Sunday, August 7, 2016

কলরব মনুষত্বের কোলকাতার রাজপথে


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Saturday, August 6, 2016

बांग्लादेश के इस्लामी आतंकवादी ही नहीं,भारत में बहुजनों के सफाये पर तुले सत्तावर्ग विभाजनपीड़ित हिंदुओं के सफाये पर आमादा है। कोलकाता में लगातार तीन दिन बहुजनों का भारी प्रदर्शन विभाजन पीड़ितों ने धर्मोन्माद के खिलाफ ऐतिहासिक जुलूस निकाला।हजारों महिलाएं और मतुआ शामिल थे इस जुलूस में।बंगाल में हवा बदली तो बाकी देश पर असर लाजिमी। तेजी से सीरिया बन रहे बांग्लादेश के धर्मोन्म�


बांग्लादेश के इस्लामी आतंकवादी ही नहीं,भारत में बहुजनों के सफाये पर तुले सत्तावर्ग विभाजनपीड़ित हिंदुओं के सफाये पर आमादा है।

कोलकाता में लगातार तीन दिन बहुजनों का भारी प्रदर्शन

विभाजन पीड़ितों ने धर्मोन्माद के खिलाफ ऐतिहासिक जुलूस निकाला।हजारों महिलाएं और मतुआ शामिल थे इस जुलूस में।बंगाल में हवा बदली तो बाकी देश पर असर लाजिमी।

तेजी से सीरिया बन रहे बांग्लादेश के धर्मोन्माद से पूरे एशिया को खतरा और कहीं भी कोई सुरक्षित नहीं है।


पलाश विश्वास


बंगाल में भी हवा बदलने लगी है।परसो बहुजनसमाज पार्टी का जुलूस निकला देशभर में दलित उत्पीड़न के खिलाफ तो कल बंगाली विभाजन पीड़ितों का महाजुलूस निकला कोलकाता की सड़कों पर।


निखिल भारत उद्वास्तु समन्वय समिति  का अराजनैतिक ऐतिहासिक जुलूस निकला बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए,धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद और आतंक,हिंसा , नरसंहार और बलात्कार अभियान,बेदखली के खिलाफ,भारतभर में हो रहे दलित उत्पीड़न के विरुद्ध और विभाजनपीड़ितों की नागरिकता,मातृभाषा और सभी राज्यों में अनुसूचितों को आरक्षण की मांग लेकर।


निखिल भारत उद्वास्तु समन्वय समिति  की ओर से कोलकाता में बांग्लादेश हाईकमीशन को ज्ञापन भी दिया गया।


इस महाजुलूस में मतुआ अनुयायियों के साथ बंगाल में बहुजनों और शरणार्थियों के सारे सगठनों के कार्यकर्ता नेता उपस्थित थे।


सियालदह से निकलकर धर्मतल्ला तक पहुंचकर धरना सभा में बदले इस जुलूस में मतुआ नगाड़े से लेकर बांग्ला कविगान के अलग अलग रंग थे और शाम को रिमझिम बारिश तक जारी इस अभूतपूर्व प्रदर्शन में सुंदरवन इलाके की विधवाओं समेत दो हजार से ज्यादा महिलाएं थीं।


निखिल भारत उद्वास्तु समन्वय समिति के अध्यक्ष डा. सुबोध विश्वास और महासचिव एटवोकेट अंबिका राय से लेकर मतुआ गवेषक डां.विराट वैद्य और बंगाल के सबसे लोकप्रियलोककवि असीम सरकार तक ने सीमाओं के आर पार अमन चैन बहाल रखने के हक में आवाज बुलंद की तो 2003 साल के काला नागरिकता कानून रद्द करने की भी मांग की वक्ताओं ने दलित उत्पीड़न रोकने की मांग की तो सुंदरवन इलाके की महिलाओं और अन्य लोगों के हक हकूक की लड़ाई जारी रखने की भी शपथ ली।


कोलकाता में परसो और कल निकले जुलूसों की कोलकाता के टीवी चैनलों और अखबारों में कोई खबर नहीं थी।बहरहाल निखिल भारत के प्रदर्शन पर सिर्फ एक बांग्ला अखबार युगशंख ने खबर बनायी औऱ एक टीवी चैनल ने कुछ फुटेज दिखाये।आज फिर कोलकाता में बहुजनों और छात्रों का भारी जुलूस कालेज स्क्वायर से निकला।मीडिया में अभीतक यह खबर नहीं दिख रही है।


देशभर में दलितों और बहुजनों के आंदोलन की जो सुर्खियां बनती हैं और बन रही हैं,वे बंगाल में असंभव है।बंगाल में मीडिया बिना राजनीति से नत्थी बहुजनों के किसी आयोजन की खबर नहीं बनाता।


फिरभी कहना होगा कि बंगाल में हवा इस नस्ली रंगभेदी वर्चस्व के बावजूद तेजी से बदल रही है।शुरुआत नवजागरण से जुड़े भारत सभा हाल में बाबासाहेब के जाति उन्मूलन के एजंडे पर छात्रों की संगोष्ठी से हुई।


फिर यादवपुर विश्वविद्यालय,कोलकाता विश्वविद्यालय,आईआईएम कोलकाता, आईआईटी खड़गपुर से लेकर विश्वभारती के छात्र संस्थागत हत्या के शिकार रोहित वेमुला की प्रेरणा से जात पांत से आजादी की आवाज बुलंद करने लगे।


कोलकाता में लगातार तीसरे दिन दलित उत्पीड़न के खिलाफ,धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद और हिंसा के खिलाफ, नागरिकता कानून के खिलाफ देशभर के विभाजन पीड़ित बंगाली शरणार्थियों के साथ सात बंगाल के सुंदरवन इलाके की बहुजन शरणार्थी आबादी के हकहकूक के लिए जो जुलूस निकले और खास तौर पर शरणार्थी जुलूस में हजारों महिलाओं की भागेदारी इस बदलती हुई हवा के सबूत हैं,जिसे मीडिया दर्ज करने से इंकार कर रहा है।


उस पार बांग्लादेश तेजी से धर्मनिरपेक्ष,लोकतातांत्रिक और प्रगतिशील ताकतों के हाथों से बेदखल होकर इस्लामी आतंकवादियों के हवाले हो रहा है।


जो ताकतें,जो रजाकर वाहिनी 1971 के नरसंहार और थोक देशव्यापी बलात्कार अभियान में हमलावर हत्यारी पाक फौजों से बढ चढ़कर कहर बरपा रही थीं,जो बांग्लादेश की स्वतंत्रता और उसमें भारत की भूमिक के सख्त खिलाफ रही हैं,वे अब बांग्लादेश में युद्धअपराधियों की फांसी के बाद हर हालत में वहां अबभी रह गये करीब ढाई करोड़ हिंदुओं,बौद्धों,ईसाइयों,आदिवासियों के सपाये के साथ साथ हसीना की सरकार के तख्ता पलट और बंगालादेश में धर्मनिरपेक्ष लोकतातांत्रिक प्रगतिशील ताकतों का सफाया करने पर आमादा हैं।


वे बांग्ला राष्ट्वाद की बजाय इस्लामी राष्ट्रवाद के तहत बांग्लादेश को विशुद्ध इस्लामी राष्ट्र बनाने के लिए गैरमुसलमानों का सफाया कर देना चाहते हैं और ग्लोबल आतंकगिरोह इनके जरिये बांग्लादेश को तेजी से सीरिया बनाने लगे हैं।


यह मसला अब सिर्फ अल्पसंख्यक उत्पीड़न,बेदखली और नरसंहार तक सीमाबद्ध नहीं है।सीरिया ने जिसतरह दुनियाभर में शरणार्थी सैलाब पैदा कर दिया और अभूतपूर्व हिंसा,आतंक और नरसंहार का ग्लोबीकरण कर दिया,जिस आग से समूचा यूरोप जल रहा है सिर्फ अरब वसंत के शिकंजे में फंसी अरब दुनिया नहीं,वैसा कुछ बांग्लादेश में दोहराने की तैयारी है।


सीरिया जिसतरह आतंकवादियों के शिकंजे में एक बेहद रणनीतिक भूगोल है,बांग्लादेश भी वही बनने जा रहा है।जो देर सवेर सीरिया से ज्यादा विस्पोटक बनने जा रहा है।


इससे शरणार्थी समस्या तो जटिल होगी ही,भारत और एशिया के दूसरे देशों में युद्ध और गृहयुद्ध का माहौल तैयार हो रहा है।


सीमावर्ती राज्यों बंगाल,बिहार,असम,समूचे पूर्वोत्तर में इन्हीं धर्मोन्मादी जिहादियों की गहरी पैठ हो गयी है,जिससे भारत में कहीं भी कुछभी घटित हो सकता है।


असम और पूर्वोत्तर में पहले से अनेक भारतविरोधी संगठन सक्रिय हैं और विभिन्न राज्यों में सत्ता में भी उनकी भागेदारी है।


अब इन राज्यों में या बंगाल और बिहार में स्लीपिंग सेल,शेल्टर का जो आलम है,बांग्लादेश के लगातार सीरिया बनते जाने के बाद कल असम में कोकराझाड़ में जो आतंकवादी हमला हो गया,उसी तर्ज पर कहां कौन सा आतंकवादी गिरोह क्या करेगा,इसका अंदाजा लगाया नहीं जा सकता।


हालातत हसीना सरकार के नियंत्रण से बाहर हैं और इसी के खिलाफ शरणार्थियों के महाजुलूस को जैसे ब्लैक आउट कर दिया गया,वह बंगाल के सभी क्षेत्रों में काबिज सत्तावर्ग की मानसिकता है,जिसने पूर्वी बंगाल को भारत विभाजन के जरिये भारत से सिर्प अलहदा नहीं किया,वहां की बहुजन दलित आबादी को इतिहास भूगोल के दायरे से बाहर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।


विभिन्न राज्यों में बसे शरणर्थी फिर बी बेहतर हालत में हैं जहां उन्हें कमोबेश पुनर्वास और रोजगार मिला है।लेकिन बंगाल में पुनर्वास के नाम पर घर के लिए जमीन का पट्टा पुराने शरणार्थी शिविरों रानाघाट,धुबुलिया, ताहेर पुर और त्रिवेणी जैसे इक्के दुक्के इलाके में दिया गया।


शरणार्थियों ने कोलकाता के उत्तर दक्षिण पूर्व पश्चिम में हर उपनगर कस्बे में जो सैकड़ो कालोनियां बसायीं,उनको राजनीतिक वोटबैक बनाने के अलावा कुछ किया नहीं है।


1947 के विभाजन के बाद जो शरणार्थी बंगाल में रह गये और खासतौर पर जो 1971 के बाद आये,उनको शत्रु समझता है बंगाल का सत्तावर्ग।


इसी वजह से बंगाल के सत्ता वर्ग ने उनकी नागरिकता,पुनर्वास और संरक्षण की कोई आवाज नहीं उठायी और विभिन्न राज्यों में बसे इन शरणार्थियों के देश निकाले के लिए बंगाली सत्ता वर्ग की सर्वदलीय सहमति के साथ 2003 के नागरिकता संशोधन कानून के तहत इन्हें एकमुश्त बेनागरिक कीड़े मकोड़ो में तब्दील कर दिया गया,जिन्हें कहीं भी कभी भी कुचला जा सकता है।


और खास बात ये हैं कि ये विभाजन पीड़ित हिंदू शरणार्थी अपने हिंदुत्व के खातिर धर्मांतरण से बचने के लिए नरकयंत्रणा बर्दाशत करके भारत आये और इनमें से निनानब्वे फीसद वे दलित हैं जो हरिचांद गुरुचांद ठाकुर की अगुवाई में दलित आंदोलन में शामिल थे तो इन्हींके नेता जोगेन्द्र नाथ मंडल और मुकुन्द बिहारी मल्लिक की अगुवाी में पूर्वी बंगाल ने बाबासाहेब अंबेडकर को चुनकर संसद भेजा।


बांग्लादेश के इस्लामी आतंकवादी ही नहीं,भारत में बहुजनों के सफाये पर तुले सत्तावर्ग विभाजनपीड़ित हिंदुओं के सफाये पर आमादा है।


बंगाल का शरणार्थी आंदोलन अब तक विशुद्ध तौर पर राजनीतिक रहा है।

सत्ता वर्ग की राजनीति के तहत बंगाल में सत्तावर्ग के हितों के मुताबिक शरणार्थी और दलितआंदोलन होते रहे हैं।इसलिए बंगाल में बहुजनों के हित में बदलाव की बयार भी निषिद्ध है।


बाकी देश में दलितों,शरणार्थियों और बहुजनों,आदिवासियों और अल्पसख्यकों के हक हकूक के आंदोलन को जिस तरह सभी वर्गों को समर्थन मिलता है,बंगाल में वह असंभव है।

निखल भारत बंगाली उद्वास्तु समिति अराजनीतिक संगठन है और बारत के बाइस राज्यों में उसके सक्रिय संगठन हैं।उत्तर भारत से लेकर महाराष्ट्र और दंडकारण्य,आंध्र और कर्नाटक,असम और त्रिपुरा में वे शरणार्थियों के हक हकूक का आंदोलन चला रहे हैं।हाल में उन्होंने छत्तसगढ़ विधानसभा का घेराव किया और असम और त्रिपुरा में बी उन्हें भारी समर्थन मिला है।

उनके कोलकाता अभियान की भारी कामयाबी और रलागतार छात्रों और युवाओं के समर्थन के साथ तेज हो रहे अंबेडकरी आंदोलन की सुर्खियां भले न बने,अब यह तयहै कि बंगाल में भी हवा बदल रही है और इतिहाल गवाह है कि बंगाल की वहा का असर बाकी देश पर बेहद गहरा और व्यापक होता है।


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ইতিহাস ভূগোলের বাইরে ফেলে দেওয়া কোটি কোটি মানুষের কন্ঠে কলরব মনুষত্বের কোলকাতার রাজপথে হাজারো উদ্বাস্তু নারী পুরুষ মতুয়াদের মহামিছিল বাংলাদেশে সন্ত্রাসের বিরুদ্ধে,মৌলবাদের বিরুদ্ধে,নাগরিকত্বের দাবিতে।শুধু কাকদ্বীপ থেকে এলেন দুহাজার মায়েরা। পলাশ বিশ্বাস


ইতিহাস ভূগোলের বাইরে ফেলে দেওয়া কোটি কোটি মানুষের কন্ঠে কলরব মনুষত্বের

কোলকাতার রাজপথে হাজারো উদ্বাস্তু নারী পুরুষ মতুয়াদের মহামিছিল বাংলাদেশে সন্ত্রাসের বিরুদ্ধে,মৌলবাদের বিরুদ্ধে,নাগরিকত্বের দাবিতে।শুধু কাকদ্বীপ থেকে এলেন দুহাজার মায়েরা।

পলাশ বিশ্বাস


নিখিল ভারতের কোলকাতায় ঐতিহাসিক সফল অভিযান ।দক্ষিণ বঙ্গের সুন্দরবন অন্চলের বিধবা সধবা হাজারো মা বোনেরা,মতুয়া অনুযায়ীদের মতুয়া মহাসঙঘ সহ বিভিন্ন সংগঠন,নানা উদ্বাস্তু ও দলিত সংগঠন,নমোশুদ্র বিকাস পরিষদ ও হাজারো আরো সংগঠনের মানুষ অরাজনৈতিক নিখিল ভারত উদ্বাস্তু সমন্বয় সমিতির নেতৃত্বে ও তত্বাধানে  কোলকাতা র রাজপথ কাঁপিয়ে নূতন ইতিহাস সৃ্ষ্টি করল বাংলাদেশে সন্তাসের বিরুদ্ধে,মোলবাদের বিরুদ্ধে,ভারতবর্ষের সব রাজ্যে উদ্বাস্তুদের নাগরিকত্বের দাবিতে মাতৃভাষা ও সংরক্ষণের দাবিতে,2003 সালের নাগরিকত্ব আইন বাতিল করার দাবিতে এবং সারা দেশে দলিত উত্পীড়নের বিরুদ্ধে।এই একতাবদ্ধ আন্দোলন আসামে,ত্রিপুরায় হালে হয়েছে।সেখানেও রাজধানীর রাজপথে নেমেছে হাজারো উদ্বাস্তু।17 আগস্ত দিল্লর রাজপথে এবং পর পর সব রাজ্যের রাজধানীতে এই আংনোদলন চলবে।


এদিন নিখিল ভারতের উদ্বাস্তু অধ্যক্ষ ড.সুবোধ বিশ্বাস,জেনারেল সেক্রেটারি সুপ্রিম কোর্টের উকিল অম্বিকা রায় ও রাজ্য নেতৃত্ব বাংলাদেশ হাই কমিশানে গিয়ে অবিলম্বে বাংলাদেশে সংখাসলঘু সমস্ত জনগোষ্ঠির নিরাপত্তারা দাবি তোলে,সথ্রু সম্পত্তি আইন বাতিল করে সংখ্যালঘুদের বেদখলি বন্ধ করার দাবির সঙ্গেই অবাধ হত্যালীলা,অবাধ ধর্ষন ও অবিপরাম উত্পীড়ন বন্ধ করার দাবিতেও মেমোরেন্ডাম দেওয়া হয়।


ওয়াই চ্যানেল অবস্থানে ড.সুবোধ বিশ্বাস,লোককবি অসিম সরকার,ডং.বিরাট বৈরাগ্য, ওড়ীষার পূর্বতন এমএলএ নিমাই সরকার ,এডভোকেট,অম্বিকা রায়,প্শ্চিম বঙ্গ, আসাম, ত্রিপুরা সহ বিভিন্ন রাদ্যের নেতৃবৃন্দ লাগাতার আন্দোলনের ডাক দেন।দেশ জুড়ে দলিত হত্যার প্রতিবাদ করেন।2003 সালের নাগরিকত্ব সংশোধনী কালো আইন অবিলম্বে বাতিল

করারা দাবি জানান।সংরক্ষণ ও মাতৃবাষার দাবি তোলেন।


লোককবি অসীম সরকার সর্বধর্ম ভ্রাতৃত্বের কথা বলে ধর্মনিরপেক্ষ ও প্রগতিশীল মানবতাবাদের পক্ষে কবিগানও পরিবেশন করেন।


ঔ অবস্থানে সমবেত হাজারো মানুষ প্রতিজ্ঞা করেন,বাংলাভাগের বলি মানুষদের নিরাপত্তা,নাগরিকত্বের জন্য প্রয়োজনে আন্দোলনের পথে প্রাণ দিতে হলে তাঁরা দেবেন।

ড.সুবোধ বিশ্বাস সুন্দরবনে অধিবাসি নারী পুরুষদের,বিশষত- বিধবা পল্লী ও উদ্বাস্তু কলোনীর মানুষদের নাগরিকত্ব,নাগরিক অধিকার ও মানব অধিকারের পক্ষে সমন্ভয় সমিতির আন্দোলনের কথা হাজারো মা বোনেদের উলুধ্বনি ও মতুয়াদের জয় ডন্কার জয়ঘোষের মধ্যে ঘোষণা করেন।


পশ্চিম বাংলার নাম বদলে বাংলা বা বঙ্গ করে দিলেই ইতিহাস ও ভূগোলের রক্তক্ষরণ থামছে না,বাস্তুহারা মানুষের সমাজ বাস্তব পাল্টাচ্ছে না।ভারতভাগের বলি বাংলা।রেলধারে বিলধারে খাল ধারে পোকা মাকড়ের মত যে কোটি কোটি মানুষ বসবাস করেন,শরণার্থী শিবিরের আসেপাশে,জবরদখল কলোনিতে যারা কোনো ক্রমে বেঁচে বর্তে আছেন,বাংলায় তাঁদের পরিচিতি আত্মপরিচয় আত্মসম্মান জীবন জীবিকা সবকিছুই প্রশ্নের মুখে।


পুনর্বাসন প্রহসনে জলে জঙ্গলে দ্পীপে দ্পীপান্তরে চাবাগানে কফি বাগানে যে পাঁছ কোটি উদ্বাস্তু বাঙালিরা ছড়িয়ে ছিটিয় বেঁচে আছেন মরিচঝাঁপি উত্তর কালে এবং 1971 পর যাদের পুনর্বাসন হয়নি,যারা এই সভ্যতার যাবতীয় শ্রমের শ্রমিক তাদের সংখ্যা বাস্তবে বাংলার জনসংখ্যারও কয়েক গুণ বেশি।


যে বাংলার স্মৃতি মুছে দেবার শাসকের নবীনতম উদ্যোগ,সেই বাংলাতেও এই সমস্ত হিন্দু উদ্বাস্তুদের রক্তে মাংসে গড়া মানুষের সংখ্যা আড়াই কোটি।যাদের বিরুদ্ধে ইসলামি সন্ত্রাসবাদীদের দখলে সিরিয়ার মত মৌলবাদের কেন্দ্র হয়ে ওঠা বাংলাদেশে রোজ রোজ অবাধ হত্যালীলা চলছে,ধর্ষণ ও বেদখলী,উত্পীড়ন জারি।


সেই সমস্ত মানুষদের সমিমিলিত কন্ঠস্বরে মতুয়াদের জয়ডন্কা,হাজার হাজার মহিলাদের উলুধ্বনি,কবিগানে উত্তাল করে দিল কোলকাতা,অথচ কোলকাতার রাজপথ কাঁপানো হাজারো উদ্বাস্তুদের এই মিছিলিরে খবর টিভির পর্দায় দেখা গেল না,বা দৈনিক যুগশঙ্খ ছাড়া কোনো কাগজে খবর হল না।


বাংলাদেশ যে সন্ত্রীস ধর্মের নামে জাযজ,রাজধর্ম,রাজনীতি,জেহাদ,সেইসন্ত্রাসের কবলে অন্ধ্র উপকুল থেকে নিগ্রোইড নৃজাতির দক্ষিণ এশিয়ার সমস্তভূগোল জুড়ে,তাঁরা সবাই বংগজ এবং হাজার হাজার বছর ধরে তাণরা সবাই বৃহত্তর বঙ্গের অধিবাসী,যার কেন্দ্রে ছিল গৌড় এবং বঙ্গ বললে সেই পূর্ব বঙ্গের হারানো শত পুরুষ নারী প্রজন্মের বেদখল ভিটে -তাঁর স্মৃতি যারা মুছে দিতে চায়,তাঁগের দৃষ্টিতে পশ্চিমবঙ্গ বাদে এি বৃহত্তর ইতিহাস ও ভূগোলের কৃষিজীবী মানুষরা প্রকৃত অর্থে নামানুষ,বেনাগরিক।


ভারত ভাগের সময়শাসক শ্রেণী এদের কথা ভাবেনি।ভারতভাগের পর এদের নাগরিকত্বের দাবি তোলে নি।2003 সালের নাগরিকত্ব হনন আইনের পিছনেও তাঁদেরই কালো হাত।

শিয়ালদহ থেকে মিছিল শুরু হয়ে 8000 লোকের ঢল কোলকাতায় রাজপথ কাঁপিয়ে Y Chanel এ পৌছালো। তিন কিলোমিটার লম্বা লাইন হয়ে মিছিল পৌছায় Y Chanel. বাংলাদেশ ডেপুটি হাই কমিশনার কে ডেপুটেশন দেওয়া হয়।


উজানতলীর লেখক কপিল কৃষ্ণ ঠাকুর লিখেছেনঃ

আনন্দবাজার পত্রিকায় (৫ আগস্ট) সন্ত্রাসের মোকাবিলা প্রসঙ্গে চমৎকার একটি কথা বলেছেন কাজী আনিস আহমেদ।তিনি লিখেছেন : 'আমাদের অবশ্যই কঠোর নজর দিতে হবে – কী ভাবে নিজেদের ও অন্যদের সম্পর্কে কথা বলব?' মন্তব্যটি গভীর ভাবে বিবেচনার জন্য আমাদের গ্রহণ করা উচিত। কথাবলা একটি শিল্প, যার মাধ্যমে মানুষকে সম্মোহিত যেমন করা যায়, তেমনি, বিপরীত ক্রিয়ায় তা দিয়ে বন্ধুকেও শত্রুতে রূপান্তরিত করা যায়; যা আত্মধ্বংসেরই নামান্তর। প্রবাদে পাই – জিহ্বাই মানুষের পরম শত্রু। জিহ্বাকে নিয়ন্ত্রণ করতে না পারায় কত সম্পর্কের অকালমৃত্যু হলো। কথাটা শুধু বন্ধুমহল বা পরিবারের ক্ষেত্রে নয়, প্রতিবেশী তথা সমাজ এবং রাষ্ট্রের ক্ষেত্রেও সত্য। অভিজ্ঞতায় দেখেছি, কথাবলার বিশিষ্ট ভঙ্গি ও বাকরীতি রপ্ত না হলে ব্যক্তি বা সমাজ সংস্কারের চেষ্টাও বৃথা হয়।ফলে বিপরীত ফল। সুতরাং, সমাজ বা অন্যকে বদলাবার ভাবনা থাকলে আগে নিজেকে বদলাতে হবে।


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Friday, August 5, 2016

নিখিল ভারতের কোলকাতায় ঐতিহাসিক সফল অভিযান । শিয়ালদাহ থেকে আজ মিছল শুরু হয়ে 8000 লোকের ঢ়ল কোলকাতায় রাজপথ কাঁপিয়ে Y Chanel এ পৌছালো। তিন কিলোমিটার লম্বা লাইন হয়ে মিছিল পৌছায় Y Chanel. বাংলাদেশ ডেপুটি হাই কমিশনার কে ডেপুটেশন দেওয়া হয়।

নিখিল ভারতের কোলকাতায় ঐতিহাসিক সফল অভিযান । 
শিয়ালদাহ থেকে আজ মিছল শুরু হয়ে 8000 লোকের ঢ়ল কোলকাতায় রাজপথ কাঁপিয়ে Y Chanel এ পৌছালো। তিন কিলোমিটার লম্বা লাইন হয়ে মিছিল পৌছায় Y Chanel. বাংলাদেশ ডেপুটি হাই কমিশনার কে ডেপুটেশন দেওয়া হয়।



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Because Bangladesh is shaping in Syria! Assam is very very sensitive as far as the internal security , unity and integrity of India concern.Latest terror strike herald imminent dangers ahead. Assam bleeds as Terror strikes,14 killed Palash Biswas


Because Bangladesh is shaping in Syria!

Assam is very very sensitive as far as the internal security , unity and integrity of India concern.Latest terror strike herald imminent dangers ahead.

Assam bleeds as Terror strikes,14 killed

Palash Biswas

At least 14 people were killed and several injured in an encounter between security forces and suspected NDFB (S) militants at busy market place in Kokrajhar district of Assam.

The dead include civilians, security personnel and the militants.

Sources said the gunfight started at 11.30 am at the busy Balazan market when security forces were conducting massive anti-militant operation in the area.

The militants lobbed grenades and started firing indiscriminately at the security forces and the public.

Kiren Rijiju (MoS) Home Affairs said, this is very unfortunate, we will assure that victims are taken care of.

I have been writing time and again that Bangladesh has become a Syria for Global terror network.As Syria has become the base for Global terror,Bangladesh is shaping in as Syria and the nations in this Geopolitics including Bangladesh and India have to bleeds as the terror network is expanded beyond borders. 


One eyed doe like Indian diplomacy failed to handle the imminent disaster,Border states like Assam,Bengal and Tripura along with entire Northeast have to be inflicted sooner or later if the Syria making in Bangaldesh is free to grow.


Terror strikes in Bangladesh are rooted in religious nationalism and  the Jehad War Cry has become viral so much so that the youth irrespective of class and status has indulged itself and they are determined to make in yet another Syria.


If an entire generation is brainwashed all on the name of religion,then other belonging to other identities,religion and race are predestined to become refugee or victims of unprecedented violence and the rest of the world might not be spared.


Isis captured Syria is not only the headache of the middle east as the base has become the super mother of terrorist generations active in each and every nation and the globe is inflicted violence,hatred and ethnic cleansing to convert every other human being as refugee.


We all know Dolnald Trump and his agenda,his hate speeches.But he has charged that Madam Hillry Clinton created ISIS.We have been knowing the role of US agencies which exported Arab Spring an every Arab Nation.We all know the oil war story.Even a man like Trump claims that had Saddam and Gaddifi been live,toe world would remain better.


America created the ISIS which has captured Syria and we know the results.


Two Hundred and fifty million population of minorities still stranded in Bangladesh have been subjected to ethnic cleansing and it would change the demography all over the geopolitics,specifically in the border sates of Bangladesh as well as the mainland.


Assam is very very sensitive as far as the internal security , unity and integrity of India concern.Latest terror strike herald imminent dangers ahead.

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Tuesday, August 2, 2016

पकी हुई जमीन पर जमे मजबूत पांव सबसे ज्यादा जरुरी और आंदोलन से ज्यादा जरुरी संगठन सुनामियों से कुछ नहीं बदलता है और समीकरण से सिर्फ सत्ता बदलती है अंबेडकर की जाति से ही अंबेडकरी आंदोलन को सबसे बड़ा खतरा अंबेडकरी आंदोलन से जुड़े महाराष्ट्र से बाहर के तमाम अंबेडकर अनुयायी यह बात बेहद अच्छी तरह महसूस करते हैं और इसी शिकायत की तहत ही बार बार अंबेडकरी संगठनों,पार्टियों और आंदोलन का वि�

पकी हुई जमीन पर जमे मजबूत पांव सबसे ज्यादा जरुरी और आंदोलन से ज्यादा जरुरी संगठन

सुनामियों से कुछ नहीं बदलता है और समीकरण से सिर्फ सत्ता बदलती है


अंबेडकर की जाति से ही अंबेडकरी आंदोलन को सबसे बड़ा खतरा

अंबेडकरी आंदोलन से जुड़े महाराष्ट्र से बाहर के तमाम अंबेडकर अनुयायी यह बात बेहद अच्छी तरह महसूस करते हैं और इसी शिकायत की तहत ही बार बार अंबेडकरी संगठनों,पार्टियों और आंदोलन का विघटन होता रहा है।

आज महाराष्ट्र में इसी ब्राह्मणवादी  जाति वर्चस्व की वजह से हजार टुकड़ों में बंटा है अंबेडकरी आंदोलन और अंबेडकर के नाम चल रही दुकानों के सबसे ज्यादा मालिकान भी बाबासाहेब की जाति के लोग हैं,जिनके यहां संवाद और लोकतंत्र निषिद्ध है और ब्राह्मण भले जाति उन्मूलन को वैचारिक स्तर पर अपना एजंडा मान लें,वे जाति वर्चस्व को तोड़ नहीं सकते।इसीलिए अंबेडकर भवन जैसे ध्वस्त हुआ,बाबासाहेब का मिशन भी बेपता लापता है।इसीलिए दलितों की ताकत समझकर गोरक्षकों का हमला तेज से तेज है।अब तो बंगाल जैसे राज्य में भी गोरक्षक खुलेआम गायों की गिनती कर रहे हैं और पूरा बंगाल केसरिया होने लगा है।


पलाश विश्वास

सुनामियों से कुछ नहीं बदलता है और समीकरण से सिर्फ सत्ता बदलती है।

पकी हुई जमीन पर जमे मजबूत पांव सबसे ज्यादा जरुरी और आंदोलन से ज्यादा जरुरूी संगठन।बिना संगठित हुए भावनाओं की सुनामी के भरोसे बदलाव की उम्मीद बमायने हैं क्योंकि बदलाव के लिए और बदलाव के बाद भी संगठन अनिवार्य है।राजनीतिक संगठन नहीं,पहले सामाजिक संगठन अनिवार्य है।


यह बाबासाहेब का दिखाया हुआ पथ है तो महात्मा गौतम बुद्ध का धम्म भी आखिरकार आस्था या कर्म कांड या तंत्र मंत्र नहीं,बल्कि संगठित सामाजिक आंदोलन है।बुनियादी बदलाव का संगछित ढांचा और जीवन दर्शन ही गौतम बुद्ध का धर्म है।संगठन की बात हम किसी मौलिक विचारधारा के तहत नहीं कह रहे हैं और यह आधार हमारे इतिहास,लोक और विरासत की जमीन है,जिससे हम बेदखल हैं।


इसी तरह हमें बुद्धमय भारत के अवसान की असली वजहों की जांच पड़ताल करके खोयी हुई जमीन का दखल हासिल करना है और इससे कम किसी सूरत में धर्म परिवर्तन जैसे शार्टकट से बदलाव होंगे नहीं,यह बात समझ लें।


राजनीति और संगठन अलग बातें है।संगठन के बिना राजनीति संभव है।लेकिन बिना संगठन बदलाव असंभव है।धम्म का कुल सार यही है।संगठन के लिए ही आचरण है और आचरण के लिए पंचशील का अनुशीलन है।बाकी सबकुछ हवा हवाई है।


विमर्श की भाषा या संवाद या वैज्ञानिक दृष्टि अब क्रिया प्रतिक्रिया के झंझावात में अनुपस्थित हैं और सारा खेल भावनाओं का हो रहा है जिससे राजनीतिक समीकरण जरुर साधे जा सकते हैं,सत्ता में हमेशा की तरह फेर बदल हो सकता है और होता भी है और रंगों की नई बहार खिल सकती है,लेकिन गौतम बुद्ध की तरह संपूर्ण क्रांति के रास्ते खुल नहीं सकते।उसके लिए धम्म और पंचशील दोनों जरुरी हैं।


जैसे सवर्णों में कुछेक जातियों के नेतृत्व ने देश ही नहीं,पूरे महादेश को युद्ध और गृहयुद्ध,विभाजन की निरंतरता में फंसा दिया है,अब कहना ही होगा कि बाबासाहेब के मिशन का उनपर बपौती हक जताने वाले उनकी ही जाति के लोगों ने सबसे ज्यादा नुकसान किया है क्योंकि भारतीय सत्ता और तंत्र मंत्र व्यवस्था में जैसे एक ही जाति का वर्चस्व है,उसी तरह अंबेडकरी आंदोलन पर एक ही जाति का वर्चस्व अभिशाप है।दलितों और बहुजलों की एकता और संगठन के लिए वही सबसे बड़ी बाधा है।


अंबेडकरी आंदोलन से जुड़े महाराष्ट्र से बाहर के तमाम अंबेडकर अनुयायी यह बात बेहद अच्छी तरह महसूस करते हैं और इसी शिकायत की तहत ही बार बार अंबेडकरी संगठनों,पार्टियों और आंदोलन का विघटन होता रहा है।हो रहा है।संगठन के बिना विखंडन और विघटन का सिलसिला अनंत है और मुक्ति की कोई राह नहीं है।


मुझे माफ करें कि अब यह कटु सत्य इस तिलिस्म को तोड़ने के लिए मुझे ही लिखना पड़ रहा है।हम न बाबासाहेब के खिलाफ हैं और न बाबासाहेब की जाति या किसी दूसरी जाति के खिलाफ हैं।हम जाति वर्चस्व की शिकायत को दलितआंदोलन का आधार बनाये हुए हैं तो आंदोलन पर वर्चस्व के सच का सामना तो करना ही चाहिए।


सच यही है कि आज महाराष्ट्र में अंबेडकरी टुकड़ों में इसी ब्राह्मणवादी  जाति वर्चस्व की वजह से हजार टुकड़ों में बंटा है और अंबेडकर के नाम चल रही दुकानों के सबसे ज्यादा मालिकान भी बाबासाहेब की जाति के लोग हैं,जिनके यहां संवाद और लोकतंत्र निषिद्ध है और ब्राह्मण भले जाति उन्मूलन को वैचारिक स्तर पर अपना एजंडा मान लें,वे जाति वर्चस्व को तोड़ नहीं सकते।इसीलिए अंबेडकर भवन जैसे ध्वस्त हुआ,बाबासाहेब का मिशन भी बेपता लापता है।इसीलिए दलितों की ताकत समझकर गोरक्षकों का हमला तेज से तेज है।अब तो बंगाल जैसे राज्य में भी गोरक्षक खुलेआम गायों की गिनती कर रहे हैं और पूरा बंगाल केसरिया होने लगा है।


दलितों की इसी जात पांत की वजह से ही महाराष्ट्र में लाखों अंबेडकरी संगठन होने के बावजूद अंबेडकरी आंदोलन सबसे कमजोर है और अंबेडकर भवन टूटने के बाद यह साबित हो गया।अंबेडकरी आंदोलन में बिखराव और गद्दारी का यह नतीजा है।


जिस राजनीति की वजह से ऐसा हुआ,उसके खिलाफ खड़े होने के बजाय उसी सत्ता से सबसे ज्यादा नत्थी हैं महाराष्ट्र के जातिवादी अंबेडकर वंशज और अनुयायी।बाबासाहेब के कृतित्व व्यक्तित्व और आंदोलन का कबाडा़ वे ही कर रहे हैं।


समाज और देश को ब्राह्मणवाद से मुक्त कराने का आंदोलन शुरु हुआ भी नहीं है लेकिन अंबेडकरी नवब्राह्मणवाद की वजह से बाकी दलित, पिछड़े, बहुजन, आदिवासी और गैरहिंदू और सभी वर्गों की महिलाएं अभूतपूर्व संकट में हैं।


अंबेडकरी चलवल का सत्यानाश महाराष्ट्र में हुआ और इसी वजह से बाकी देश में बाबासाहेब के संविधान को लागू कराने की ताकत दलितों और बहुजनों में नहीं है और जाति उन्मूलन का बाबासाहेब का मिशन भी इसी वजह से हाशिये पर है।इस सच का सामना किये बिना भविष्य में गौतम बुद्ध की राह पर चलकर भी कोई क्रांति भारत में होगी,ऐसे किसी ख्वाब की कोई जमीन नहीं है।


सत्ता को दलितों बहुजनों की कुल औकात मालूम है और इसीलिए गोरक्षक बेलगाम हैं।


बाबासाहेब ने शिक्षित बनने का नारा दिया जो देशभर में बहुजन आंदोलन के तमाम पुरोधाओं का नारा रहा है और जिस वजह से दलितों और बहुजनों में शिक्षा का इतना व्यापक प्रचार प्रसार हुआ।


फिर बाबा साहेब ने कहा कि संगठित हो जाओ।यहीं से गड़बड़ी की शुरुआत हुई क्योंकि न दलित संगठित हुए और न बहुजन संगठन या समाज बना,न पिछड़े संगठित हुए और न आदिवासी और धर्मांतरित बाबासाहेब के तमाम अनुयायी।


वे जाति और धर्म के नाम पर भावुक आंदोलन करते रहे हैं जो इस वक्त सुनामी की शक्ल में हैं,लेकिन बाबासाहेब के कहे मुताबिक संगठित बहुजन समाज का ख्वाब अभी ख्वाब भी नहीं है।समाज नहीं बना,पार्टियां बनती रहीं।


आंदोलन हुआ और हो रहा है।सत्ता में साझेदारी भी बड़े पैमाने पर हो रही है लेकिन दलितों या बहुजनों का साझा संगटन बना ही नहीं।जो भी संगठन बने वे जातियों के,जाति वर्चस्व के संगठन है और कुल मिलाकर अंबेडकरी आंदोलन जाति युद्ध में तब्दील है और मिशन गायब है।दलितों पर हो रहे हमलों के जिम्मेदार दलित ही हैं।


राष्ट्र के चरित्र में आमूल चूल परिवर्तन और न्याय और समता पर आधारित सामाजिक ढांचे के निर्माण के लिए एक कदम बढ़ाये बिना हम अचानक सबकुछ बदल जाने की उम्मीद कर रहे हैं जबकि विश्वव्यवस्था की पैठ अब हमारी जड़ों तक में हैं और उनपर किसी सुनामी का असर होना बेहद मुश्किल है।


दुनिया में कहीं भी इस तरह बिना राष्ट्र का चरित्र बदले,बिना सामाजिक क्रांति के बदलाव हुआ नहीं है।दुनिया के किसी भी देश का,चाहे अमेरिकी, फ्रांसीसी, ब्रिटिश, रूसी, चीनी कहीं का कोई इतिहास पढ़ लें।


पड़ोस में बांग्लादेश है,जहां जाति धर्म के बदले मातृभाषा के तहत एकीकरण हुआ तो फिर उसी धर्मोन्मादी तूफां की वजह से बांग्लादेश में गृहयुद्ध है।


गुलाम भारत में जाति धर्म नस्ल क्षेत्रीय अस्मिता की दीवारे तोड़कर आम जनता का जो मानवबंधन तैयार हुआ,उसी से हमें आजादी जैसी भी हो मिली,अब हम भी उसी बिखराव में फिर गुलामी में वापसी की तैयारी में लग गये हैं ।


सत्तावर्ग के हर जुल्मोसितम की प्रतिक्रिया बेहद गुस्से के साथ अभिव्यक्त हो रही है लेकिन प्रतिरोध की जमीन तैयार नहीं हो पा रही है।


जाहिर है कि जल जंगल जमीन नागरिकता और हक हकूक की लड़ाई लड़े बिना हम सबकुछ बदल देंगे या अंबेडकर युग शुरु हो गया है, दिवास्वप्न के अलावा कुछ नहीं है।


बात थोड़ा खुलकर कहने की शायद अब अनिवार्यता बन गयी है।भारतीय समाज में जात पांत हजारों साल से हैं।अलग अलग धर्म है तो एक ही धर्म के अनुयायियों की आस्था के रंग अलग अलग हैं।इसके बावजूद भारतीय संस्कृति में अंध आस्था और रंगभेदी भेदभाव के बावजूद साझे चूल्हे की विरासत खत्म हुई नहीं है।अब तमा सुनामियां उन्हीं बच खुचे साझा चूल्हों की आग बुझाने में सक्रिय है और हम बेहद तेजी से इतिहास,लोक और विरासत की जड़ों से कट रहे हैं।हमारी जमीन गायब है।


दलितों पर हमले अंबेडकर भवन के बिना विरोध ध्वस्त कर देने के बाद और खासतौर पर महाराष्ट्र में अंबेडकरी आंदोलन के हजार टुकड़ों में बिखर जाने के बाद इतने दलितों पर हमले व्यापक और इतने तेज हो गये हैं क्योंकि हमलावर जानते हैं कि उन्हें सत्ता का संरक्षण मिला हुआ है और चूंकि उस सत्ता के साझेदार दलित,पिछड़े और अल्पसंक्य़क सभी समुदायों के लोग हैं तो गोरक्षकों का बाल कोई बांका कर ही नहीं सकता।बवाल जितना भी हो,रैली, धरना,प्रदर्सन,हड़ताल कुछ भी हो,दो चार चेहरे परिदृश्य से बाहर कर देने के बाद भावनाओं का तूपां यूं ही थम जायेगा।रौहित वेमुला के मामले में यही हुआ और गुजरात मामले में यही हो रहा है।


कोई आंदोलन लगातार चल नहीं सकता और सत्तावर्ग आंदोलन को तोड़ने का हर हथकंडा अपनाता है और हर बार हम संपूर्ण क्रांति की उम्मीद बांध लेते हैं और फिर खाली हाथ ठगे से बाजार में नंगे खड़े हो जाते हैं।


दलितों पर ही हमले नहीं हो रहे हैं।सबसे ज्यादा हमले तो स्त्री के खिलाफ हो रहे हैं।जाति धर्म निर्विशेष पितृसत्ता का चरित्र और चेहरा सार्वभौमिक है।वैश्विक है।


इसी तरह आदिवासियों के खिलाफ बाकायदा युद्ध जारी है और वे अकले इसका मुकाबला कर रहे हैं।मारे जा रहे हैं।


तो बाहुबलि दो चार जातियों को छोड़ दें तो बहुसंख्य पिछड़ों पर भी हमालों का सिलसिला जारी है और ऐसे तमाम मामलात में पिछड़े एक दूसरे को लहूलुहान कर रहे हैं।वे मार रहे हैं तो मारे जा रहे हैं उन्ही के लोग जो किसी और जाति के हैं।


क्या इस सैन्यराष्ट्र में वे तमाम लोग सुरक्षित हैं जिन्हें अंबेडकर के नाम से घृणा है,जो आरक्षण के खिलाफ हैं और हिंदू राष्ट्र के पैरोकार हैं,यह भी समझने की बात है।


सवर्ण जातियां भी क्या सब बराबर हैं,इस पहेली को भी सुलझाने की बात है।

रोटी बेटी का खुला संबंध दलितों और पिछड़ों में जाति बंधन के बिना असंभव है तो सवर्णों में जाति और गोत्र की असंख्य दीवारे हैं।


जो लोग इन बंधनों को तोड़कर धर्म जाति नस्ल की दीवारें तोड़कर विवाह कर रहे हैं,उनकी साझी जाति फिर सत्तावर्ग से नत्थी हो जाती है और पारिवारिक सामाजिक विरोध से निपटने का तौर तरीका यही है।ऊंची जाति में विवाह करने के बाद कोई दलित आदिवासी या पिछड़ा परिचय ढोता नहीं है।


क्योंकि जाति की छाप निर्णायक होती है।फिर यह भी परख लें कि  सवर्णों में कितनी जातियां हैं जिन्हें सभी क्षेत्रों में दूसरी जातियों के बराबर प्रतिनिधित्व मिल रहा है।


इस पर तनिक सोचें और गहराई से विचार करें तो जाति ही सबसे बड़ी बाधा है।फिर समझ में आना चाहिए कि समता और सामाजिक न्याय मुसलमानों और दूसरे गैरहिंदुओं के लिए दलितों,पिछड़ों और आदिवासियों की तरह जितना अनिवार्य है,उतना ही समता और सामाजिक न्याय की लड़ाई वंचित सवर्णों के लिए भी जरुरी है।


आदिवासियों,पिछड़ों और दलितों की बात रहने दें।मुसलमानों और दूसरे गैरहिंदुओं को भी छोड़ दें।दिगर नस्लों को भी बाहर कर दें।अब देखें कि इनके बिना हिंदू समाज में कितनी समानता है और समानता नहीं है तो इसकी वजह भी समझने की कोशिश करें।


वैसे भी बाबासाहेब अंबेडकर से पहले इस देश में स्त्रियों को कोई अधिकार कानूनी नहीं थे।नवजागरण में सिर्फ हिंदू समाज की कुप्रथाओं पर अंकुश लगा है तो नहीं भी लगा है।सती प्रथा आज भी जारी है और विधवा विवाह अब भी हिंदू समाज में इस्लाम या दूसरे धर्म के मुकाबले अंसभव है।


हिंदू समाज में तलाक का कानूनी अधिकार है लेकिन तलाकशुदा स्त्री को  अगर मजबूत पारिवारिक सामाजिक समर्थन नहीं है तो उसकी स्थिति का अंदाजा आप लगा सकते हैं। स्त्री विरोधी इसी परिवेश से निबटने के लिए कन्याभ्रूण की हत्या अब भी महामारी है तो जाति गोत्र के मुताबिक अरेंज मैरेज के लिए सुयोग्य पात्रों का बाजार भाव आसमान पर हैं तो इसके शिकार सबसे ज्यादा सवर्ण परिवार ही होते हैं।आनर किलिंग तो महामारी जैसे सभी धर्मों और जातियों का फैशन है तकनीकी विकास के बाजार में।


जाति जितनी बड़ी,नाक और मूछों की ऐंठन भी उतनी ही ताकतवर होती है,जिसके आगे मन मस्तिष्क,ज्ञान विज्ञान,तकनीक,विचारधारा,वैज्ञानिक दृष्टि सबकुछ अनुपस्थित हैं।जाहिर है कि देश मुक्तबाजार है और कानूनी कभी लागू न होने वाले हकहकूक के बावजूद इस अमेरिकी उपनिवेश में मध्यकाल का अब भी घना है और हिंदुत्व के नाम उसी अंधियारे का शेटर बाजार उछाले पर है।


बाकी अंग्रेजों के आने से पहले हम जिस हाल में थे,उसमें गुणात्मक परिवर्तन कुछ नहीं हआ है।हम हजारों सा का अभिशाप जाति को न सिर्फ ढो रहे है,जाति जी रहे हैं और हर स्तर पर जाति को ही मजबूत करने में तन मन धन न्यौच्छावर कर रहे हैं।विकास का मतलब कुल यही है।


भारतीय संविधान के प्रावधानों के मुताबिक स्त्रियों, आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों,गैर हिंदुओं को जो हकहकूक मिलने चाहिए,वे मिल नहीं रहे हैं,अलग बात है।लेकिन कानून तो बने हुए हैं।सिर्फ संविधान का भूगोल बेहद छोटा पड़ गया है देश के नक्शे के मुकाबले।जहां कानून का राज कहीं नजर नहीं आता।


कभी इस पर गंभीर चर्चा हुई है क्या कि आखिरकार विश्वनाथ प्रताप सिंह और अर्जुन सिंह जैसे राजवंश से जुड़े कद्दावर राजपूत नेता मंडल कमीशन और पिछड़ों का इतना खुलकर समर्थन क्यों करते थे?


आजादी से पहले जितनी जमीन जायदाद रियासतें, जमींदारियां,हवेलियां राजपूतों के पास थीं,वे अब कहां है।भारत की राजनीति में उनकी हैसियत क्या रह गयी है और वीपी और कुँअर अर्जुन सिंह के बाद उनके उत्तराधिकारी भारतीय राजनीति में कौन हैं।क्या सभी क्षेत्रों में राजपूतों को समान प्रतिनिधित्व मिलता है और क्या किसी भी समीकरण में उनकी भूमिका निर्णायक हैं।मूंछों के अलावा अब उनके पास बचा क्या है।बहुतों ने हालांकि मूंछे भी कटा ली हैं और जहा तहां एडजस्ट होने की जद्दोजहद में लगे हैं।


इसीतरह कायस्थों को ले लीजिये।मुगलिये जमाने से पढ़े लिखे नौकरीपेशा लोग वे हैं।जहां वर्णव्यवस्था लागू नहीं हो सकी,जैसे बंगाल में वे सदियों से जमींदारी हैसियत और रुआब में हैं।बाकी देश में उनकी हालत आप खुद देख लीजिये।उत्तर प्रदेश,असम,मध्यप्रदेश या बिहार जैसे राज्यों में उनकी हालत पर नजर डालें।


फिर जिन ब्राह्मणों के खिलाफ सवर्णों को भी शिकायतें आम हैं,उनमें भी वंश गोत्र वर्चस्व का खेल अलग है।उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में ब्राह्मणों की आबादी शायद बाकी देश के मुकाबले सबसे ज्यादा है।इन प्रदेशों में भी ब्राह्मणों में कितनी फीसद लोग जाति के मुताबिक फायदे में हैं।


जाति समीकरण के मुताबिक राजनीति फायदा सबसे ज्यादा पिछड़ों को हुआ है जो मंडल लागू होने से पहले तक खुद को सवर्ण कहते रहे हैं तो आज भी उनके तेवर सवर्ण हैं और सत्ता से नत्थी हो जाने के बाद बाहुबलि पिछड़ों का नजारा तो सारा देश देख रहा है।दलित अत्यचार का मामला तुल पकड़ जाने पर जो मुख्यमंत्री पदमुक्त हो रही हैं,वे पाटीदार हैं और बेहद संपन्न होने के बावजूद वे सबसे आक्रामक आरक्षण आंदोलन चला रहे हैं।केसरिया राजकाज में प्रयोगशाला राजस्थान की वसुंधरा भी ओबीसी हैं तो तमाम राज्यों में ओबीसी मुख्यमंत्री हैं।प्रधानमंत्री भी ओबीसी हैं।बदला क्या कुछ भी?


ऐसी कितनी पिछड़ी जातियां हैं जो सत्ता से नत्थी बाहुबलि हैं,यह देख लीजिये।दलितों और आदिवासियों में सत्ता और आरक्षण का फायदा कितनी जातियों को मिला है,इसका भी हिसाब लगा लीजिये।फिर बताइये कि समरसता,न्याय और समता का भगोल क्या है और इतिहास क्या है।


वहीं,बंगाल के दलितों और बंगल से बाहर बसे विभाजन पीड़ितों की मानसिकता में,तेवर में जमीन आसमान का फर्क है।बंगाल में दलित जाति व्यवस्था के शिकंजे से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं आरक्षण के बावजूद।वही,बिना आरक्षण बंगाल से बाहर,बंगाली इतिहास और भूगोल से बाहर भारत के विभिन्न राज्यों में बसे दलित शरणार्थी सवर्णों से किसी मायने में कम नहीं हैं।


हम जब उत्तर भारत में थे तो हमारी हैसियत कुछ और थी।अब पिछले पच्चीस साल से नौकरी की वजह से बंगाल में रिहाइस की वजह से जो हैसियत बंगाल से बाहर मेरी रही है,वह नहीं है।क्योंकि वहां हम जन्मजात जाति मुक्त थे और जातिव्यवस्था का कोई दंश हमने झेला नहीं है और न जाति का लाभ हमें कोई मिला है।बंगाल में लैंड करते ही हमारी कुल औकात हमारी वह जाति है,जिसके बारे में हमें कुछ भी मालूम न था।


फिरभी गायपट्टी में जाति की वजह से मुझे कोई नुकसान हुआ नहीं है जो बंगाल में साढ़े सत्यानाश जाति पहचान से नत्थी हो जाने की वजह से हुआ।बंगाल से बाहर भी जब तक आरक्षण की मांग नहीं की बंगाली शरणार्थियों ने जाति पहचान से उनको कोई नुकसान सत्तर के दशक तक नहीं हुआ।


जब जाति में दलित शरणार्थी फिर आरक्षण के लोभ में लौटने लगे तो उनकी जिंदगी कयामत में तब्दील हो गयीं।नौकरी तो मिल ही नहीं रही है,जो मौके सत्तर तक मिल रहे थे,वे भी मिल नहीं रहे हैं,जमीन से लेकर नागरिकता से भी वे बेदखल हैं।



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Monday, August 1, 2016

स्मृति शेष के बाद बेन की विदाई तो फिर किसकी होगी विदाई? गांधी ने हिंदू समाज को बंटने नहीं दिया लेकिन संघ परिवार हिंदुत्व से दलितों को घर बाहर करने पर आमादा! पलाश विश्वास

स्मृति शेष के बाद बेन की विदाई तो फिर किसकी होगी विदाई?

गांधी ने हिंदू समाज को बंटने नहीं दिया लेकिन संघ परिवार हिंदुत्व से दलितों को घर बाहर करने पर आमादा!

पलाश विश्वास

स्मृति अब शेष है तो गुजरात से बेन की विदाई की तैयारी है।केसरिया सुनामी संघ परिवार के नियंत्रण में नहीं है और लगता है कि बजरंगी रथी महारथी भी हाशिये पर है।गोरक्षकों से संघ परिवार अपना रिश्ता मानने से इंकार कर रहा है।गोरक्षकों के बचाव में हालांकि गुजरात की मुख्यमंत्री बदलने के लिए संघ परिवार तैयार है लेकिन दलितों,अल्पसंख्यकों, आदिवासियों और पिछड़ों का दमन और उत्पीड़न का सिलसिला थम नहीं रहा है क्योंकि संघ परिवार का हिंदुत्व समता और न्याय के खिलाफ है।कानून के राज के खिलाफ है संघ परिवार और संविधान के खिलाफ भी है संघ परिवार।


जैसा कि आनंद तेलतुंबड़े ने लिखा है कि हिंदुत्व और दलितों की मुक्ति का रास्ता एक नहीं है।हिंदू राष्ट्र बनाने के फिराक में हिंदुत्व के सिपाहसालारों ने हिंदुत्व से दलितों को अलग कर देने की पूरी तैयारी कर ली है।पुणे करार के लिेए गांधी ने अंबेडकर को तैयार किया जो दलितों के लिए स्वतंत्र मताधिकार की मांग कर रहे थे।गांधी इसे हिंदू समाज का विभाजन मान रहे थे और विभाजन टालने के लिेेए पुणे करार के तहत दलितों के लिए आरक्षण की नींव पड़ी।भारतीय संविधान के निर्माताओं ने उस पुणे करार का दायरा बढ़ाते हुए जनजातियों के लिए भी आरक्षण का प्रावधान किया।तो बंबासाहेब पिछड़ों को बी आरक्षण के दायरे में लाना चाहते थे और आगे चलकर मंडल आयोग की सिफारिशों के तहत आरक्षण के तहत सभी वर्गों को जीवन के हर क्षेत्र में समान अवसर देने के बुनियादी सिद्धांत के तहत हिंदू समाज का वजूद गांधी और अंबेडकर के रास्ते मजबूत हुआ।


गांधी की हत्या को अंजाम देने वालों को हिंदुत्व के ईश्वर के तौर परप्रतिषिठित करने वालों ने आरक्षण खत्म करने की रणनीति पर चलते हुए अंबेडकर को भगवान विष्णु का अवतार तो बना दिया लेकिन गांधी को किनारे करके आखिरकार हिंदू समाज का बंटवारा उसी तरह कर दिया जैसे हिंदुत्व के नाम पर उनके पूर्वजों ने अखंड भारतवर्ष को टुकड़ा टुकड़ा बांटकर हिंदू राष्ट्र की नींव बनाने की कोशिश की।देश का बंटवारा फिर फिर करने पर आमादा उन्हीं लोगोने हिंदुत्व के नाम पर अपनी पैदल बजरंगी सेना पर ऐसा धावा बोला गोरक्षा के नाम पर कि दलितों की राजनीति के तहत बार बार यूपी जीतने वाली मायावती ने भी अपने अनुयायियों के साध धर्म परिवर्तन करके बौद्ध बनने की धमकी दे दी है।फिरभी गोरक्षकों पर किसी तरह का अंकुश नहीं है।दलितों की महारैली का मिजाज अब बहुसंख्यबहुजनों का मिजाज है और उनमें सिर्फ दलित नहीं हैं।


गुजरात से संघ परिवार का तंबू उखड़ने लगा है और मुख्यमंत्री बदलकर हिंदुत्व की इस प्रयोगशाला को बचा लेने की खुशफहमी में हैं संघ परिवार।दलितों की महारैली के बाद भी हिंदुत्व का परचम लहराने से बाज नहीं आ रहा है नागपुर में सत्ता,राजकाज का केंद्र।  बहरहाल आनंदीबेन पटेल ने अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी है लेकिन उनकी विदाई पर आखिरी मुहर इससे पहले 15 जुलाई को प्रधानमंत्री आवास पर हुई बैठक में लग चुकी है। आनंदीबेन की विदाई के कार्य्रक्रम को बेहद भव्य रूप दिया जाएगा। उनकी विदाई सम्मानजनक तरीके से होगी और खुद प्रधानमंत्री भी उस कार्यक्रम में शामिल होने अहमदाबाद जाएंगे। हालांकि उससे पहले बीजेपी पार्लियामेंट्री बोर्ड की बैठक होगी जिसमें विधायक दल की बैठक की तारीख तय की जायेगी और विधायक दल की बैठक में औपचारिक रूप से नए मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा होगी।


यह फिरभी बेहतर है क्योंकि गुजरात नरसंहार के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री को राजधर्म निभाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पदमुक्त करना चाहते थे और संघ परिवार ने तब इसकी इजाजत नहीं दी थी।तत्कालीन मुख्यमंत्री अब प्रधानमंत्री है और गुजरात में हिंदुत्व के धर्मसंकट के मौके पर वहां से उठ रही  हिंदुत्व से दलितों के अलगाव की सुनामी को रोकने के मकसद से वे मौजूदा मुख्यमंत्री को हटा रहे हैं।लेकिन गुजरात में हुई दलितों की महारैली दावानल की तरह पूरे देश में हिंदुत्व के एजंडे का सत्यानाश करने के लिए फैलने लगी है और सामने यूपी और पंजाब के चुनाव हैं,जहा दलितों के वोट निर्णायक होंगे।


गौरतलब है कि संघ परिवार के सर्वेसर्वा मोहन भागवत का फिरभी दावा है कि देश अब सुरक्षित है क्योंकि संघ परिवार के खास लोग सरकार के प्रमुख पदों पर हैं।उनका आशय यही है कि भारत अब मुकम्मल हिंदू राष्ट्र है।


इसके विपरीत,संघ परिवार के दलित मंत्री रामदास अठावले का सवाल है कि आप गाय की रक्षा कर रहे हैं तो बताये मनुष्यों की रक्षा कौन करने वाला है।इन्ही अठावले के तंज के जवाब में बहन मायावती ने हिंदू धर्म त्यागने की चेतावनी दी है और बाबासाहेब के हिंदुत्व त्याग के बाद भारत में दलितों के हिंदुत्व से प्रस्थान का यह सबसे बड़ा मौका बनने ही वाला है।अगर बहन जी सचमुच हिंदू धर्म से दलितों को अलग कर लेती हैं तो भारत के सवर्णों की कुल जनसंख्या मुसलमानों की तुलना में कितनी रह जायेगी,यह हिसाब संघ परिवार के लोग जोड़ लें तो बेहतर होगा।


शायद संघ परिवार को मालूम नहीं है कि जाति की पहचान मजहबी पहचान पर भारी है।बिहार में सिर्फ दो जातियों यादवों और कुर्मियों के गठबंधन ने हिंदू राष्ट्र के एजंटे को धूल चटा दिया।ऐसे गठबंधन अब बनते रहेंगे।संघियों ने राजमार्ग तैयार कर दिया है।


दूसरी ओर,संघ परिवार से जुड़े हर संगठन के नेता कार्यक्रता अपनी अपनी जाति को ही मजबूत करने में लगे हैं।हिंदू राष्ट्र से पहले उनकी जाति है।


पूरे देश में अब हिंदुत्व के बहाने दरअसल जातियों में गृहयुद्ध के हालात रोज रोज संगीन से संगीन बनते जा रहे हैं।जिसतरह दलितों की पिटाई के खिलाफ पूरे गुजरात में.यहां तक कि प्रधानमंत्री के गांव तक में दलितों का भारी आंदोलन शुरु हो गया है।


महारैली अब हर राज्य में होने की संभावना प्रबल है।मायावती क्या इस वक्त इस दलित उभार के साथ देश में बहुजनों का नेतृत्व कर पायेंगी या नहीं,इस पर राजनीतिक समीकरण बनेगें या बिगड़ेंगे लेकिन हकीकत संघ परिवार के लिए कमसकम गुजरात में बेहद खतरनाक है क्योंकि महारैली जो हुई सो हुई,रैली, धरना प्रदर्शन के बाद अब दलित हड़ताल की नौबत आ गयी है तो इससे लगता है कि हिंदू राष्ट्र के दलित अब सीधे हिंदू राष्ट्र से टकराने के तेवर में हैं।वे इतने भारी पैमाने पर संगठित हो रहे हैं कि अब सैन्य राष्ट्र भी उनका दमन नहीं कर सकता।अब  पूरे देश में दलित कह रहे हैं कि गाय उनकी माता नहीं है और न वे कोई गंदा काम करेंगे।


जाहिर है कि जुल्मोसितम की इंतहा हो गयी है और मजहब के मलहम से जख्म भरने वाले नहीं हैं।हालिया खबरों से साफ है कि मौत सेभी डर नही रहे हैं दलित और वे लाठी गोली खाकर भी आंदोलन के रास्ते से हटने को तैयार नहीं है।थोक भाव से आत्महत्या की कोशिशों से उनके शहादती तेवर के सबूत अब जगजाहिर हैं।


मसलन हिंदुत्व की बेसिक प्रयोगशाला गुजरात में दलितों की रैली और हड़ताल से साफ जाहिर है कि हिंदुत्व की अस्मिता के मुकाबले दलित अस्मिता तेजी से सुनामी में तब्दील है जो हिंदू राष्ट्र के ख्वाब का गुड़गोबर कराने वाला है।


कहां तो घर वापसी का कार्यक्रम था,अब गुजरात में मरी हुई गायों की खाल पर बवाल की वजह से धर्मांतरण का नया दौर शुरु हो गया है।


सियासत पर भी इसका असर घना है तो समझ लीजिये कि चुनावी समीकरण भी बदलना लाजिमी है।जातियों के घठबंधन के साथ मुसलमान वोट बैंक जुड़ता चला गया,तो हिंदुत्व का अश्वमेध अभियान भव्य राममंदिर बनाने के बजाय देश भर में धर्मांतरण का माहौल बनायेगा और नतीजतन हिंदू राष्ट्र दो बनेगा नहीं, बल्कि भारत में हिंदू ही अल्पसंख्यक बनने वाले हैं।क्योंकि अब सवर्ण ही हिंदू रहेंगे क्योंकि गोरक्षकों ने दलितों को हिंदुत्व से बाहर जाने का रास्ता दिखा दिया है।


आगे तुरंत यूपी,पंजाब और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव हैं।संघ परिवार का दलित एजंडा का यही नजारा रहा और मायावती,केजरीवाल और यहां तक कि मुलायमसिंह यादव,हरीश रावत और किशोरी उपाध्याय ने तनिक दिमाग से कमा लिया तो केसरिया बाहुबलियों का काम तमाम होना तय है।


फिर दिल्ली भी बहुत दूर नहीं है।क्योंकि दलितों की हड़ताल एकबार कामयाब हो गयी तो हर राज्य में देर सवेर दलितों की हड़ताल होगी और हिंदुत्व का बेड़ा गर्क होगा।

अगर समृति अब स्मृति शेष हैं और बेनजी की विदाई हो गयी,तो ये सिरफिरे हिंदुत्व के राजसूयके अश्वमेधी दिग्विजयी घोड़े का क्या करेंगे और क्या कर सकते हैं,इसका अंजदाजा हमें नहीं है।


बहरहाल दलितों में अब कमसकम बीस फीसद लोग इस तेवर में हैं कि वे अपने को हिंदू मानने को तैयार नहीं हैं।दलितों की अबाध हत्या,दलित स्त्रियों से रोज रोज बलात्कार, दलितउत्पीड़न की वारदातें जिस तेजी से घट रही हैं,उससे दलितों का दलितों का ध्रूवीकरण हिंदुत्व के खिलाफ देर सवेर हो जायेगा।हो रहा है।


जाहिर है कि संघ परिवार अपने लिए मौत का कुँआ बनाने लगा है।


संसद और संसद के बाहर दलितों के हक में जो राजनीतिक गोलबंदी होने लगी है,वह हिंदुत्व के सिपाहसाारों और बजरंगी फौजों के लिए रेड अलर्ट है।गोरक्षक इसीतरह बेलगाम रहे,तो संघ परिवार हिंदू राष्ट्र बना सकें या नहीं,हिंदू समाज को अल्पसंख्यक बना ही देगा,इस पर हिंदुत्ववादी गंभीरता से सोचें जिन्हें हिंदुत्व से प्रेम है।


गौरतलब है कि भैंस और बकरी बचाओ आंदोलन शुरु हो गया है तो पूर्वी बंगाल की तर्ज पर दलित मुसलमान गठजोड़ भी बनने लगा है।इससे धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण की संघ परिवार की परंपरागत रणनीति को शिकस्त मिलना तया है।


मरी हुई गाय की खाल उतारने का पेशा जाति व्यवस्था के तहत पुश्तैनी और जनमजात आजीविका है और इसी जनमजात आजीविका की नींव पर जाति का वजूद कायम है।


गोरक्षा के बहाने मरी हुई गायों की खाल उतारने पर दलितों पर हो रहे लगातार हमले गोमांसविरोधी आंदलोन की तरह मुसलमानों के किलाफ नहीं है,सीधे तौर पर यह दलितविरोधी राजसूय अभियान है।जिसके तहत हिंदू राष्ट्र के जंडेवरदार मनुस्मृति की व्यवस्था और अनुशासन दोनों तोड़ रहे हैं।


अब भी भारत में दलित सर पर मैला उठाते हैं और समाज और पर्यावरण की शुद्धता बनाये रखने में इन्हीं अशुद्ध लोगों की एकाधिकार भूमिका है।इस मायने में दलितों की यह दलील कि गाय तुम्हारी माता है तो उसका अंतिम संस्कार तुम ही करो,इसके दूरगामी और दीर्घस्थाई परिणाम होंगे।


फिलहाल गुजरात में दलितहड़ताल पर है और मरे हुए जानवरों की लाश लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं।अछूत अब अपनी अपनी जाति के लिए तय आजीविका के तहत परंपरागत काम छोड़ दें तो हिंदुत्व की विशुद्धता का क्या होगा,सोचने की बात है।


मसलन आज जैसे मरी हुई गायों की लाशें सार्वजनिक स्थलों पर रखकर प्रदर्शन हो रहे हैं वैसे ही सफाई कर्मचारी सारा मैला सार्वजनिक स्थानों पर जमा करके छोड़ दें तो दलित तो फिरभी इस गंदगी के अभ्यस्त जनमजात हैं,सवर्णों के लिए फिर घर से निकलना बंद हो जायेगा।


भारत की राजधानी नई दिल्ली में ऐसा नजारा सारा देश हाल में देख चुका है।


इस पूरे प्रकरण में अच्छी बात यह है कि दलित गंदा काम करना छोड़ दें तो जातिगत आजीविका की मनुस्मृति व्यवस्था जो औद्योगीकरण ,शहरीकरण और ग्लोबीकरण के बावजूद नहीं टूटी,वह बहुत जल्द टूट जायेगी।


जाहिर है कि संघ परिवार वाकई समरसता के एजंडे पर अमल करने लगा है।