कि ऋतव्रत के पास एक फोन कल आया और काल करने वाले ने अंग्रेजी में निवेदन किया कि वह एसबीआई की शाखा से बोल रहा है।चूंकि एसबीआई ने  पिन समेत डाटा चुरा लिये जाने की वजह से लाखों डेबिट कार्ड ब्लाक कर लिये हैं,तो उन्हें दोबारा जारी करने के सिलिसले में लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों की समस्य़ा प्रातमिकता के स्तर पर सुलझाने के लिए एसबीआई ने हमें जिम्मेदारी सौंपी है।

सांसद से आधार ब्यौरा के साथ साथ डेबिट कार्ट के ब्यौरे पर लगातार सवाल वह करता रहा इस दलील पर कि ऋतव्रत का बैंक खाता आधार नंबर से जुड़ा नहीं है और वह डेबिट कार्ड का मसला सुलझाने के लिए खाते को आदमर नंबर से जोड़ने के लिए मदद की पेशकश कर रहा था।

सांसद को शक हुआ तो उन्होंने कहा कि अगर आधार नंबर से जुड़ा न होना कोई समस्या है तो उनका सचिव बैंक जाकर यह अधूरा काम पूरा कर सकते हैं।इसपर भी जब पूछताछ का सिलसिला नहीं थमा तो सांसद ने सीधे कह दिया कि वे उसे कोई जानकारी नहीं दे रहे हैं औरइस बारे में पुलिस को सूचित कर रहे हैं।

खास बात तो यह है कि काल करने वालों को उनके बैंक खाते के बारे में सबकुछ मालूम था।राज्यसभा के सांसद के पार्लियामेंट एसबीआई शाखा का खाता आधार नंबर से जुड़ा नहीं है,यह तथ्य ऐसे अपराधी तत्वों के पास कैसे पहुंच गया।क्योंकि पुलिस को टेलीकालर के मोबाइल नंबर का अभी कोई अता पता नहीं मिल रहा है।

सांसद ने पुलिस को जानकारी देने के अलावा भारतीय स्टेट बैंक की चेयरपर्सन अरुंधति भट्टाचार्य को पत्र भी लिखा है।

सांसद ने माना कि चुस्त अंग्रेजी में उनके बैंक काते के बारे में सही जानकारी के सात उनका आधार नंबर जोड़ने की पेशकश से शुरुआत में वे भी दुविधा में पड़ गये थे।

कल ही हमने इस खतरे से आगाह किया था कि आधार नंबर का इस्तेमाल अपराधीि गिरोह कर सकते हैं और बैंक के सुरक्षा इंतजाम इस सिलसिले में धोखाधड़ी रोकने के लिए काफी नहीं है।

जब सीधे भारत के सांसदों को निशाना बनाया जा रहा है आधार नंबर को लेकर तो आधार की जानकारी वाणिज्यिक संस्थाओं और अपराधी गिरोह के हात लगने पर संकट कितना गहरा होगा,इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

कल जिन बिंदुओं पर मैंने आगाह किया था,कृपया उन पर गौर करेंः

केंद्र सरकार ने माल वेयर गोत्र के वाइरल साफ्ट वेयर के जरिये 32 लाख डेबिट कार्ड के तमाम तथ्यों के लीक हो जाने के मामले पर जांच करा रही है तो 130 करोड़ नागरिकों के आधार नंबर से जुड़े तथ्य लीक होने पर वह क्या करेंगी,हमें इसका अंदाजा नहीं है।

देश के सबसे बड़े कारपोरेट वकील इस फर्जीवाड़े से निबटने के लिए आम जनता को भरोसा दिला रहे हैं,लेकिन कुकिंग गैस,बैंकिंग,राशन,वोटर लिस्ट,वेतन,पेंशन,रेलवे जैसे विशाल नेटवर्क से जब सारे तथ्य लीक या हैक हो जाने की स्थिति से सरकार कैसे निपटेगी जबकि सिर्फ बत्तीस लाख डेबिट कार्ड लीक हो जाने से देश की बैंकिंग सिस्टम अभूतपूर्व संकट में है।


देशभर में सिर्फ 32 लाख नहीं, बल्कि 65 लाख डेबिट कार्डों का डाटा चोरी होने की आशंका है।यह संख्या भी आधिकारिक नहीं है।लाखों की तादाद में या करोडो़ं की तादाद में यह डाटाचोरी हुई है या नहीं है,संबंधित बैंको की ओर से अपना कारोबार बचाने की गरज से इसका खुलासा हो नहीं रहा है। भारतीय स्टेट बैंक जिस तरह खुलासा कर रहा है,निजी बैंको में उससे कहीं बड़ा संकट होने के बावजूद वे अपने व्यवसायिक हितों के मद्देनजर जब तक संभव है,कोई जानकारी साझा करने से बचेंगे।बहरहाल अब बैंकों ने अपने ग्राहकों से पिन बदलवाने या फिर मौजूदा कार्ड ब्लॉक कर नया कार्ड देने की कवायद तो शुरू कर दी है। लेकिन सबसे खतरनाक बात तो यह है कि अभी तक किसी भी बैंक ने इस मामले में एफआईआर तक दर्ज नहीं करवाई है और न ही सरकार को इस बारे में कोई सूचना ही दी है।मसलन महाराष्ट्र पुलिस की साइबर सिक्योरिटी ने खुद बैंकों को खत लिखा है।

बैंक प्राथमिक स्तर पर तत्काल पिन नंबर बदलने की बात पर जोर दे रहे हैं। सवाल यह है कि जब बैंकिंग नेटवर्क ही सुरक्षित नहीं है तो नये सिरे से पिन बदलते हुए वह पिन भी हैक हो गया तो आपकी जमा पूंजी का क्या होगा,जिन्हें अपना पेंशन पीएफ वेतन वगैरह बैंक में जमा करना होता है,वे सारे लोग तो रातोंरात कौड़ी कौड़ी के लिए मोहताज हो जायेंगे।

फिर कोई जरुरी नहीं है कि वे तथ्य बैंकिंग सिस्टम से ही लीक हो और बैंकों के तमाम एहतियात के बावजूद वे तथ्य लीक न हों,इसका कोई पुख्ता इंतजाम तकनीक के मामले में सबसे ज्यादा विकसित सिस्टम और देशों के पास भी नहीं है।

बाजार के विस्तार के लिए तेज अबाध लेनदेन के लिए जो डिजिटल पेपरलैस अत्याधुनिक इंतजाम है,उसीके वाइरल हो जाने से नागरिकों की निजता,गोपनीयता असुरक्षित हो गयी है।डिजिटल लेन देन बेशक सुविधाजनक है और यह शत प्रतिसत तकनीक के मार्फत होता है।यह तकनीक मददगार है,इसमें भी कोई शक नहीं है।लेकिन अत्यधिक तकनीक निर्भर हो जाने के बाद वही तकनीक भस्मासुर बनकर आपका काम तमाम कर सकती है।

जल जंगल जमीन से बेदखली की तरह तकनीक से बेदखली की समस्या भी बेहद संक्रामक है।

साइबर अपराधी,अपराधी गिरोह से लेकर कारपोरेट कंपनियों के हाथों में हमारे तमाम तथ्य हमारी उंगलियों की छाप और आंखों की पुतलियों के साथ जमा आधार परियोजना के निजी उपक्रम के सौौजन्य से उपलब्ध हैं।बुनियादी सेवाओं और बुनियादी जरुरतों को पूरा करने के बहाने डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करके कोई भी सरकारी गैरसरकारी और संबंधित नागरिकों से ऐसे बेहद संवेदनशील तथ्यहासिल कर सकते हैं जैसी कोशिश मानीय सांसद के साथ हो चुकी है।

नेट बैंकिंग,एटीएम,डेबिट क्रेडिट कार्ड और मोबाइल बैंकिंग से श्रम और समय की बचत है और कागज की भी बचत है और सारा का सारा ई बाजार इसी कार्ड आधारित लेन देन पर निर्भर है तो वेतन,बीमा,पेंशन समेत तमाम सेक्टर में विनिवेश के तहत जो आम जनता का पैसा लग रहा है,वह निजी खातों से आधार नंबर के जरिये स्थानांतरित हो रहा है और यही आधार नंबर बैकिंग के लिए अब अनिवार्य है।

गौरतलब है कि पैन नंबर में नागरिकों के आय ब्यय का ब्यौरा ही लीक हो सकता है और इसलिए पैन नंबर आधारित बैंकिंग से उतना खतरा नहीं है।लेकिन आधार नंबर कुकिंग गैस से लेकर राशन कार्ड तक के लिए अनिवार्य हो जाने से आधार के साथ साथ आंखों की पुतलियां,उंगलियों की छाप समेत तमाम तथ्य और जानकारिया लीक हो जाने का बहुत बड़ा खतरा है,जिसके मुखातिब अब हम हैं।

सिर्फ शेयर बाजार तक यह संकट सीमाबद्ध नहीं है। सामाजिक परियोजनाों के माध्यम से एकदम सीमांत लोगों,गरीबी रेखा के नीचे गुजर बसर करने वाले लोगों को भी दिहाड़ी और योजना लाभ,कर्ज वगैरह का भुगतान गैस सब्सिडी की तर्ज पर आधार नंबर से नत्थी कर दिया गया है।जिससे उनके बारे में भी कोई तथ्य गोपनीय नहीं है।

कुल मिलाकर नागरिकों के तमाम तथ्य डिजिटल तकनीक के जरिये जिस तरह सारकारी खुफिया निगरानी के लिए उपलब्ध हैं,उसीतरह बाजार के विस्तार के लिए ये तमाम तथ्यई मार्केट और ईटेलिंग के जरिये देशी विदेशी निजी कंपनियों को उपलब्ध हैं।जब सीधे प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का संदेश पाकर आप फूले नहीं समाते और कभी यह समझने की कोशिश नहीं करते कि आपका सेल नंबर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को कैसे उपलब्ध हैं,उसीतरह चौबीसों घंटे रंग बिरंगे काल सेंटर से आपके नंबर पर होने वाले फोन से आपको अंदाजा नहीं लगता कि आपके बारे में तमाम तथ्य उन कंपनियों के पास हैं,जिसके लिए वे बाकायदा आपको टार्गेट कर रहे होते हैं।

बिल्कुल इसीतरह दुनियाभर के अपराधी,माफिया और हैकर के निशाने पर आप रातदिन हैं और मौजूदा बैंकिंग संकट सिर्फ टिप आप दि आइसबर्ग है।अब तो गाइडेड मिसाइल के साथ साथ गाइडेड बुलेट तक तकनीक विकसित है और आप रेलवे टिकट या ट्रेन टिकट बुकिंग के लिए जो तथ्य डिजिटल माध्यम से हस्तांतरित कर रहे हैं,किस प्वाइंट पर वे लीक या हैक हो सकते हैं,इसका अंदाजा किसी को नहीं है।

बांग्ला दैनिक एई समय ने सांसद ऋतव्रत की आपबीती आज पहले पेज पर प्रकाशित की है।



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Friday, October 21, 2016

महत्वपूर्ण खबरें और आलेख हर दसवां आदिवासी अपनी जमीन से विस्थापित


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Thursday, October 20, 2016

सत्ता समीकरण साधने के लिए कश्मीर में बाहरी हस्तक्षेप की जमीन बना दी! बंगाल और असम में कश्मीर से भी खतरनाक हालात! कारपोरेट विश्वव्यवस्था के शिकंजे में हैं हमारी राजनीति और राजनय और नागरिकों का सीधे तौर पर सांप्रदायिक ध्रूवीकरण हो चुका है। फिजां कयामत है और पानियों में आग दहकने लगी है।हवाओं में विष के दंश हैं।पांव तले जमीन खिसकने लगी है।हिमालय के उत्तुंग शिखरों में ज्वालामुखियो�

सत्ता समीकरण साधने के लिए कश्मीर में बाहरी हस्तक्षेप की जमीन बना दी!

बंगाल और असम में कश्मीर से भी खतरनाक हालात!

कारपोरेट विश्वव्यवस्था के शिकंजे में हैं हमारी राजनीति और राजनय और नागरिकों का सीधे तौर पर सांप्रदायिक ध्रूवीकरण हो चुका है।

फिजां कयामत है और पानियों में आग दहकने लगी है।हवाओं में विष के दंश हैं।पांव तले जमीन खिसकने लगी है।हिमालय के उत्तुंग शिखरों में ज्वालामुखियों के मुहाने खुलने लगे हैं।खानाबदोश मनुष्यता की स्मृतियों में जो जलप्रलय की निरंतरता है,उसमें अब रेगिस्तान की तेज आंधी है।

पलाश विश्वास


फिजां कयामत है और पानियों में आग दहकने लगी है।हवाओं में विष के दंश हैं।पांव तले जमीन खिसकने लगी है।हिमालय के उत्तुंग शिखरों में ज्वालामुखियों के मुहाने खुलने लगे हैं।खानाबदोश मनुष्यता की स्मृतियों में जो जलप्रलय की निरंतरता है,उसमें अब रेगिस्तान की तेज आंधी है।

अपनी मुट्ठी में कैद दुनिया के साथ जो खतरनाक खेल हमने शुरु किया है,वह अंजाम के बेहद नजदीक है।हम परमाणु विध्वंस के मुखातिब हो रहे हैं।

असंगठित राष्ट्र,असंगठित समाज और खंडित परिवार में कबंधों के कार्निवाल में अराजक आदिम असभ्य बर्बर दुस्समय के शिकंजे में हम अनंत चक्रव्यूह के अनंत महाभारत में हैं।

1973 से,तैतालीस साल से मैं लिख रहा हूं।पेशेवर पत्रकारिता में भारत के सबसे बड़े मीडिया समूहों में छत्तीस साल खपाने के बावजूद कोई मंच ऐसा नहीं है ,जहां चीखकर हम अपना दिलोदिमाग खोलकर आपके समाने रख दें या हमारे लिए इतनी सी जगह भी कहीं नहीं है कि हम आपको हाथ पकड़कर कहीं और किसी दरख्त के साये में ले जाकर कहें वह सबकुछ जो महाभारत के समय अपनी दिव्यदृष्टि से अंध धृतराष्ट्र को सुना रहा था।

धृतराष्ट्र सुन तो रहे थे आंखों देखा हाल ,लेकिन वे यकीनन कुछ भी नहीं देख रहे थे।संजोग से वह दिव्यदृष्टि हमें भी कुछ हद तक मिली हुई है और हमारी दसों दिशाओं में असंख्य अंध धृतराष्ट्र अपने कानों के अनंत ब्लैक होल के सारे दरवाजे खोलकर युद्धोन्माद के शित्कार से अपने इंद्रियों को तृप्त करने में लगे हैं।जो दृश्य हमारी आंखों में घनघटा हैं,उन्हें हम साझा नहीं कर सकते।

हालात बेहद संगीन है।मैं कहीं चुनाव में आपसे अपने समर्थन में वोट नहीं मांग रहा हूं।मुझे देश में या किसी सूबे में राजनीतिक समीकरण साधकर सत्ता हासिल भी नहीं करना है।हम मामूली दिहाड़ी मजदूर हैं और किसी पुरस्कार या सम्मान के लिए मैंने कभी कुछ लिखा नहीं है।डिग्री या शोध के लिए भी नहीं लिखा है।जब तक आजीविका बतौर नौकरी थी, पैसे के लिए भी नहीं लिखा है।आज भी पैसे के लिए लिखता नहीं हूं।आजीविका बतौर अनुवाद की मजदूरी करता हूं जो अभी छह महीने में शुरु भी नहीं हुई है।

मुझे आपकी आस्था अनास्था से कुछ लेना देना नहीं है और न आपके धर्म कर्म के बारे में कुछ कहना है।पार्टीबद्ध भी नहीं हूं मैं।अकारण सिर्फ शौकिया लेखन बतौर आजतक मैंने एक शब्द भी नहीं लिखा है।समकालीन यथार्थ को यथावत संबोधित करने का हमेशा हमारा वस्तुनिष्ठ प्रयास रहा है।यही हमारा मिशन है।

मुझे सत्ता वर्चस्व का कोई डर नहीं है।मुझे असहिष्णुता का भी डर नहीं है।मेरे पास रहने को घर भी नहीं है तो कुछ खोने का डर भी नहीं है। मेरी हैसियत सतह के नीचे दबी मनुष्यता से बेहतर किसी मायने में नहीं है तो उस हैसियत को खोने के डर से मौकापरस्त बने जाने की भी जरुरत मुझे नहीं है।

हमने सत्तर के दशक के बाद अस्सी के दशक का खून खराबा खूब देखा है और तब हम दंगों में जल रहे उत्तर प्रदेश के मेरठ और बरेली शहर के बड़े अखबारों में काम कर रहा था।हवाओं में बारुदी गंध सूंघने की आदत हमारी पेशावर दक्षता रही है और जलते हुए आसमान और जमीन पर जलजला के मुखातिब मैं होता रहा हूं और जन्मजात हिमालयी होने के कारण प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं के बारे में हमारी भी अभिज्ञता है हम यह कहने को मजबूर हैं कि हालात बेहद संगीन हैं।हमारा अपराध इतना सा है कि हम आपको आगाह करने का दुस्साहस कर रहे हैं।

बांग्लादेश युद्ध जीतने के बाद किसी को यह आशंका नहीं थी कि त्रिपुरा,असम और पंजाब से देश भर में खून की नदियां बह निकलेंगी।1965 की लड़ाई के बाद 1971 के युद्ध में कश्मीर में आम तौर पर अमन चैन का माहौल रहा तो समूचे अस्सी के दशक में बाकी देश में खून खराबा का माहौल रहा,वह सिलसिला अब भी खत्म हुआ नहीं है।

इतनी लंबी भूमिका की जरुरत इसलिए है कि हालात इतने संगीन हैं कि इस वक्त खुलासा करना संभव नहीं है।सिर्फ इतना समझ लें कि कश्मीर से ज्यादा भयंकर हालात इस वक्त बंगाल और असम में बन गये हैं।

इतने भयंकर हालात हैं कि अमन चैन के लिहाज से उनका खुलासा करना भी संभव नही है।पूरे बंगाल में जिस तरह सांप्रदायिक ध्रूवीकरण होने लगा है,वह गुजरात से कम खतरनाक नहीं है तो असम में भी गैरअसमिया तमाम समुदाओं के लिए जान माल का भारी खतरा पैदा हो गया है।गुजरात अब शांत है।लेकिन बंगाल और असम में भारी उथल पुथल होने लगा है।

इस बीच कुछ खबरें भी प्रकाशित और प्रसारित हुई हैं।राममंदिर आंदोलन के वक्त उत्तर भारत में जिस तरह छोटी सी छोटी घटनाएं बैनर बन रही थी,गनीमत है कि बंगाल में वैसा कुछ नहीं हो रहा है और हालात नियंत्रण में हैं।चूंकि इस पर सार्वजनिक चर्चा हुई नहीं है तो हम भी तमाम ब्योरे फिलहाल साझा नहीं कर रहे हैं और ऐसा हम अमन चैन का माहौल फिर न बिगड़े,इसलिए कर रहे हैं।

बांग्लादेश में हाल की वारदातों के लिए तमाम तैयारियां बंगाल और पूर्वोत्तर भारत में होती रही है,इसका खुलासा हो चुका है।

अब आम जनता के सिरे से सांप्रदायिक ध्रूवीकरण में बंट जाने के बाद दशकों से राजनीतिक संरक्षण में पल रहे वे तत्व क्या गुल खिला सकते हैं,असम और बंगाल में आगे होने वाली घटनाएं इसका खुलासा कर देंगी।

वोटबैंक की राजनीति के तहत पूरे देश में अस्मिता राजनीति कमोबेश फासिज्म के राजकाज को ही मजबूत कर रही है,फिर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इस राजनीति का समर्थन कितना आत्मघाती होने जा रहा है,यह हम सत्तर,अस्सी और नब्वे के दशकों में बार बार देख चुके हैं और तब सत्ता का रंग केसरिया भी नहीं था।

परमाणु विध्वंस के लिए वोटबैंक दखल के राजनीतिक समीकरण साधने की राजनीति और राजकाज से यह सांप्रदायिक ध्रूवीकरण बेहद तेज होने लगा है और विडंबना यह है कि असंगठित राष्ट्र,असंगठित समाज और खंडित परिवार के हम कबंध नागरिक इस खंडित अंध अस्मिता राष्ट्रवाद के कार्निवाल में तमाम खबरों से बेखबर किसी न किसी के साथ पार्टीबद्ध होकर नाचते हुए तमाम तरह के मजे ले रहे हैं और मुक्त बाजार में अबाद पूंजी प्रवाह की निरंकुश क्रयशक्ति की वजह से हमारा विवेक,सही गलत समझने की क्षमता सिरे से गायब है।

हम बार बार आगाह कर रहे हैं कि ये युद्ध परिस्थितियां कोई भारत पाक या कश्मीर विवाद नहीं है।बल्कि कारपोरेट विश्वव्यवस्था के तहत सुनियोजित संकट का सृजन है।जैसे पाकिस्तान की फौजी हुकूमत ने पूर्वी पाकिस्तान की आम जनता का दमन का रास्ता अख्तियार करके बांग्लादेश में भारतीय सैन्य हस्तक्षेप की परिस्थितियां बना दी थी,हम उस इतिहास से कोई सबक सीखे बिना कश्मीर की समस्या सुलझाने के बजाये उसे सैन्य दमन के रास्ते उलझाते हुए अपनी आत्मघाती राजनीति और राजनय से कश्मीर में बाहरी हस्तक्षेप की जमीन मजबूत करने लगे हैं।

पाकिस्तान की फौजी ताकत और हथियारों की होड़ में उसकी मौजूदा हैसियत चाहे कुछ भी हो ,भारत का उससे कोई मुकाबला नहीं है क्योंकि सन 1962,सन 1965 और सन 1971 की लड़ाइयों और अंधाधुंध रक्षा व्यय के बावजूद भारत में लोकतंत्र पर सैन्यतंत्र का वर्चस्व कभी बना नहीं है।

भारत में युद्धकाल से निकलकर विकास की गतिविधियां जारी रही हैं और हर मायने में भारतीय अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर रही है तो सत्ता परिवर्तन के बावजूद राजनीतिक अस्थिरता सत्तर के दशक के आपातकाल के बावजूद कमोबेश भारत राष्ट्र के लोकतांत्रिक ढांचे को तोड़ नहीं सका है।

जबकि पाकिस्तान में लोकतंत्र उस तरह बहाल हुआ ही नहीं है।लोकतांत्रिक सरकार पर फौज हावी होने से पाकिस्तान में युद्ध परिस्थितियां उसके अंध राष्ट्रवाद के लिए अनिवार्य है और भारत विरोध के बिना उसका कोई वजूद है ही नहीं।

इसी वजह से पाकिस्तान लगातार अपनी राष्ट्रीय आय और अर्थव्यवस्था को अनंत युद्ध तैयारियों में पौज के हवाले करने को मजबूर है और इसीलिए उसकी संप्रभुता अमेरिका ,चीन और रूस जैसे ताकतवर देशों के हवाले हैं।यह भारत की मजबूरी नही है।

हमारी राजनीति चाहे कुछ रही हो,अबाध पूंजी निवेश और मुक्त बाजार के बावजूद राष्ट्रनिर्माताओं की दूर दृष्टि की वजह से हमारा बुनियादी ढांचा निरंतर मजबूत होता रहा है।विकास के तौर तरीके चाहे विवादास्पद हों,लेकिन विकास थमा नहीं है।अनाज की पैदावार में हम आत्मनिर्भर हैं हालाकि अनाज हर भूखे तक पहुंचाने का लोकतंत्र अभी बना नहीं है। हमें पाकिस्तान की तरह बुनियादी जरुरतों और बुनियादी सेवाओं के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहने की जरुरत नहीं है।

अस्सी के दशक के खून खराबा और नब्वे के दशक में हुए परिवर्तन के मध्य पाकिस्तान से भारत का कबी किसी भी स्तर पर कोई मुकाबला नहीं रहा है।कश्मीर मामले को भी वह अंतरराष्ट्रीिय मंचों पर उठाने में नाकाम रहा है।

पाकिस्तानी फौजी हुकूमत की गड़बड़ी फैलाने की तमाम कोशिशों के बावजूद कश्मीर विवाद अंतर राष्ट्रीय विवाद 1971 से लेकर अबतक नहीं बना था और न तमाम देशों,अमेरिका,रूस या चीन समेत की विदेश नीति में भारत और पाकिस्तन को एक साथ देखने की पंरपरा रही है।

पाकिस्तान राजनयिक तौर पर अमेरिका और चीन का पिछलग्गू रहा है और बाकी दुनिया से अलग रहा है।इस्लमी राष्ट्र होने के बावजूद उसे भारत के खिलाफ इस्लामी देशों से कभी कोई मदद मिली नहीं है और भारतीय विदेश नीति का करिश्मा यह रहा है कि उसे लगातार अरब दुनिया और इस्लामी दुनिया का समर्थन मिलता रहा है।पाकिस्तान हर हाल में अलग थलग रहा है।

ब्रिक्स के गठन के बाद तो चीन ऱूस ब्राजील के साथ भारत एक आर्थिक ताकत के रुप में उभरा है और भारत जहां है,उस हैसियत को हासिल पाकिस्तान ख्वाबों में भी नहीं कर सकता क्योंकि फौजी हुकूमत के शिकंजे से निकले बिना ऐसा असंभव है।

हमारे अंध राष्ट्रवाद ने कश्मीर समस्या को भारत पाक विवाद बना दिया है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को घेरने की अंध राजनय ने हाल में गोवा में हुए ब्रिक शिखर वार्ता के विशुध आर्थिक मंच पर भी बेमतलब कश्मीिर को मुद्दा बना दिया है,जिसकी गूंज अमेरिकी,चीनी,रूसी कूटनीतिक बयानों में सुनायी पड़ रही है।

यह राजनयिक आत्मघात है ,भले ही इस कवायद से किसी राजनीतिक पार्टी को यूपी और पंजाब में सत्ता दखल करने में भारी मदद मिलेगी,लेकिन इस ऐतिहासिक भूल की भारी कीमत हमें आगे अदा करनी होगी।

नागरिकों का विवेक जब पार्टीबद्ध हो जाये तब राष्ट्र और राष्ट्रवाद की चर्चा बेमानी है।

यह बेहद खतरनाक इसलिए है कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में चाहे मैडम हिलेरी जीते या फिर डोनाल्ड ट्रंप,जिन्हें ग्लोबल हिंदुत्व के अलावा पोप का समर्थन भी मिला हुआ है,अमेरिका की तैयारी परमाणु युद्ध की है और आतंकवाद के विरुद्ध अमेरिका के युद्द में पार्टनर होने से तेल कुओं की आग से भारत को बचाना उतना आसान भी नहीं होगा।

कारपोरेट विश्वव्यवस्था के शिकंजे में है हमारी राजनीति और राजनय और नागरिकों का सीधे तौर पर सांप्रदायिक ध्रूवीकरण हो चुका है।

आप चाहे तो हमें जी भरकर गरियायें।सोशल मीडिया पर भी आप हमें आप जो चाहे लिख सकते हैं।हम जैसे कम हैसियत के नामानुष को इससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है,लेकिन जिन खतरों की तरफ हम आपका ध्यान आकर्षित करना चाह रहे हैं,अपनी अस्मिता और अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता से ऊपर उठकर एक मनुष्य और एक भारतीय नागरिक बतौर उन पर तनिक गौर करें तो हम आपके आभारी जरुर होगें।


Wednesday, October 19, 2016

আসামবাসী বাঙালিসমাজ অন্য জনগোষ্ঠীর দ্বারা আক্রান্ত হলে,নিরাপত্তার অলীক আশ্বাসে তারা বাধ্য হয়ে ধৰ্মীয় সাম্প্রদায়িক অপশক্তির পাশে চলে যাবেন,এধরণের কূটকৌশল সমগ্র আসামবাসী অনুধাবন করা খুবই প্রয়োজনীয়।.

বলা বাহুল্য,আসামবাসী এক্ষেত্রে উৎফুল্লিত হয়ে উঠা কিন্তু মোটেও যুক্তিসঙ্গত কথা হবে না,তার সম্ভাবনাও হয়তো নেই বলব। কিন্তু বিক্ষুব্ধ হয়ে উঠলে,সেই ক্ষোভ সঠিক দিকে পরিচালিত নাহলে আসামের মাটি আরও একবার রক্তাক্ত হয়ে উঠবে,সেটা নিশ্চিত বলা যায়।কথাটি কোনো রাখ‌ঢাক না রেখে এভাবেও বলা যায়,যে বিপুল সংখ্যক বাঙালি হিন্দু বাংলাদেশীকে নাগরিকত্ব প্রদান করার প্রস্তুতিতে অন্য ভাষিক জনগোষ্ঠীর মনে বহুমাত্রিক (যেমন সংখ্যালঘু হয়ে পড়ার ভয়, সাংস্কৃতিক আধিপত্যের সংকোচন ইত্যাদি) আশংকার জন্ম দেবে।এই আশংকাজনিত ক্ষোভ সমগ্র বাঙালি সমাজের দিকে ধাবিত হওয়ার সম্ভাবনাই অত্যন্ত প্রবল।তেমন সম্ভাবনার সতর্কবাণী ইতিমধ্যেই কোনো কোনো মানুষের মত-মন্তব্যে প্রতিফলিত হয়েছে,কথাটা খুবই উদ্বেগের কথা কিন্তু। সবাই মনে রাখা ভাল যে সমগ্র বাঙালি সমাজটিই এক্ষেত্রে কোনোভাবেই দায়ী নয়। তাদের বলির পাঠা বানানো এসমস্ত ঘটনাবলীর আড়ালের অপশক্তি কারা,সে বিষয়টি পরিষ্কার হওয়া অত্যন্ত জরুরী কিন্তু। নাহলে যতই তীব্র হোক তাদের সকল বিক্ষোভ-প্রতিবাদ,সবই পথভ্রষ্ট পণ্ডশ্রম হয়ে পড়বে।কথাটা এখানেই শেষ নয়, আসামবাসী বাঙালিসমাজ অন্য জনগোষ্ঠীর দ্বারা আক্রান্ত হলে,নিরাপত্তার অলীক আশ্বাসে তারা বাধ্য হয়ে ধৰ্মীয় সাম্প্রদায়িক অপশক্তির পাশে চলে যাবেন,এধরণের কূটকৌশল সমগ্র আসামবাসী অনুধাবন করা খুবই প্রয়োজনীয়।...আলি ইব্রাহিমের (Ali Ibrahim )অনুবাদে কৌশিক দাসের (Kaushik Das)অসমিয়া নিবন্ধ পড়ুন...
মূল অসমিয়া : কৌশিক দাস বাংলা অনুবাদ : আলি ইব্রাহিম            সং বাদ শিরোনামে এখন নাগরিকত্ব সংশোধনী বিধেয়কের কথাই দখল করে আ...
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নাজিয়া,পায়েল,মিতা।কিছু নাম,কিছু মৃত স্বপ্নের গল্প,প্রচুর প্রশ্ন।



নাজিয়া,পায়েল,মিতা।কিছু নাম,কিছু মৃত স্বপ্নের গল্প,প্রচুর প্রশ্ন।

Arnab

ধুবলিয়া।নদিয়া জেলার দিনের বেশিরভাগ সময় ফাঁকা পরে থাকা এক স্টেশনের নাম।আজ আমাদের গন্তব্য ছিল সেখানেই।আমরা মনে আমি,সায়ন দা, মৃণ্ময়দা,কবিরদা । গিয়ে শুনলাম গ্রাম বাংলার এক হতভাগ্য কন্যার মর্মান্তিক পরিণতির কাহিনী।
গল্পটা শুরু আজ থেকে দেড় বছর আগের।ধুবলিয়ার বাসিন্দা পায়েল হাজরার সাথে বিয়ে হয় রিষড়া নিবাসি এক আপাত দৃষ্টিতে ভদ্রলোক এক ব্যাংকে কর্মরত ব্যক্তির। বিয়ের পর থেকেই শশুর বাড়ির লোকদের অত্যাচারে অতিষ্ট হয়ে ওঠে পায়েলের জীবন।আমাদের থেকে অনেক বেশি সংগ্রাম করতে হয় ওকে কারণ বিপক্ষ নিজের চারদেয়ালের ভেতরে থাকা লোকেরাই।একটু মাথা তুলে বাঁচার লড়াই,একটু নিরাপত্তার লড়াই।

পারেনি।পায়েল পারেনি।গতসপ্তাহে তথা কথিত নিজের আপনজনদের হাতেই খুন হয় পায়েল।মেডিক্যাল রিপোর্টে পাওয়া যায় গলায় চাপ পরে মারা যায় পায়েল।চাপটা যে কোথায় পড়েছিল তা বোধয় স্বয়ং পায়েল ছাড়া কেউ জানে না।

ভাবছো আইন চলবে নিজের পথে...শাস্তি পাবে খুনিরা।না। সেটা হবার নয়।কারণ খুনিরা তো সমাজের উঁচু তোলার লোক।তারা কি খুন করতে পারে ? ববোধয় সে জন্যই পায়েলের শশুর বাড়ির লোকেদের বিরুদ্ধে খুনের অভিযোগের বদলে দেওয়া হয় আত্মহত্যায় প্ররোচনা দেবার অপেক্ষাকৃত লঘু মামলা।নিজের বাড়ির এলাকায় থেকেই পায়েলের শাশুড়ি পুলিশের খাতায় হয়ে যায় ফেরার।অবশেষে জনরোষে পরে তাকর গ্রেফতার করতে বাধ্য হয় পুলিশ।

পায়েল চলে গেল...কিন্তুএমন তো হওয়ার কথা ছিলোনা।পায়েল কে হারিয়ে দেওয়া হলো।হেরে গেলাম আমরা।হেরে গেল গোটা পৃথিবী-ন্যায়, নীতি,ভরসা,স্বপ্ন সব।

লড়াইটা শুরু এখন থেকেই।পায়েলকে জিতিয়ে দেয়ার লড়াই,পায়েলদের জিতিয়ে দেওয়ার লড়াই।

আজ আমরা এবং পায়েলের বন্ধুরা,কাছের লোকরা মিলে ধুবুলিয়াতে মিছিল করে ,বক্তৃতা, স্লোগানে নিয়েছি লড়াই করার এক নতুন শপথ...এক সাথে,হাতে হাত রেখে।

পায়েল হত্যাকাণ্ডের বিচার পেতে এখনও অনেক রাস্তা বাকি সাথী।বাকি অনেক পথ চলার।

আজ হয়তো তুমি বাস্ত ছিলে কিংবা হয়তো এই ব্যাপারটা জানতে না । তাই আজ তোমাদের জানালাম।পরের আন্দোলনের দিন তোমায় সোশ্যাল মিডিয়াতে জানাবো সাথী।আমি কিন্তু সেই লড়াইয়ে আমার হাত ধরার জন্য আরো হাত চাই।সেইদিন রাস্তায় দেখা হবার সাথী।সেদিন হাত ধরবে হাত,আকাশ মাটি ফাটিয়ে উঠবে লড়াইয়ের স্লোগান,সবাই মিলে একসাথে সুস্থ ভাবে বেঁচে থাকার স্লোগান।আজ নাহয় সেই শপথটাই করলাম।দেখা হচ্ছে সাথী।

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ব্রাহ্মণ্যবাদ ও রেড রোডের কার্নিভাল অনিক শর্মা কাশ্যপ


ব্রাহ্মণ্যবাদ ও রেড রোডের কার্নিভাল
অনিক শর্মা কাশ্যপ

সদ্য সমাপ্ত হল বাঙ্গালীর শ্রেষ্ঠ উত্সব দুর্গাপূজা ! যেখানে বাংলার এলিট থেকে মধ্যবৃত্ত ; পথচারী থেকে দীন ভিখারী প্রত্যেকটি মানুষই প্রত্যক্ষ বা পরোক্ষ ভাবেই এই উত্সবের রঙ্গে নিজেকে কিছুটা হলেও রাঙ্গিয়েছে . কারণ এই পূজা বর্তমানে অন্য মাত্রা ধারণ করেছে . যা এতো দিন পর সাধারণ বারোয়ারি প্যান্ডেল থেকে সটান করে রাজ ভবনে উপস্থিত হয়েছে . যার প্রভাব ভারতবর্ষ ছাড়িয়ে সমগ্র বিশ্বের দরবারে আলোড়ন সৃষ্টি করেছে . এতো দিন ভারতের সব চেয়ে বড় গণ উত্সব ছিল মহারাষ্ট্রের গণপতি উত্সব , যার শোভাযাত্রা বা রোড কার্নিভাল ছিল ভারতবাসীর আশা-আকাঙ্ক্ষা . কিন্তু পশ্চিমবঙ্গ এবার সেখানে একটা দাগ এঁকে দিয়ে যোগ করেছে রেড রোডের দুর্গা কার্নিভাল . যার সর্বাগ্রে ছিলেন পশ্চিমবঙ্গ সরকার তথা মাননীয়া মূখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জি . 
কিন্তু হঠাত্ করে এই দুর্গা কার্ণিভালের আয়োজন কেন ? কেউ কি একবার ভাবার চেষ্টা করেছেন ? 
অনেকে হয়তো বলবেন এটা , "এটা রাজনীতি , জনগণকে আকৃষ্ট করার কৌশল" . আমি বলবো বন্ধু , "না" . ব্রাহ্মণ্যবাদ বোঝা এতো সহজ নয় . শুধু মাত্র রাজনৈতিক উদ্দ্যেশ্য সফল করার জন্য এই দুর্গা কার্ণিভালের আয়োজন করা হয়নি . এর পেছনে অনেক বড় উদ্দ্যেশ্য আছে .
আপনারা হয়তো বিভিন্ন খবরের কাগজে দেখে থাকবেন . এবছর কি হারে "অসুর স্মরণ উত্সব" বা "হুদুর দুর্গা স্মরণ উত্সব" পালিত হয়েছে . যা পুরুলিয়া বাঁকুড়ার আদিবাসী পরগণা ছাড়িয়ে নদীয়া 24 পরগণা মালদহ মুর্শিদাবাদ তথা সমগ্র পশ্চিমবঙ্গের সভ্য সমাজও গ্রহণ করেছে . পরিসংখান বলছে , এবছর পশ্চিমবঙ্গে 900 থেকে 1000 জায়গায় এই "অসুর স্মরণ উত্সব" পালিত হয়েছে . যা দেখে তো আমাদের মাননীয়া মূখ্যমন্ত্রীর চক্ষু চড়কগাছ . সুতরাং ব্রাহ্মণ্যবাদকে টিকিয়ে রাখতে হলে এর বিপরীত কিছু মিরাক্কেল ঘটাতেই হবে . তাই তড়িঘড়ি করে আয়োজন করলেন "রেড রোডে দুর্গার কার্নিভাল . যাতে খুব সহজেই বস করা গেল ধর্মীয় আবেগ প্রবণ বাঙ্গালী সমাজকে . 
এটাই হল সূক্ষ্ম ব্রাহ্মণ্যবাদ ! কবে বুঝবেন আপনারা ? ? ?

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