Friday, March 8, 2013

इतिहास बना गया लातिन में चमका लाल सितारा

इतिहास बना गया लातिन में चमका लाल सितारा


ह्यूगो शावेज का सामना न कर सका अमेरिका

विशेष लेख 

अमेरिकी साम्राज्वाद के विरोध प्रतीक के रूप में स्थापित हो चुके 58 वर्षीय वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज के निधन से पूरी दुनिया के इंसाफपसंद लोग आहत हैं. भूमंडलीकरण और बाजार प्रभावी अर्थव्यवस्था के दौर में वेनेजुएला दुनिया के कुछेक देशों में है, जहां की आर्थिकी की प्राथमिकता में समाज के आखिरी पायदान के लोग हैं. ह्यूगो शावेज ने अपने 14 साल के कार्यकाल में वेनेजुएला को एक सामाजवादी मूल्यों वाले देश के रूप में विकसित किया, जिसकी शुरूआत वर्ष 1999 से हुई. अमेरिकी साम्राज्यवादी साजिशों से जूझते हुए समाजवादी-साम्यवादी शासन तंत्र के मूल्यों को स्थापित करने वाले शावेज दुनियाभर में कैसे एक उदाहरण बने, उन पहलुओं को समेटते हुए एक वृहद विश्लेषण :

अमरपाल

http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-09-22/28-world/3759-itihas-bana-gaya-latin-men-chamka-lal-sitara-amarpal


मेरिका की लाख कोशिशों के बावजूद वेनेजुएला के अक्टूबर चुनाव शावेज की जीत हुई. वर्ष 1999 से अब तक ह्यूगो शावेज की यह चौथी जीत थी. चुनाव जीतने के बाद शावेज ने 10 लाख से भी अधिक समर्थकों की भीड़ को सम्बोधित करते हुए कहा, 'मैंने आपको कभी धोखा नहीं दिया है, मैंने आपसे कभी झूठे वादे नहीं किये हैं. सीमोन बोलिवार के देश में क्रान्ति की जीत हुई है. योजना बनाने में पूरे देश को शामिल किया जायेगा और मैं वादा करता हूँ कि वेनेजुएला कभी भी नव उदारवाद के रास्ते पर नहीं जायेगा.'

hugo-chavez

ह शावेज का अब तक का सबसे कठिन चुनाव था. शावेज को सत्ता से बाहर करने के लिए अमेरिकी विदेश मंत्रालय ही नहीं, बल्कि अमेरिकी मीडिया भी शावेज विरोधी पार्टियों का मुखपत्र बन गया. पूरे चुनाव के दौरान कार्टर सेन्टर के अधिकारियों और अमेरिकी मीडिया ने दुष्प्रचार किया कि शावेज के समर्थक हर हाल में चुनाव में धांधली करेगें और राजधानी कराकस की सड़कों पर वेनेजुएला के नेशनल गार्ड एके 47 के साथ गश्त कर रहे हैं. 7 अक्टूबर के चुनाव से पहले मीडिया ने इसे 'काँटे की टक्कर' या 'शावेज की तानाशाही' कहा.

ह भी झूठा प्रचार किया गया कि वेनेजुएला की स्थिति बहुत खराब है जिसके चलते वेनेजुएला की जनता ह्यूगो शावेज के खिलाफ है. इसे शावेज का अंतिम चुनाव बताते हुए वेनेजुएला में अमेरिकी पिट्ठू मीडिया के पंडितों ने ह्यूगो शावेज के दौर का अंत भी घोषित कर दिया था. पूरे पश्चिमी जगत और अमेरिकी मीडिया ने वेनेजुएला की जनता को और अन्य सभी देशों की जनता को भ्रमित करने के लिए बिना सिर–पैर की बातें फैलायी. ताकि शावेज को किसी भी कीमत पर हराया जा सके. अमेरिका ने सद्दाम और गद्दाफी से तो झुटकारा पा लिया, लेकिन जॉर्ज बुश प्रशासन द्वारा 2002 में तख्ता पलट की कोशिश के बावजूद शावेज को सत्ता से बाहर करने में उसे कामयाबी हाथ नहीं लगी.

भी से इस क्षेत्र में अमेरिका की पकड़ कमजोर होती जा रही है. इसके लिए अमेरिका का सबसे महत्त्वपूर्ण एजेण्डा था कि एक ऐसा नेता तलाशा जाय, जो उन पुराने दिनों को वापस ला सके जिनमें व्यापारिक घरानों का कब्जा था और जिनकी चाबी अमेरिका के हाथ में रहती थी. शावेज विरोधी पार्टी में ऐसे नेताओं की भरमार है जो नवउदावादी नीतियों के समर्थक हैं. इसके लिए अमेरिका ने वेनेजुएला की शावेज विरोधी 30 पाटिर्यों को डेमोक्रेटिक यूनिटी राउण्ड टेबल (एमयूटी) नाम की पार्टी के झण्डे के नीचे एकत्रित कर एक समूह बनाया और हेनरिक केपरेल्स रदोनस्की को इसका नेता बनाकर एक अच्छे राजनेता के रूप में पेश किया. उसे ब्राजीली नेता लूला डिसिल्वा के समतुल्य बताया गया जबकि वह एक रईस परिवार की संतान है और अपनी जवानी के दिनों में ही कंजरवेटिव (घोर पूँजीपती) राजनीति का समर्थक रहा है.

हेनरिक के समर्थकों ने ही 2002–03 में 'मालिकों की हड़ताल' से वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करने की कोशिश की थी. इस हड़ताल को गरीब, मजदूरों ने ही विफल किया था जो शावेज के समर्थक हैं और आज भी शावेज के साथ खड़े हैं. हेनरिक ने 2002 में अपने समर्थकों द्वारा शावेज का अपहरण करा कर तख्ता पलट करवाने में अमेरिका का साथ दिया था और क्यूबाई दूतावास के सामने हिंसक प्रदर्शन का नेतृत्व भी किया था. वह 1960–70 के दशक में दक्षिण अमेरिका के हिस्से पर काबिज सैनिक सत्ता का भी समर्थक रहा है. वह 29 हजार क्यूबाई डॉक्टरों और पैरा मेडिकल कर्मचारियों का भी विरोधी है. जो वेनेजुएला के गरीबों की सेवा में निशुल्क काम कर रहे हैं. हेनरिक कम विकसित और प्रतिबंधित देशों में सस्ते दामों में तेल देने का भी विरोधी है.

विकीलिक्स ने खुलासा किया है कि वेनेजुएला में शावेज विरोधी पार्टियाँ अमेरिकी दूतावास से सांगठनिक और वित्तीय सहायता पा रही है. मीडिया में हेनरिक केपरेल्स का एक दस्तावेज लीक हुआ जिसमें लिखा था कि अगर वह चुनाव जीत गया तो नवउदारवादी नीतियों को लागू करेगा. इस दस्तावेज में भोजन और गरीब इलाकों में स्थापित किये गये सामुहिक गोदामों पर से सरकारी सहायता समाप्त करने की बात कही गयी है. जबकि हेनरिक का चुनावी वादा था कि वह शावेज की अधिकतर घरेलु नीतियों को जारी रखेगा और गरीब लोगों को मकान भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकारी छूट रहेगी.

हेनरिक केपरेल्स के दस्तावेज लीक होने से उनकी करनी कथनी साफ समझ में आती है. पूरी कार्यवाही बहुत सड़यंत्र के साथ की गयी थी. इतनी की अपने मोर्चे में शामिल सभी पार्टियों को हेनरिक रदोनस्की अपनी नीतियाँ बताकर अपने विश्वास में नहीं लिया और उनसे भी झूठ बोला. इसका ताजा उदाहरण यह है कि चुनाव की पूर्व संध्या पर हेनरिक के दस्तावेज लीक होने वाले इस तथ्य की बात मोर्चे का हिस्सा रही. तीन पार्टियों ने उसे छोड़ दिया. इस तथ्य ने शावेज के विपक्षियों और अमेरिकी षड़यंत्र की पोल खोल दी है.

शावेज की जीत को स्वीकार करने के बजाय यह साम्राज्यवादी तंत्र अभी अपनी पूरी ताकत से पूरी दुनिया को गफलत में डालने और उन्हें भ्रमित करने के लिए और ह्यूगो शावेज की छवि खराब करने व दुनिया में बदनाम करने के लिए अपना प्रचार जारी रखे हुए है कि वेनेजुएला में मीडिया पर सरकारी एकाधिकार है जिसके चलते शावेज की जीत हुई है. हकीकत यह है कि वेनेजुएला की मीडिया पर 94 फीसदी कब्जा विरोधियों का है. देश के दो सबसे बड़े अखबार भी शावेज और उनकी सरकार के घोर विरोधी हैं. 88 फीसदी रेडियो स्टेशनों पर भी देश के पूँजीपतियों का कब्जा है जो शावेज से नफरत करते हैं. केवल 6 फीसदी इलैक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया पर और 12 फीसदी रेडियो स्टेशनों पर शावेज की सरकार या जनता का अधिकार है.

अमेरिकी मीडिया के इस दुष्प्रचार की पोल भी भूतपूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर की संस्था 'कार्टर सेंटर' के द्वारा खुल जाती है. यह संस्था दुनिया के तमाम देशों के चुनाव को मॉनिटर करती है. इस चुनाव में भी 'कार्टर सेंटर' ने पर्यवेक्षक की भूमिका निभायी है और चुनाव के बाद वेनेजुएला की चुनावी व्यवस्था की प्रशंसा करते हुए कहा कि 'सच्चाई यह है कि अब तक हमने दुनिया के 92 चुनावों को मॉनिटर किया है उनमें से वेनेजुएला के चुनावों की प्रक्रिया सर्वोतम दिखायी दी.'

सके बाद भी अमेरिका ने अपनी खीज मिटाने के लिये वेनेजुएला की आम जनता को कोसना शुरू किया. अमेरिकी अखबार 'फाइनेंशियल' ने शावेज को दुबारा चुने जाने को देश के लिये एक 'गहरा आघात' बताया और एसोसियेट प्रेस ने अपनी खबर में बताया कि जनता राजनीतिक यथार्थ को समझने में नाकाम रही है. वेनेजुएला में 80 फीसदी मतदान हुआ है और अमेरिका में 62 फीसदी. फिर किस देश की जनता ने लोकतंत्र में ज्यादा भरोसा किया है. मतदान के इन आँकड़ों से हम समझ सकते हैं. जाहिर है कि मीडिया ने शावेज के खिलाफ पूरी दुनिया की जनता को भ्रमित करने की लगातार कोशिश की है.

पिछले 14 वर्षों में वेनेजुएला को जो उपलब्धियाँ हासिल हुई हैं उन्हें आज कोई नकार नहीं सकता. शावेज ने जब पहली बार सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ली तब वेनेजुएला की स्थिति बहुत ही खराब थी. देश की अर्थव्यवस्था विश्व बैंक और अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा संचालित थी और सभी कल्याणकारी योजनाओं पर रोक लगा दी गयी थी. सभी तरह की सबसिडी समाप्त कर दी गयी थी. वेनेजुएला में अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष की नीतियाँ चरम पर पहुँच रही थी और इन नीतियों का सीधा असर गरीब तबकों, मजदूरों, किसानों पर पड़ रहा था. 1989 में इन्हीं नीतियों के चलते देश में जन आन्दोलन पैदा हुए और इसी विद्रोह के बीच ह्यूगो शावेज का नेतृत्व पैदा हुआ.

वेनेजुएला में 1999 में ह्यूगो शावेज के आने के बाद वहाँ की स्थिति जिसे खुद अमेरिकी एजेन्सियों ने दर्शाया है.

  • अमीर–गरीब के बीच की खाई कम हुई है.
  •  बेरोजगारी, जो 1999 में 14–5 प्रतिशत थी वह घटकर 2009 में केवल 7–6 प्रतिशत रह गयी. सीधे 50 प्रतिशत की कमी आयी.
  •  प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद जो 1999 में चार हजार एक सौ चार डालर था. 2011 में यह दस हजार एक सौ एक डालर हो गया.
  • 1999 में 23 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करती थी जो 2011 में घटकर 8–5 प्रतिशत रह गयी.
  • नवजात बच्चों की मृत्यु दर में भी भारी कमी आयी है. पहले 1999 में 1 हजार में 20 बच्चे मर जाते थे और 2011 में यह संख्या 13 रह गयी है.
  • 1999 से पहले जो शिक्षा, चिकित्सा, भोजन की व्यवस्था मुफ्त नहीं थी, शावेज ने सबसे पहले व्यापक समुदाय के लिए मुफ्त वितरण व्यवस्था लागू की.
  • 1999 के बाद गरीबी में 50 फीसदी और भीषण गरीबी में 70 फीसदी की कमी आयी है.
  • 2006 के हाइड्रो कानून के अनुसार अपने तेल पर वेनेजुएला का पूरा नियंत्रण है.
  • संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार वेनेजुएला लातिन अमेरिका में सबसे कम असमानता वाला देश है.
  •  शावेज ने अमेरिका के बाजार पर अपनी निर्भरता कम कर एशिया को तेल का निर्यात दोगुना कर दिया है.
  •  वेनेजुएला आज साउदी अरब को पछाड कर तेल उत्पादन में पहले स्थान पर आ गया है.
  • वेनेजुएला सीरिया और ईरान जैसे देशों को परिशोधित कच्चा तेल भेजता है.
  • शावेज अमेरिका के गरीबों को कड़ाके की ठंड से बचाने के लिये मुफ्त तेल देता है.
  • वेनेजुएला के पास दुनिया के कुल तेल का सर्वाधिक 18 प्रतिशत तेल का सुरक्षित भंडार है.

पिछले डेढ दशक से वेनेजुएला में शावेज का शासन है और इसी का नतीजा है कि आज दक्षिण अमेरिका के अनेक देशों में ऐसी सरकारें हैं जो उदारवादी और नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के खिलाफ हैं तथा एक हद तक समाजवादी अर्थव्यवस्था को अपना रही हैं. ब्राजील में लूला डिसिल्वा और इनके बाद डिल्मा रूसेफ जिसके लिए शावेज ने खुद चुनाव प्रचार किया, जो आज ब्राजील की राष्ट्रपति है. जो खुलकर अमेरिकी नीतियों का विरोध करती हैं.

बोलिविया में इवो मोरेलेस समाजवादी हैं और ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता रहे हैं इवो मोरेलेस खुद किसान परिवार से हैं. उन्होंने अमेरिका द्वारा बोलीविया में लागू किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ लम्बे समय तक संघर्ष किया है. वे ह्यूगो शावेज और फिदेल कास्त्रो को अपना आदर्श मानते हैं. उरूग्वे में जोसे मुजिका भी समाजवादी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं. वे पूर्व छापामार योद्धा हैं. वह अपने वेतन का सिर्फ 10 प्रतिशत लेते हैं और 90 प्रतिशत एक धर्मार्थ संस्था को दान कर देते हैं. अर्जेन्टीना की राष्ट्रपति क्रिस्टिना किर्चनर जनहित की नीतियों को लागू कर रही हैं.

ह्यूगो शावेज ने विदेश नीति के मोर्चे पर लातिन अमेरिका के राजनीतिक नक्शे को नया आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है. अमेरिका का एक समय पूरे लातिन अमेरिका के क्षेत्र पर दबदबा था जिसे 1999 के बाद बहुत छोटे–छोटे क्षेत्रीय संगठनों जैसे, –सीईएल ने अमेरिकी प्रभुत्व वाले समूह ओएएस को सीमित कर दिया है. 1999 में शावेज ने लीबिया के गद्दाफी और ईराक के सद्दाम हुसैन के साथ मिलकर ओपेक को पश्चिमी देशों के चंगुल से मुक्त कराया. इससे ओपेक देशों की आर्थिक अर्थव्यवस्था काफी मजबूत हुई. साम्राज्यवाद विरोधी देशों के समूह एलबा के निमार्ण में भी शावेज की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है.

अमेरिका, लातिन अमेरिकी देशों में अपने कम होते प्रभाव और वेनेजुएला के ह्यूगो शावेज और क्यूबा के फिदेल कास्त्रो की विचारधारा के बढ़ते प्रभाव से खिन्न और बेचैन है. इसलिए हर हाल में शावेज को हराना चाहता था. अगर जीत का अन्तर थोड़ा भी अस्पष्ट रहता तो तख्ता पलट की भी योजना थी. यह खुलासा पूर्व अमेरिकी राजदूत पैट्रिक डीडूडी ने विदेशी सम्बंधों की एक काउन्सिल के दस्तावेज में उद्घाटित किया कि अगर शावेज की जीत स्पष्ट होती है, तो उसके साथ समानहित के मुद्दों पर समझौतों की कोशिश की जाये और अगर अंतर जरा भी अस्पष्ट रहता है तो अन्तरराष्ट्रीय दबाव बनाकर उसकी सत्ता पलटने की कोशिश की जाय.

amarpal-malikअमरपाल सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं.

Unified BAMCEF welcomes every one to achieve the object to change the system and liberation of Indian people!

Unified BAMCEF welcomes every one to achieve the object to change the system and liberation of Indian people!

Palash Biswas


Good Afrenoon! BAMCEF Unification Conference in Mumbai has been grand success. All factions have come together with representative delegates form most of the states. Twelve member construction core committee which would include representatives from all existing central executive committees of Bamcef factions and groups, has been constituted to institutionalise the people`s democratic and secular movement for equality, freedom and material empowerment to form a nationwide joint front of all social an productive forces and all Ambedkarites and secular and democratic non ambedkarites would be our part in the liberation movement nationwide. Bamcef leaders like BD Borkar and Tara Ram Maina suggested organisational streamlining to institutionalise the movement in accordance with Ambedkarite ideology and economics. It paved the way for unification. Representatives form Bahujan Samaj Party and its shadow bamcef also participated. Their points  noted. The conference decided with consensus that since Bamcef is a people`s movement to change the system, everyone Ambedkarites as well as Non Ambedkarites who oppose LPG Mafia Regime, Killing of constitution and democratic setup. economic exclusion and ethnic cleansing, Armed Force Special Power Act and Biometric citizenship. Open market corporate imperialism, all of them are welcome. The people of India have no choice at all. Those democratic and secular forces which oppose Manusmriti hegemony and aperthied, the agenda of Hindu Rashtra should also join us. We welcome the aborigine indigenous tribal communities, who represented  well, and vow to fight for their constitutional rights under fifth and sixth schedule, their demand of land reforms, and finally their rights of JAL, JANGAL, JAMEEN And livelihood and civic and human rights.

Reconstruction Core committee memebrs are as follows: 

1. Jyothinath from Bihar

2. Abhiram Mallick from Orissa

3.Chamanlal (Cordinator) from UP

4. Me, Palash Biswas from West Bengal

5. Bhaskar Wakde from Maharashtra

6.Vijay Kujur from Jharkhand

7.Khokan Maitra from West Bengal

8. Raoji Bhai Patel from Gujarat

9.Lt. Col. Siddharth Barves from Mumbai

10.Mod. Sukur from Karnataka

11. Sarnath Gaikawad from Maharashtra

12.Ambade from Maharashtra

The core committee will have more members representing from states and elected. The core committee would also include   representatives for CECs of all existing groups and factions.Once the core committee completes the reconstruction work, Unification process will be complete. Then, we would talk to other Ambedkarite organisations an political parties to coordinate our actions to achieve our goal.

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BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 3


Published on 5 Mar 2013

ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B.R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. 


BD Borker speaks:



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BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 2


Published on 5 Mar 2013

ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B.R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. 
Mr.CHAMANLALEX CEC MEMBER OF BAMCEF DELIVERING HIS SPEECH.


http://youtu.be/DEAL0Ct2DpY

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BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 1


Published on 5 Mar 2013

ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE WAS HELD AT AMBEDr.B.R. DKAR BHAVAN ,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013.
SUBACHAN RAM DELEVERING HIS SPEECH.

http://youtu.be/AHllbX4QrjU


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We have only one objective to defend republic democratic India with its constitution and democratic set up, we have to work for an inclusive economic order which should ensure material empowerment of all citizens of India , specifically those excluded for thousands of yeras. We as followers of Dr BR Ambedkar have to work for annihiliation of caste to make India a casteless classless society based on equality, fraternity, social justice, freedom, civic and human rights. We have a greater task to make a joint forum of social and productive forces which represent ninety nine percent of Indian population. We have decided to institutionalise our organization BAMCEF with grass root level to national level based on geographical, social and linguistic representation. Those who are engaged in active politics seeking share in power may follow their path in the secular and democratic republic. we have no contradiction. But we must unite against the hell losing against the people of India and have to start afresh to resist the system of exclusion and ethnic cleansing.

We have decided to use only Ambedkarite language and linguistics to give up abusive language and hate campaign as we are not against any particular person or community. We have to root out the brahaminical system and the corporate hegemony. We have great Gautam Buddha, Harichand Thakur, Jyotiba Phule, Naykre, Pariyar, Dr Ambedkar and all Indian saints who fought lifelong against the hegemony and the system. 

Let us stand united!

I have just returned from Mumbai. This time, my wife Sabita also accompanied me. Meanwhile she was ill. But we continued the dialogue. Our friends have posted just three speeches on You Tube. Entire procedure would be posted on You Tube very soon. Our friend Chamanlal, who has been elected coordiantaor of the reconstruction  core committee ha posted a preliminary report on facebook. I have talked to Tara Ram Maina and BD Borker and we, all of us in the unification team are in constant touch with activists all over the country. Everyone is ready to rise for the occassion. We have got overwhelming support form face book friends. Thanks.

Chamanlal reported on face book:



A Great Success ! : Around 200 delegates/representatives of different BAMCEF groups and other organizations who are also working on Phule-Ambedkari ideology from across the 18 States of India have gathered at Ambedkar Bhawan, Gokuldas Pasta road, Dadar, Mumbai in the All India BAMCEF Unification Conference. They deliberated on the different subjects of unification and finally concluded that they all should work jointly in the larger interest of mulnivasi bahujan society keeping in view the severe implementation of counter revolution agenda by the ruling caste group. The meeting itself was a feat in the history of mulnivasi bahujan samaj no less than the important Buddhist Sangities that held in history to refine the Buddhism.

The courageous organizers had shown the big hearts to the wicked. Organizers have appealed the participants to discuss over the solution of the cardinal problems of people working dividedly and strictly refrained the participants in the conference from criticizing anybody individuals responsible for the different divisions. 

B D Borkar, the Ex National President of BAMCEF says that as man thinks differently so as he works differently. So to work unidirectional people have to think congruently regarding achieving the objective of structural change. He said that they also tried unification of BAMCEFs in 2004 but succeeded a little. However, above all, he offered his all sought required help in this fresh attempt of BAMCEF unification. He says that unification is not a onetime task rather it is a process that may take some time to culminate. 

Tara Ram Mehna, National President of one of the factions of BAMCEF says that disintegration of BAMCEF in history took place only when the objective of the Leader deviates from the stipulated objective of social change. The disintegration never took place among the objective, ideology and the people. Without naming anybody he, however, pointed that the objective of a specific person has become becoming billionaire through misappropriation of BAMCEF fund and investing missionary financial asset into his own private Trust and other private limited companies that are meant for his own aggrandizement.

Chaman lal, the ex CEC member of BAMCEF, however, deliberated differently and spoke that the disintegration problem of BAMCEF are cardinally related to structural and functional lacunas of BAMCEF constitution. Apart from this the icon formation (व्यक्ति निर्माण, मसीहा निर्माण) in BAMCEF movement has always resulted in fragmentation and deterioration of BAMCEF movement. Therefore, before working together it is highly recommendable that first of all, all the willing parties coming closer to assimilation must unanimously remove the constitutional and functional lacunas that are otherwise responsible for icons formation in the organization rather than constituting the Mulnivasi Bahujan Samaj institution which is essential for achieving the ultimate objective of social change.

Lt. Col. Siddharth Barve inaugurated the conference explicitly quoting the objectivity of the conference and resolved to achieve the same what so ever be the adversaries in the process. He instructively made aware the people there by showing the projector slide show depicting the counter revolution agenda of the ruling caste groups.

Among the notable speakers those expressed their views on the problem in question were notable journalist and activist Plash Biswas , Subachan Ram-IRS, Chandra Pal (Retd. IAS and President Adarsh Samaj party), Raoji Bhai Patel (CEC member, BAMCEF), Jyotinath kushwaha and shivaji Rai from Bihar, Shivani Biswas, Fakir Chand (USA), Bhaskar wakkde, Manoj motghare and his other collegues.

Conclusion : It was unanimously decided to reconstruct the BAMCEF constitution structurally and laid down the functional and modal code of conduct into it by appointing the ad-hoc committee of representatives of different BAMCEF factions and other similar organizations. Within two-three month the committee will submit its draft to the General Body of BAMCEF for its approval and enactment. The meeting ended with the vote of thanks from the organizers.



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Fwd: [initiative-india] Press Release : Around 4,500 people of 28 villages boycotted Environment Public Hearing following breach of promise by Government officials



---------- Forwarded message ----------
From: NAPM India <napmindia@napm-india.org>
Date: Wed, Mar 6, 2013 at 10:54 AM
Subject: [initiative-india] Press Release : Around 4,500 people of 28 villages boycotted Environment Public Hearing following breach of promise by Government officials
To:




---------- Forwarded message ----------
From: Krishnakant <tokrishnakant@gmail.com>
Date: Wed, Mar 6, 2013 at 10:48 AM
Subject: [NAPMConveners] Press Release : Around 4,500 people of 28 villages boycotted Environment Public Hearing following breach of promise by Government officials


Press Release

5 March 2013

Illegal Public Hearing held on 5-3-2013 at 10-30 a.m. at Navagam (Nana) for Mithi Virdi Nuclear Power Plant in violation of Environmental Laws and the Constitution of India.

Around 4,500 people of 28 villages boycotted Environment Public Hearing following breach of promise by Government officials

The Bhavnagar District Collector who chaired the Environment Public Hearing(EPH) for the 6,000 MW Nuclear Power Plant at Mithi Virdi to be set up by the 'Nuclear Power Corporation of India Limited' and Mr A V Shah, the regional officer of the Gujarat Pollution Control Board (GPCB) made vital procedural lapses during the hearing.

But when villagers wearing black bands to protest the EPH being held with incomplete EIA report entered the venue, they were first prevented with officials demanding that the black protest ribbons be removed. It is only when the villagers insisted that they were allowed in.

They did not allow the villagers to make representation about procedural issues of Environment Public Hearing and instead continued the proceedings with incomplete Environment Impact Assessment (EIA) report prepared by unaccredited consultants, as a result rendering the EPH illegal violating the environment rules and the Constitution of India.

Mr A V Shah, Regional Office of GPCB had promised two activists Rohit Prajapati and Swati Desai just before the proceedings were to start on March 5 that Mr. Shaktisinh Gohil, Sarpanch of Jasapara will be allowed and representations about procedural lapses can be made by villagers. But when Mr. Shaktisinh Gohil, the Sarpanch of Jaspara village rose to make procedural points about the lapses in the EPH, he was prevented from doing so. Mr Shaktisinh Gohil was highlighting four major lapses:

1.      The EIA Report for NPCIL has been prepared by Engineers India Limited. According to EIL's own admission it does not have the requisite Ministry of Environment and Forest accreditation to undertake the Environmental Impact Assessment. The EIA Report is therefore illegal. *(See note below)

2.   The EIL report was incomplete and the EPH was being held on the basis of incomplete EIL report rendering it illegal as was pointed out earlier to officials repeatedly.

3.   There are several instances of incomplete details and TOR (Terms of Reference) in the EIL report, which was not furnished during the illegal EPH.

4.       Only limited villages will be allowed to make oral representation.

5.      The Bhavnagar district collector decided not to allow the rest of 128 villages and other environmental experts to make oral representations and instead directed that they make their case only in writing. This is in clear violation of the Delhi High Court order in the case of Samarth Trust and Other v Union of India & Others W.P.(C) 9317 of 2009, where it has opined that "….Prima facie, that so far as a public hearing is concerned, its scope is limited and confined to those locally affected persons residing in the close proximity of the project site. However, in our opinion, the Notification does not preclude or prohibit persons not living in the close proximity of the project site from participating in the public hearing – they too are permitted to participate and express their views for or against the project."

The authorities without allowing the villagers to raise points on procedural lapses directed the company officials to represent the incomplete EIA report. Around 4,500 villagers of 29 villages as a result walked out of the illegal EPH's proceedings as they did not want to become party to illegal proceedings. The officials stopped the EIA report presentation halfway asking the villagers to stay back, but they refused on grounds of it being illegal and procedural illegalities..

The villagers are now contemplating legal action against the authorities for organizing the EPH even when several lapses were pointed out well in advance as well as during the EPH proceedings.

* (It seems that EIL later has received a purported letter allowing them to do an EIA, however since the EIA was prepared before the letter was received, the EIA would still be invalid, especially because no such letter was published in the EIA report).

Procedural issues in writing were given by following Sarpanches of 10 villages. 

  1. Shaktisinh Gohil, Sarpanch, Gram Panchayat, Jaspara, Tal. Talaja, Dist. Bhavnagar
  2. Samuben Dabhi, Sarpanch, Gram Panchayat, Mithi Virdi, Tal. Talaja, Dist. Bhavnagar
  3. Lagdirsinh Gohil, Sarpanch, Gram Panchayat, Paniyali, Tal. Talaja, Dist. Bhavnagar
  4. Pruthvirajsinh Gohil, Sarpanch, Gram Panchayat, Khadarpar,  Tal. Talaja, Dist. Bhavnagar
  5. Vilasba Dharmendrasinh Gohil, Sarpanch, Gram Panchayat, Mandva  Tal. Talaja, Dist. Bhavnagar
  6. Bhagvatsinh Gohil, Sarpanch, Gram Panchayat, Sosiya,  Tal. Talaja, Dist. Bhavnagar
  7. Ramubha Gohil, Sarpanch, Gram Panchayat, Navagam (Nana), Tal. Ghogha, Dist. Bhavnagar
  8. Liliben Zinabhai, Sarpanch, Gram Panchayat, Goriyali, Tal. Ghogha, Dist. Bhavnagar
  9. Gobarbhai Solanki, Sarpanch, Gram Panchayat, Rampar (Garibpura), Dist. Bhavnagar
  10. Dakshaben Makwana, Sarpanch, Gram Panchayat, Bharapara, Dist. Bhavnagar

 

 

Krishnakant        Rohit Prajapati        Swati Desai
Paryavaran Suraksha Samiti

 

Chunibhai Vaidya

Gujarat Lok Samiti

 

Bharatbhai Jambucha

Paniyali village, Dist. Bhavnagar


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Fwd: महिला दिवस के उपलक्ष में महिला उत्पीड़न के खिलाफ व महिला सशक्तिकरण के लिए विभिन्न कार्यक्रमों को ऐलान - Various programme in UP on occassion of women's day



---------- Forwarded message ----------
From: Roma <romasnb@gmail.com>
Date: 2013/3/5
Subject: महिला दिवस के उपलक्ष में महिला उत्पीड़न के खिलाफ व महिला सशक्तिकरण के लिए विभिन्न कार्यक्रमों को ऐलान - Various programme in UP on occassion of women's day
To: National Forum of Forest People and Forest Workers NFFPFW <nffpfw2012@gmail.com>


नारी शक्ति जि़न्दाबाद                                                      महिला एकता जि़न्दाबाद 

जब्र से नस्ल बढ़े ंऔर जु़ल्म से तनमेल करें, ये अमल हम में है बेइल्म परिंदों में नहीं
हम जो इंसानों की तहज़ीब लिए फिरते हैं, हमसा वहशी कोई जंगल के दंरिदों में नहीं
लोग औरत को फक़त जिस्म समझ लेते हैं, रूह भी होती है उसमें ये कहां सोचते हैं.................
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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस - 8 मार्च

राष्ट्रीय महिला दिवस क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले परिनिर्वाण दिवस - 10 मार्च
के उपलक्ष में महिला उत्पीड़न के खिलाफ व महिला सशक्तिकरण के लिए

विभिन्न कार्यक्रमों को ऐलान

पूरी दुनिया में 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो कि महिला सशिक्तकरण का प्रतीक बन चुका है। यह महिलाओं के द्वारा छेड़े गए समाज में गैरबराबरी, भेदभाव, उत्पीड़न एवं समानता के लिए संघर्ष का ही नतीजा है, कि आज महिला दिवस महिलाओं के स्वाभिमान का प्रतीक भी बन चुका है। जिस समय उन्नीसवीं शताब्दी में महिलाएं अमरीका के शिकागो शहर में अपने अधिकारों के लिए लड़ रही थीं, जिससे उनके संघर्षों को अंर्तराष्ट्रीय पहचान मिली। उसी शताब्दी में भारतवर्ष में भी महिलाओं ने अपने अधिकारों के संघर्ष को तेज़ किया था। उन्नीसवीं सदी में अति पिछड़े परिवार में जन्मीं सावित्रीबाई फूले व उनकी सहयोेगिनी फातिमाबी ऐसे नाम हैं, जिन्होंने उस समय घोर जातिवाद, पुरूषसत्तात्मक, ब्राह्मणवाद एवं सांमतवाद के खिलाफ जा कर महिलाओं की शिक्षा एवं अधिकारों के लिए संघर्ष किया था। 10 मार्च को क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फूले के परिनिर्वाण दिवस के रूप में जाना जाता है, जब महिला अधिकारों के लिए लड़ते हुए उन्होंने इसी दिन अपने प्राण त्यागे थे। आज हमारे देश में नारी मुक्ति पर काम करने वाले व प्राकृतिक संसाधनों के लिए काम करने वाले ऐसे तमाम जनसंगठन हैं, जो कि सावित्रीबाई फूले के परिनिर्वाण दिवस को राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाते हैं। ताकि देश के उन प्रतीकों को भी याद किया जा सके, जो कि हमारे काफी नज़दीक हैं। इसलिए यह दो तारीखें 8 एवं 10 मार्च महिला संगठनों के लिए काफी प्रासंगिक है। क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले देश की पहली महिला अध्यापिका व नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता थीं, जिन्होंने अपने पति ज्योतिबा फुले के सहयोग से  देश में महिला शिक्षा की नींव रखी।  सावित्रीबाई फुले एक दलित परिवार में जन्मी महिला थीं, लेकिन उन्होंने उन्नीसवीं सदी में महिला शिक्षा की शुरुआत के रूप में घोर ब्राह्मणवाद के वर्चस्व को सीधी चुनौती देने का काम किया था। उन्नीसवीं सदी में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह, तथा विधवा-विवाह निषेध जैसी कुरीतियां बुरी तरह से व्याप्त थीं। उक्त सामाजिक बुराईयां किसी प्रदेश विशेष में ही सीमित न होकर संपूर्ण भारत में फैल चुकी  थी।
 
सावित्रीबाई का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले में नायगांव नामक छोटे से गाॅव में हुआ। भारत के पुरूष प्रधान समाज ने शुरु से ही इस तथ्य को स्वीकार नहीं किया कि नारी भी मानव है और पुरुष के समान उसमें भी बुद्धि है एवं उसका भी अपना कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व है । उन्नीसवीं सदी में भी नारी गुलाम रहकर सामाजिक व्यवस्था की चक्की में ही पिसती रही । अज्ञानता के अंधकार, कर्मकांड, वर्णभेद, जात-पात, बाल-विवाह, मुंडन तथा सतीप्रथा आदि कुप्रथाओं से सम्पूर्ण नारी जाति ही व्यथित थी। पंडित व धर्मगुरू भी यही कहते थे कि नारी पिता, भाई, पति व बेटे के सहारे बिना जी नहीं सकती। मनु स्मृति ने तो मानो नारी जाति के आस्तित्व को ही नष्ट  कर दिया था। मनु ने देववाणी के रूप में नारी को पुरूष की कामवासना पूर्ति का एक साधन मात्र बताकर पूरी नारी जाति के सम्मान का हनन करने का ही काम किया। हिंदू-धर्म में नारी की जितनी अवहेलना हुई उतनी कहीं नहीं हुई। हालांकि सब धर्मों में नारी का सम्बंध केवल पापों से ही जोड़ा गया। उस समय नैतिकता का व सास्ंकृतिक मूल्यों का पतन हो रहा था। हर कुकर्म को धर्म के आवरण से ढक दिया जाता था। हिंदू शास्त्रों के अनुसार नारी और शुद्र को विद्या का अधिकार नहीं था और कहा जाता था कि अगर नारी को शिक्षा मिल जायेगी तो वह कुमार्ग पर चलेगी, जिससे घर का सुख-चैन नष्ट हो जायेगा। ब्राह्मण समाज व अन्य उच्चकुलीन समाज में सतीप्रथा से जुड़े ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनमें अपनी जान बचाने के लिये सती की जाने वाली स्त्री अगर आग के बाहर कूदी तो निर्दयता से उसे उठा कर वाापिस अग्नि के हवाले कर दिया जाता था। अंततः अंग्रेज़ों द्वारा सतीप्रथा पर रोक लगाई गई। इसी तरह से ब्राह्मण समाज में बाल-विधवाओं के सिर मुंडवा दिये जाते थे और अपने ही रिश्तेदारों की वासना की शिकार स्त्री के गर्भवती होने पर उसे आत्महत्या तक करने के लिये मजबूर किया जाता था। उसी समय महात्मा फुले ने समाज की रूढि़वादी परम्पराओं से लोहा लेते हुये कन्या विद्यालय खोले। भारत में नारी शिक्षा के लिये किये गये पहले प्रयास के रूप में महात्मा फुले ने अपने खेत में आम के वृक्ष के नीचे विद्यालय शुरु किया। यही स्त्री शिक्षा की सबसे पहली प्रयोगशाला भी थी, जिसमें सगुणाबाई क्षीरसागर व सावित्री बाई विद्यार्थी थीं। उन्होंने खेत की मिट्टी में टहनियों की कलम बनाकर शिक्षा लेना प्रारंभ किया। सावित्रीबाई ने देश कीे पहली भारतीय स्त्री-अध्यापिका बनने का ऐतिहासिक गौरव हासिल किया। धर्म-पंडितों ने उन्हें अश्लील गालियां दी, धर्म डुबोने वाली कहा तथा कई लांछन लगाये, यहां तक कि उनपर पत्थर एवं गोबर तक फेंका गया। भारत में ज्योतिबा तथा सावि़त्री बाई ने शुद्र एवं स्त्री शिक्षा का आरंभ करके नये युग की नींव रखी। इसलिये ये दोनों युगपुरुष और युगस्त्री का गौरव पाने के अधिकारी हुये । दोनों ने मिलकर 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की।
''नारी के उत्थान के लिए स्वयं नारी को ही सामने आना होगा'' इस बात का पैगाम सावित्री बाई फूले ने पूरे समाज को दिया। नारी की समानता, सम्मान व अधिकारों का संघर्ष जो सावित्रीबाई ने आज से डेढ़ सौ वर्ष पहले छेड़ा था आज इस आधुनिक युग में भी नारी उसी संघर्ष से जूझ रही है। बराबरी, न्याय, सम्मान व अधिकारों के लिए संघर्ष को तेज़ करने वाली नारी के साथ आज उसका उत्पीड़न भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ रहा है। तमाम राजनैतिक व सामाजिक शक्तियां जो समाज में अपना वर्चस्व क़ायम रखना चाहती हैं, वे नहीं चाहती कि नारी शिक्षा के अधिकार व जागरूकता को प्राप्त करें। सरकार द्वारा अपनाई गई तमाम नवउदारवादी नीतियों के चलते तो नारी को एक बाजारू वस्तु बना कर उसे सरे आम नग्न किया जा रहा है। छोटी बच्चियों, लड़कियों व महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार, अश्लील एमएमएस बनाना, अश्लील टिप्पणियां करना, महिलाओं पर अश्लील गाने व फिल्में बनना आदि समाज में महिलाओं के स्वतंत्र और सम्मानजनक जि़न्दगी जीने के रास्ते में एक बहुत बड़ी बाधा बन रहे हंै। महिलाएं अपने घर, गांव, शहर व सार्वजनिक स्थानों पर ही अपने आप को असुरिक्षत महसूस कर रही हैं। सामाजिक मूल्यों में बेहद ही गिरावट आ चुकी है, जिसके चलते सरकारी तंत्र, प्रशासनिक तंत्र भी महिलाओं के प्रति असंवेदनशील रवैया अपनाये हुए है, जिससे लोग बच्चियों को गर्भ में ही हत्या करने के कुकृत्यों से भी बाज नहीं आ रहे हैं। दिल्ली रेप कांड से आखिर महिलाओं के खिलाफ हो रहे यौन उत्पीड़न का मामला देश व दुनिया के पैमाने पर उठा है, जिसको रोकने के लिए सरकार द्वारा जस्टिस वर्मा कमेटी का गठन भी किया गया। वर्मा कमेटी ने महिला उत्पीड़न को रोकने की तमाम सिफारिशों में सबसे अहम बात सरकार द्वारा महिलाओं की सुरक्षा की अनदेखी व समाज में महिलाओं के प्रति पितृसत्तामक सोच को बताया व महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल बनाने की बात कही। लेकिन सरकार द्वारा इन तमाम सिफारिशों को नजरअंदाज़ किया जा रहा है व इन घटनाओं में कमी आने की बजाय यह घटनाए लगातार बढ़ती जा रही है। सरकार द्वारा इस समय नवउदारवादी नीतियों के तहत जिस तरह से कम्पनियों के आगे घुटने टेके जा रहे हैं, उससे साफ नज़र आ रहा है कि वे महिला तो क्या, इस देश की सम्प्रभुता, धर्मनिरपेक्षता व अस्मिता को भी नहीं बचा पाएंगे। ऐसे में हम महिलाओं पर अब एक अहम जिम्मेदारी है कि हम अपने आप को इतना मजबूत करें कि हम अपनी सुरक्षा करने के इंतज़ाम खुद करें व बलात्कारी, दुराचारियों व आतताईयों को सज़ा दें। साथ ही सामाजिक स्तर पर भी अपनी अग्रणी भूमिका निभा कर महिलाओं के लिए सम्मान, उनके साथ हो रहे भेदभाव को खत्म करने की मुहिम छेड़ें। जब तक महिलाएं खुद आगे नहीं आएंगी तब तक महिलाओं के प्रति भेदभाव व उत्पीड़न कभी भी समाप्त नहीं हो पाएगा। इसलिए वनाधिकार आंदोलन से जुड़ी सभी महिलाएं मिलजुल कर यह संकल्प लें कि अपने जल, जंगल और जमंीन पर अपने सामूहिक अधिकारों को स्थापित कर एक नये समाज का निर्माण करेंगी, ताकि आगे चलकर हमारी आने वाली पीढ़ी सामुदायिकता जैसे मूल्यों को लेकर बड़ी हो व महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा को जड़ से समाप्त करें।
इस उपलक्ष्य में इस महीने हम विभिन्न क्षेत्रों में महिला सशिक्तकरण के रूप में महिला दिवस को मना कर अपने प्रतीकों सावित्री बाई फूले, फातिमा बी जैसी महान क्रांतिकारी बहनों को याद कर के मना रहे हैं व हमारे संगठन की दिवंगत साथी भारतीजी द्वारा वनाधिकार आंदोलन को योगदान को याद करते हुए मना रहे हैं। यह कार्यक्रम इस प्रकार हैं -
8  मार्च 2013 -  राबर्ट्सगंज, सोनभद्र, उ0प्र0,            9  मार्च 2013 -  अधौरा, कैमूर बिहार,
13 मार्च 2013 -  कर्वी, चित्रकूट, उ0प्र0,                 15 मार्च 2013 -  पलिया, लखीमपुर खीरी, उ0प्र0,
24 मार्च 2013 -  सहारनपुर, उ0प्र0।                   23 मार्च 2013 -  शहीद दिवस सहारनपुर, उ0प्र0      
              
 

ज्यादा से ज्यादा संख्या में इस कार्यक्रम में शामिल हो कर महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा को समाप्त करने का संकल्प लें।
राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच NFFPFW
कैमूर क्षेत्र महिला मज़दूर किसान संघर्ष समिति, कैमूर मुक्ति मोर्चा, वनग्राम एवं भू-अधिकार मंच,थारू आदिवासी महिला मज़दूर किसान मंच, तराई क्षेत्र महिला मज़दूर किसान मंच, वनटांगिया समिति,विकल्प समाजिक संगठन, सहारनपुर, ज्ञान गंगा शिक्षा समिति, मानवाधिकार कानूनी सलाह केन्द्र, महिला वनाधिकार एक्शन कमेटी

सम्पर्क: 9412480386, 9415233583, 9358670901, 9412231276,


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Fwd: [All India Secular Forum] Bangladesh: Resurgence of Communalism



---------- Forwarded message ----------
From: Ram Puniyani <notification+kr4marbae4mn@facebookmail.com>
Date: Thu, Mar 7, 2013 at 1:35 PM
Subject: [All India Secular Forum] Bangladesh: Resurgence of Communalism
To: All India Secular Forum <secularforum@groups.facebook.com>


Bangladesh: Resurgence of Communalism Ram...
Ram Puniyani 1:35pm Mar 7
Bangladesh: Resurgence of Communalism

Ram Puniyani

The acts of violence led by the Islamists, Jamaat-i-Islami (JI) are tormenting our neighboring Bangla Desh, more than 50 dead, injuries and destruction of Hindu, Budhha temples amongst other losses. Its spill over is also being felt in Kolkata to some extent (Feb-March 2013). In Kolkata a strong crowd owing allegiance to Muslim communalism, different organizations like Minority Youth Federation, and others went on rampage. All this in response to the death sentence given to Delawar Hossian Sayedee, the Vice President of JI by a war crimes tribunal after he was found guilty for mass killing, rape and atrocities during the nine month war against Pakistan.

He is the third office bearers of JI to have been convicted of the crimes during Muktijuddha (liberation war) of 1971 of the then East Pakistan people's resistance against the atrocities of Pakistan army. Sheikh Hasina Government has set up the tribunal from last three years and now the verdicts of the tribunal are being handed down. Currently in Bangla Desh a large number of youth, believing in democracy are demanding stricter action through protest at Shahbagh against those who were hands in glove with Pakistan army while Jamaat wings are out on streets opposing the sentence to the guilty of 71 liberation war. In India also the Jamaat-Islami has opposed the Shahbag movement and is opposed to punishing the JI elements that are guilty of 1971 war crimes. JI was opposed to the 1971 liberation war led by Mukti Bahini under the leadership of Sheikh Mujibur Rahman and supported by most of the people from Bangla Desh. The attack by Pakistan army led to the killing of nearly three million people, rape of nearly 200000 women, by rough estimates. During this period the East Pakistan's intellectuals and many political workers were done to death.

The tragedy of partition has a long and painful tale, which is refusing to die down even now more than six decades after the painful event. India was partitioned on the strange ground, Pakistan in the name of Islam and India as a secular democracy, apparently to solve the communal problem. British have left a long and painful legacy of politics in the name of religion, violence in the name of religion, which is continuing to dog the sub-continent. The twin pillars of success of British policy of 'divide and rule' were the persistence of feudal classes, in the face of rising industrialization and the deliberate British ploy to recognize Muslim League as the representatives of Indian Muslims right since its formation in 1906. Muslim League was initially formed by the declining sections of Muslim Nawabas, Landlords and later was joined by the section of Muslim educated classes and elite. In no way it represented Indian Muslims. Similarly the Hindu Mahasabha, the body parallel to Muslim League, came up from amongst the Hindu Rajas, Jamindars and later joined in by the section of educated classes and elite castes. Their agenda was totally opposed to the one of Liberty, Equality and Fraternity, which was the foundation of freedom movement of the country.

There are lot of parallels between both these communal streams (Muslim and Hindu), they could join hands in forming coalition ministries in Sindh and Bengal just before the partition, they kept aloof from freedom movement and opposed the social transformation of caste and gender relations of the society. Their lip service to some social reforms notwithstanding, they stuck to the status quo in matters pertaining to social norms and political relations.

After partition the Pakistan (East and West) came to be dominated by the West Pakistan economic and political elite who occupied important positions in the army, bureaucracy, economy and polity. In the elections held in 1970 the Awami League (East Pakistan) led by Sheikh Mujibur Rahman swept the polls, and emerged as the majority party in Pakistan. Still, army backed by Zulfiqar Bhutto did not permit the formation of Awami League Government. Here one can see the difference between religion and politics. While Islam calls for 'all men are bothers' the politics in the name of Islam coming from Pakistani regime, discriminated not only against people of other religions, Hindus in particular, but also against the others Muslims. Muslims of East Pakistan were being dominated and suppressed by the dominant 'Muslims' of West Pakistan.

With Awami League being denied the formation of Government and in the absence of democratic channels of protest, alienation grew in East Pakistan and Mujibur Rahman launched civil disobedience movement. Massive protest erupted all over in East Pakistan and Pakistani army, cracked down on its own citizens. In East Pakistan, army unleashed a reign of terror; murders and rapes. Hindus and Muslims both were targeted. The citizens from East Pakistan were regarded as enemies and rampage went on till the Mukti Bahini, with the help of Indian Army succeeded in defeating Pakistani army to declare the formation of People's Republic of Bangla desh.

The formation of Bangla Desh decisively and irrefutable proved the futility of the theory that Nations are synonymous with religions, that religion can be the basis of nationalism. The 'Two Nation theory' that Hindus and Muslims are two separate nations met its graveyard in the formation of Bangla Desh. Still the communal elements were not wiped out from the country and they do keep coming up now and then. We had also noticed the response of Muslim Communalists from Bangla Desh when they wanted to march to India, in response to the demolition of Babri mosque. The plight of minorities in Bangla Desh is pathetic. Many of the Hindus and Muslims became refugees and came to different parts of the country. Part of this contributed to the Hindu communalist's propaganda and creation of scare about Bangla Deshi immigrants. The issue of sub continental politics has been presented on communal lines.

Sixty years down the line the seeds of communal politics which came up from the declining sections of landlords, were given ideological veneer by section of elite-upper castes, and were cleverly nurtured by the British. As such actually it was these communal elements that fed in to the British policy of 'divide and rule' and led to partition of the country. In the three countries which emerged in the subcontinent, the degree of communal poison today; is of course very different in intensity. Pakistan suffered maximum at the hands of colonial-imperialist powers, the minorities there, Hindus and Christians are having intimidating time. In Pakistan the army has become the ally of communal forces and keeps opposing the democratic aspirations of large sections of society. In Bangla Desh, the democratically rooted parties have to face opposition from the communal elements.

India, not to be left behind is being gradually weekend by the Hindu communalists, who have been harping on the identity issue like Ram Temple. They have given communal hue to the 'left over' problems of colonial rule. Bangla Desh is seen as the source of infiltrators, despite the fact that the poor Hindus and Muslims who fled the country in 1971 had to leave to escape the brutality of Pakistan army. Kashmir, which again partly is a leftover colonial parting kick supplemented by the ultra nationalism of Pakistan-India on one side and communalism on the other. Tragically this issue is also seen through the prism of Hindu and Muslim alone.

Thus all the three countries in the subcontinent have to grapple with this communal demon. To obfuscate the difference between religion and politics has been the biggest 'success' of communalists, cutting across the religious divides. Criticizing these communalists can easily give you a label of being against that religion. Does it need a rethink on the part of the democratic people of these countries to collaborate with each other to bury the demon of communalism, politics in the name of religion? Will communalists, who are dominating the scene in India, or Pakistan or Bangla Desh let it happen? Communalists are adept at creating the tempest of hysteria in the name of their religions, and can do the intense breast beating that the secular democratic efforts are a threat to their 'religion. The task to save or promote democracy in the subcontinent is a mammoth one. Can those elements yearning for a freedom and democracy in the sub continent come together on this agenda?

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इस व्यवस्था को टूटना ही है: अरुंधति राय




हमारे इस दौर में अरुंधति राय एक ऐसी विरल लेखिका हैं जो सरकारी दमन, अन्याय और कॉरपोरेट घरानों की लूट के खिलाफ पूरी निडरता और मुखरता के साथ लगातार अपनी कलम चलाती रहती हैं। वह समाज के सबसे वंचित, शोषित और हाशिए पर खड़े लोगों के साथ पूरे दमखम के साथ खड़ी रहती हैं। प्रस्तुत है पूंजीवाद, मार्क्सवाद, भारतीय वामपंथ, भारतीय राजनीति और समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर उनसे  नरेन सिंह राव की बातचीत। समयांतर के फरवरी, 2013 के विशेषांक में प्रकाशित और इसके संपादक की अनुमति से हाशिया पर साभार.


आज के दौर में आप बराबरी पर आधारित समाज के विचार को कैसे देखती हैं?

मेरे ख्याल में बहुत कम लोग इसके बारे में सोचते हैं। 1968-69 में जब पहला नक्सलवादी आंदोलन शुरू हुआ था या बराबरी पर आधारित समाज के बारे में जो पूरी सोच थी, लोग कहते थे कि भूमि खेतिहर को मिलनी चाहिए यानी जिनके पास जमीन है उनसे छीनकर जिनके पास नहीं है उनको दे दो। वह पूरी सोच अब बंद हो गई है। अब केवल यह है कि जिसके पास थोड़ा बहुत बचा है उसे मत छीन लीजिए। इससे क्या हुआ है कि अल्ट्रा लेफ्ट, जिसे नक्सलवादी या माओवादी कहते हैं, वे भी इससे पीछे हट गए हैं। वे लोग उन लोगों के लिए लड़ रहे हैं जिनसे राज्य ने उनकी जमीन छीन ली है। दरअसल, ये वे लोग हैं जिनके पास जमीन है। लेकिन जिनके पास कुछ भी नहीं है, जो शहरी गरीब हैं तथा दलित हैं और जो पूरी तरह से हाशिए पर खड़े मजदूर हैं, उनके बीच में अभी कौन-सा राजनीतिक आंदोलन चल रहा है? कोई भी नहीं चल रहा। जो रेडिकल मूवमेंट हैं वो ये वाले हैं जो गांववाले बोलते हैं - हमारी जमीन मत लो। जिनके पास जमीन नहीं है, जो अस्थायी मजदूर हैं या जो शहरी गरीब हैं, वे राजनीतिक विमर्श से बिल्कुल बाहर हैं। बराबरी पर आधारित समाज के मामले में हम सत्तर के दशक से बहुत पीछे जा चुके हैं, आगे नहीं। नवउदारवाद की पूरी भाषा, जिसे ट्रिकल डाउन कहते हैं (जो कुछ बचा खुचा है वह उनको ले लेने दो), उसको (भाषा) ही देख लीजिए। बराबरी पर आधारित समाज के विचार की जो भाषा है वह मुक्कमल है। अगर आप कम्युनिस्ट नहीं हैं और पूंजीवादी हैं, तो अभी जो हो रहा है वह पूंजीवादी लोग भी नहीं करते हैं। जहां प्रतिस्पर्धा के लिए एक-सा मैदान होता है, वह है ही नहीं अब। जो धंधे वाले (व्यापारी) लोग हैं उनको कॉरपोरेट ने किनारे लगा दिया है। छोटे व्यापारियों को मॉल्स ने किनारे कर दिया है। यह पूंजीवाद नहीं है। यह पता नहीं क्या है? यह कुछ और ही चीज (ऑर्गनिज्म) है।

लेखिका और एक्टिविस्ट के बतौर आप मार्क्सवाद को किस तरह देखती हैं?

पहली बात यह कि मैं अपने आप को लेखिका ही समझती हूं, न कि एक्टिविस्ट। ऐसा इसलिए कि इन दोनों से खास तरह की सीमाएं निर्धारित होती हैं। एक वक्त था जब लेखक हर बात पर अपनी राय रखते थे और समझते थे कि यही उनका फर्ज है। आजकल लिटरेरी फेस्टिवल में जाना उनका 'फर्ज' बन गया है। एक्टिविस्टों को लेकर वे समझते हैं कि उनका काम कुछ हटकर है, जिसमें गहराई नहीं है। काम का ऐसा बंटवारा मुझे पसंद नहीं है।

मैं मार्क्सवाद को एक विचारधारा के रूप में देखती हूं। एक अद्भुत विचारधारा जिसके मूल में समानता निहित है, न सिर्फ सैद्धांतिक तौर पर बल्कि प्रशासकीय तौर पर भी। अगर भारतीय परिप्रेक्ष्य में जीवन की जटिलताओं को मार्क्सवाद के नजरिए से देखा जाए तो कई सारी समस्याएं देखने को मिलती हैं। लेकिन मार्क्सवादी नजरिए से जाति से नहीं निपटा गया है। आमतौर पर वे (कम्युनिस्ट) कहते हैं कि जाति ही वर्ग है, लेकिन वास्तव में जाति हमेशा वर्ग नहीं है।

जाति वर्ग हो सकती है, क्योंकि मेरी राय में कई सारे रेडिकल दलित बुद्धिजीवियों ने मार्क्सवाद का आलोचनात्मक चिंतन प्रस्तुत किया है, जो आंबेडकर की डांगे के साथ बहस के समय से ही शुरू हो चुका था। लेकिन मेरी राय में आज भी रेडिकल लेफ्ट ने इस मुद्दे को सुलझाने का रास्ता नहीं खोजा है। क्यों ऐसा है कि रेडिकल लेफ्ट, माओवाद और पूरा का पूरा नक्सलवादी आंदोलन (जिसके लिए मेरे मन में बहुत इज्जत है), सिर्फ जंगलों और आदिवासी इलाकों में ही सबसे मजबूत है, जहां लोगों के पास जमीनें हैं? उनकी रणनीति और कल्पनाशीलता शहरों तक क्यों नहीं पहुंच पाई है? इन सीमाओं के कारण दलित एक बार फिर से कट गए हैं। जब मैं दलितों की बात कर रही हूं तो इसका यह मतलब नहीं है कि वहां सब कुछ साफ है। जो लोग अपने को दलित कह रहे हैं उनके अंदर भी बहुत भेदभाव है। तब इन मुद्दों से रू-ब-रू होने में, हमारी भाषा में- किस तरह का पैनापन होगा जिससे कि ये अस्मिताओं के संघर्ष में तब्दील होकर न रह जाए। हम कितने खुश थे जब वर्ल्ड सोशल फोरम में लाखों लोगों ने हिस्सा लिया था। लेकिन हकीकत यह भी है कि करोड़ों लोग कुंभ मेले में भी जाते हैं। अगर सिर्फ जन सैलाब को देखा जाए तो इस हिसाब से यह सबसे बड़ा आंदोलन है! या फिर बाबरी मस्जिद विध्वंस को भी सबसे बड़ा आंदोलन कहा जा सकता है! बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद आरएसएस, विहिप और शिवसेना जैसी दक्षिणपंथी ताकतों और आमजन के भीतर फासीवादी प्रवृत्ति पर हमने कभी ज्यादा ध्यान नहीं दिया। ये सिर्फ सरकार, आरएसएस और बीजेपी की बात नहीं है। हर रोज, हर जगह, हर गली-नुक्कड़ में, मीडिया में यही विमर्श चल रहा है। ऐसा क्यों है कि धर्म, जाति और अस्मिता के सवाल पर लोगों की चेतना को द्रुत गति से लामबंद किया जा सकता है (ऐसा गुर्जर आंदोलन में हमने देखा), लेकिन मुंबई में रहने वाले शहरी गरीब कभी लामबंद नहीं होते। वहां सब कुछ या तो बिहारी बनाम मराठी होता है या फिर यूपी बनाम ठाकरे। भारत एक ऐसा समाज या राष्ट्र है जो लगातार कॉरपोरेट पूंजीवाद की ओर बढ़ रहा है, लेकिन प्रतिरोध के स्वर को धर्म, जाति, भाषा और अस्मिताओं के आधार पर आसानी से बांट दिया जा सकता है। जब तक हम साझा प्रतिरोध के विचार से रू-ब-रू नहीं होंगे, स्थिति ज्यों-की-त्यों बनी रहेगी। मैं यह नहीं कह रही कि सब लोगों को हाथ पकड़े रहना होगा, क्योंकि ढेर सारे आंदोलन एक साथ नहीं आ सकते। लेकिन कुछ मुद्दों पर उनमें समानता होगी। भारत में जो सबसे एकजुट ताकत है, उसके बारे में मेरा मानना है कि वो उच्च हिंदू जाति का मध्यवर्ग है। ये लोग किसी भी वामपंथ या वामपंथी, (जिसकी विचारधारा ही एकता पर आधारित है) से कहीं ज्यादा एकजुट हैं।

जो लोग हाशिए पर हैं उनका राजनीति से लगातार मोहभंग होता जा रहा है। इसके मद्देनजर भारतीय संदर्भ में मार्क्सवाद के भविष्य को लेकर आपकी क्या राय है?

देखिए, मैं इतनी आसानी से नहीं मान सकती कि उन लोगों का मोहभंग हो गया है। हम चाहते हैं कि उनका मोहभंग हो जाए! लेकिन ऐसा हुआ नहीं है। अभी भी वे बहुत बड़ी संख्या में वोट देने आते हैं। हम लोग कहते रहते हैं कि ये सभी एक ही हैं, ये पार्टी या वो पार्टी। लेकिन लोगों में अभी भी एक उत्साह है, यह मानना ही पड़ेगा। किसलिए है, उनकी उम्मीदें क्या हैं? उनकी उम्मीदें शायद ये नहीं हैं कि जिंदगी बदल जाएगी या देश बदल जाएगा या पूंजीवाद खत्म हो जाएगा। उनका सपना है कि यहां नल लग जाएगा, हॉस्पिटल खुल जाएगा आदि। हालांकि चुनावी प्रक्रिया से तो मैं उम्मीद नहीं रखती हूं, लेकिन जनता गहरी उम्मीद रखती है। वे वोट डालने आते हैं, हमको मानना ही पड़ेगा। इतनी बड़ी राजनीतिक ताकत (पॉलिटिकल फोर्स) को यूं ही खारिज नहीं कर सकते। आजकल की बहसें देखिए - भ्रष्टाचार के खिलाफ या आम आदमी पार्टी को लेकर है। मैं उनसे पूछती रहती हूं कि जो जगनमोहन रेड्डी भ्रष्टाचार के मामले में जेल में बंद है वह अगर कोई रैली करेगा तो उसको सुनने के लिए लोग गाड़ी से उतरकर पंद्रह किलोमीटर पैदल चलकर आते हैं। लोग अच्छे लोगों के लिए वोट नहीं देते हैं। वे वोट क्यों दे रहे हैं, किसको दे रहे हैं- सभी भ्रष्टाचार के बारे में अच्छी तरह जानते हैं। हम लोग वही सोचते हैं जो हम लोगों को सोचते हुए देखना चाहते हैं या जो हमें अच्छा लगता है! यह बहुत दूर की कल्पना है कि लोगों का मोहभंग हो गया है। बहुत अधिक भ्रष्टाचार के बावजूद लोग इस चुनावी प्रक्रिया में पूरी तरह शरीक होते हैं। लोग इसको अच्छी तरह से देख भी सकते हैं, फिर भी वे इसमें भागीदारी करते हैं। ऐसा इसलिए नहीं है कि ये लोग बेवकूफ हैं। ऐसा बहुत सारे जटिल कारणों की वजह से है। मैं मानती हूं कि हमें निश्चित तौर पर अपने आपको बेवकूफ बनाना छोड़ देना चाहिए, क्योंकि हम कुछ चीजें जानते हैं, इन चीजों की लोगों के वोट डालने में या नहीं डालने में कोई भूमिका नहीं है। जो मैं सोचती हूं वह यह है कि हमारे सामने कोई खूबसूरत-सा विकल्प खड़ा नहीं होने वाला है। चलो इसको वोट देते हैं, वह व्यवस्था को बदलेगा। ऐसा नहीं होने वाला है। व्यवस्था इतनी जमी हुई है- कॉरपोरेट, राजनीतिक दल, मीडिया जैसे रिलायंस के पास 27 टेलीविजन चैनल हैं, किसी और के पास अखबार हैं। मुझे लगता है कि इससे क्या होगा? इससे यह होगा कि बहुत ज्यादा लंपटीकरण और अपराधीकरण बढ़ेगा। जैसे अभी जो छत्तीसगढ़ और झारखंड में चल रहा है। वहां राजनीति, विचारधाराओं, बहसों और संरचनाओं में एकरूपता दिखती है। लेकिन जैसे आप सबको शहर की ओर भगाएंगे, उनका आप अपराधीकरण करेंगे, जैसे इस बलात्कार की घटना के बाद मनमोहन सिंह ने साफ-साफ कहा कि हमें इन नए प्रवासियों से, जो शहरों में आते हैं, सावधान रहना पड़ेगा। पहले आप उन्हें शहरों की तरफ धकेलते हैं और फिर उनका अपराधीकरण करते हैं। इन स्थितियों में फिर आपके लोग ज्यादा पुलिस, सुरक्षा और ज्यादा कड़े कानून की बात करते हैं। एक बार अपराधीकरण होने के बाद फिर उनको अपराधियों की तरह व्यवहार करना ही पड़ता है। उनके पास कोई कानून और काम नहीं है। आप एक ऐसी व्यवस्था कायम करना चाहते हैं जहां लोगों के व्यापक हिस्से का अस्तित्व नहीं होना चाहिए। यह गलत है। अब ऐसे में वामपंथ क्या करने वाला है, क्योंकि जिसे हम अल्ट्रा लेफ्ट कहते हैं वो जंगलों में फंसा हुआ है, आदिवासी आर्मी के साथ। बुद्धिजीवी लोगों के लिए यह कहना बिल्कुल जायज और आसान है कि वे पेरिस कम्यून जैसा सपना देख रहे हैं। उनमें से बहुत सारे लोग तो जानते ही नहीं है कि जगदलपुर, भोपाल अस्तित्व में हैं। लेकिन नक्सली लड़ रहे हैं। उन्हें पता है कि वे किसके लिए लड़ रहे हैं। यह हो सकता है पार्टियां, आप और मैं विचाराधारत्मक रूप से उनसे सहमत न हों। लेकिन जंगल के बाहर वामपंथ क्या कर रहा है? जब मार्क्स  सर्वहारा के बारे में बात करते हैं, तो उनका सर्वहारा से मतलब मजदूर वर्ग है। ज्यादातर जगहों पर मजदूरों की संख्या को कम करने की पूरी कोशिश की जा रही है। वहां पर रोबोट्स और उच्च तकनीक इस्तेमाल की जा रही है। अब श्रमिकों की तादाद वह नहीं बची है जो हुआ करती थी - क्लासिक सेंस में। तो, इस नए दौर में बहुत ही विशेषाधिकर प्राप्त श्रम शक्ति (वर्कफोर्स) है, उदाहरण के लिए मारुति में काम करने वाले श्रमिकों को ले सकते हैं। लेकिन, उनके साथ क्या हुआ - वहां वाम क्या कर रहा है? वाम के पास उनको कहने के लिए कुछ नहीं है। नक्सल क्षेत्रों के बाहर ऐसा कोई लेफ्ट नहीं है जो इन चीजों के साथ लड़ रहा है। मैं नहीं जानती कि आप उनका राजनीतिकरण कैसे करेंगे। बहुत बड़ी संख्या में शहरी गरीब हैं जिन्हें कोई विधिवत काम नहीं मिला है, जो श्रमिक (वर्कर्स) नहीं हैं। उन्हें सांप्रदायिक तत्त्वों के द्वारा कभी भी बरगलाया और भड़काया जा सकता है। उन्हें कभी भी एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया जा सकता है।

क्या आपको लगता है कि भारत फासीवाद की तरफ बढ़ रहा है? 

मुझे लगता है कि यह सवाल आपने पांच साल पहले पूछा होता तो मैं कहती कि बढ़ रहा है। अब मैं यह नहीं कहूंगी कि यह बढ़ रहा है। उसके सामने यह पूरा कॉरपोरेट और मध्य वर्गीय अभिजात्य है। उनका नरेंद्र मोदी की तरफ जो यह रुझान (शिफ्ट) है, यह एक फासीवाद से दूसरे फासीवाद की तरफ जाना (शिफ्ट) है। वहां एक तरफ अनिल अंबानी और दूसरी तरफ मुकेश अंबानी बैठकर यह कहते हैं कि यह (मोदी) राजाओं का राजा है। इसका मतलब यह नहीं है कि वह बदल गया है। जबकि, हकीकत यह है कि वह एक तरह के फासिस्ट से दूसरी तरह का फासिस्ट बन गया है। मुझे लगता है कि आजकल यह हो गया है कि बहुत बड़ी संख्या में मध्य वर्ग को पैदा किया गया है। उनके मन में, उनके सपनों में एक पुच्छलतारे का मार्ग (ट्रेजेक्टरी) बनाया गया है, जिससे वे उधर से इधर आएं और अब बिल्कुल ठहर गए हैं। जहां आगे कोई रास्ता नहीं है। और अब यह गुस्सा अलग-अलग तरह से फूटता हुआ दिखाई दे रहा है। लेकिन मैं इससे बहुत आहत होती हूं।

हाल के दिनों में हुए आंदोलनों का क्या भविष्य है? जैसे अण्णा हजारे ... 

अण्णा हजारे तो दफ्तर बंद करके चले गए। जब ये लोग बिना कोई काम किए हुए टेलीविजन चैनलों के स्टूडियो में अपने मूवमेंट का निर्माण करते हैं तो उनका क्या भविष्य हो सकता है? जब टेलीविजन चैनल चाहेंगे तो उन्हें आगे बढ़ाएंगे! जब उन्हें कोई खतरा नजर आएगा तो इन आंदोलनों को बंद कर देंगे। उसमें क्या है? मसलन आम आदमी पार्टी को देखिए! जिसने एक बार रिलायंस का जिक्र किया और टांय-टांय फिस्स। जब मीडिया उनका (कॉरपोरेट) है तो आखिर आप वहां कैसे हो सकते हैं? मतलब थोड़ा तो आगे सोचना चाहिए ना! ऐसे तो होगा नहीं। यह जो बचपना है, यह कैसे चलेगा? मतलब, ये इतना हो-हल्ला मचा के रखते हैं कि अगर कोई इनके खिलाफ बोलेगा तो सिद्ध करेंगे कि वह या भ्रष्टाचार के समर्थन में है या फिर बलात्कार के समर्थन में है। क्या इनके पास जरा-सी भी समझ नहीं है राजनीतिक इतिहास की? इसमें कुछ लोग अच्छा काम करते हैं। वे कोशिश करते हैं इसको आगे अंजाम देने की। लेकिन मेरे ख्याल में जहां पर विरोध प्रदर्शन हो रहा है वह हमें बहुत उत्तेजित करता है, लेकिन लोग उस नजरिए से चीजों को नहीं देख रहे। वे नहीं समझते कि हर विरोध प्रदर्शन यकीनन प्रगतिशील और क्रांतिकारी नहीं हो सकता। हर जन आंदोलन महान नहीं होता। जैसे मैं अक्सर कहती हूं कि इस देश में सबसे बड़ा आंदोलन बाबरी मस्जिद का विध्वंस है, जिसको वीएचपी और बजरंग दल ने चलाया। जैसे जब लड़की का बलात्कार हुआ था, उस हफ्ते दो-तीन दिन आगे-पीछे नरेंद्र मोदी चौथी बार चुनाव जीता। अब उन्हीं टीवी चैनलों में वही लोग, जो बलात्कार के खिलाफ इतना चिल्ला रहे थे, उस आदमी (मोदी) जिसके राज में महिलाओं के शरीर को चीरकर उनकी बच्चेदानी को निकाल दिया गया, जिनका बलात्कार करके जिंदा जला दिया गया, अब (टीवी चैनल) कह रहे हैं कि इन पुरानी बातों को भूल जाओ। आप अतीत में क्यों जा रहे हैं। यह किस तरह की राजनीति है मैं नहीं समझ पाती हूं। मुझे यह समझने में बहुत दिक्कत होती है। ये बहुत ही पेचीदा, बौद्धिक और भावुक पहेली है। क्योंकि, आप तब विरोध नहीं कर सकते, जब संस्थानिक तरीके से महिला का बलात्कार होता है। नारीवाद की राजनीति बहुत ही जटिल है। जब यथास्थितिवाद के लिए बलात्कार को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है - चाहे वह कश्मीर हो, चाहे मणिपुर हो, चाहे नगालैंड हो या ऊंची जाति का एक आदमी दलित महिला के साथ बलात्कार कर रहा हो या हरियाणा में ऑनर किलिंग हो। इन सभी मामलों में एक ही तरह की प्रतिक्रिया आती है। ... जो बच्चियां बड़ी हो रही हैं... जवान होती लड़कियों को सड़कों पर घूमते हुए देखना कितना खूबसूरत और मनमोहक होता है। और जो हुआ वह कितना भयानक है। हम कैसे कह सकते हैं लोग बलात्कार के मामले को लेकर परेशान थे, जबकि वे सिर्फ 'इस बलात्कार' के मामले को लेकर परेशान थे। यह ठीक है, लेकिन यह खास तरह की राजनीति है! यह बहुत ही कठिन पहेली है। लेकिन इसके बारे में सोचना बहुत जरूरी है और मैं सोचती हूं कि आप लोगों से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि जो चीजें उन्हें परेशान नहीं करती हैं वह उन्हें झकझोर दे। लेकिन इस वजह से बहुत बड़ी राजनीति को आप वैसे ही नहीं छोड़ सकते हैं। आप यह समझना चाहते हैं कि वह क्या है?

क्या आप मानती हैं कि नव उदारवादी नीतियां भारतीय राज्य के मूल चरित्र को उजागर करती हैं? 

देखिए, भारतीय राज्य का नहीं, बल्कि समाज का। ये नवउदारवादी नीतियां सामंती और जाति आधारित समाज के बिल्कुल मनमाफिक है लेकिन यकीनी तौर पर यह किसी गांव में फंसे दलित के लिए ठीक चीज नहीं है। यह सभी असमानताओं को मजबूत करती है, क्योंकि यह निश्चित तौर पर ताकतवर को और ताकतवर बनाती है। यही तो कॉरपोरेट पूंजीवाद है। हो सकता है कि यह शास्त्रीय पूंजीवाद की तरह न हो, क्योंकि शास्त्रीय पूंजीवाद नियमों पर चलता हो और वहां 'चेक एंड बैलेंस' का सिस्टम होता हो। लेकिन हमारे यहां इसमें ऐसा कुछ नहीं होता। यकीकन इससे ताकतवर लगातार ताकतवर बनता जाता है। और यही लोग तो बनिया हैं। यह सबसे अहम बात है जिसके बारे में कभी कोई बात नहीं करता - भारतीय बनियों की राजनीति। इन्होंने पूरे देश में क्या कर दिया है? रिलायंस एक बनिया है। वे बनिया जाति के तौर पर दृश्य से पूरी तरह बाहर रहते हैं, लेकिन वे बहुत ही अहम भूमिका अदा करते हैं। यह इन्हें बहुत मजबूत बनाता है। यही कारण है कि रिटेल में एफडीआई के मामले में भाजपा सबसे ज्यादा गुस्से में आई क्योंकि 'उनके छोटे बनिये' दांव पर लग गए हैं क्योंकि वो जाति (बनिया) उनका (भाजपा) आधार है।

दूसरी तरफ आप ग्रामीणों, आदिवासियों और दलितों के साथ कुछ भी कर दीजिए किसी के उपर कोई फर्क नहीं पड़ता।

भारतीय वामपंथ का दायरा बहुत ही सीमित दिखाई देता है। आप इसका क्या कारण मानती हैं और इसके लिए किसे जिम्मेदार मानती हैं?

मुझे लगता है कि इसमें जाति एक बहुत बड़ा कारण है। अगर आप सीपीएम को देखें तो उसमें ऊपर बैठे लोग सारे ब्राह्मण हैं। केरल में भी सारे नायर और ब्राह्मण हैं। उन्होंने कभी यह समझने की कोशिश नहीं की कि मार्क्स वादी विचार का बेहतरीन इस्तेमाल कैसे करें, जहां पर लोगों के साथ व्यवस्थागत तरीके से भेदभाव किया जाता है। अक्सर जब आप ऊंची जाति से आते हैं तो समस्याओं को नहीं देख पाते हैं। हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि आप खराब आदमी हैं। बस बात यह है कि आप इसे देख ही नहीं पाते। मैं एक बार कांचा इल्लैया से बात कर रही थी, जो एक समय में पीपुल्स वार ग्रुप से जुड़े थे। वह अकेले ऐसे आदमी थे जो अपने समुदाय में पढ़े-लिखे थे। उनके भाई ने बहुत कोशिश की कि वह उनको पढ़ा-लिखा देंखे। जबकि उनकी पार्टी चाहती थी कि वह भूमिगत हो जाएं। यह उस तरह से नहीं है कि किसी ब्राह्मण को भूमिगत हो जाने के लिए कह दें, क्योंकि उनके (ब्राह्मण) परिवार में बाकी लोग पढ़-लिख सकते हैं। इस मामले को आपको बिल्कुल ही अलग तरीके से समझना पड़ेगा।

मेरी समझ से दूसरा कारण यह है कि आप इस मुगालते में रहें कि चुनाव लड़कर राज कर सकते हैं। और फिर आप एक ही समय में राजा भी बने रहें और क्रांतिकारी भी बने रहें! यह कैसे हो सकता है। यह तो एक तरह का फरेब है!

भारत में माओवादी आंदोलन की संभावनाओं और चुनौतियों को आप कैसे देखती हैं?

माओवादी आंदोलन के लिए वहां पर बहुत अवसर हैं जहां पर वे बहुत मजबूत हैं। लेकिन अब यहां पर बहुत बड़ा हमला होने वाला है। आर्मी, एयरफोर्स सभी पूरी तैयारी में लगे हैं। शायद यह हमला 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद होगा और ये माओवादी आंदोलन के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। लेकिन दूसरी तरफ माओवादियों ने अभी सीआरपीएफ के जवान के साथ जो किया (मृत जवान के पेट में बम डाल दिया था) वह बहुत ही वाहियात काम है। हम लोग उनका इन कारणों की वजह से समर्थन नहीं करते। मुझे नहीं मालूम है कि इस तरह का काम कैसे होता है? मुझे लगता है कि या तो उनके कमांड सिस्टम (नेतृत्व) में प्रोब्लम आ गई है या उनके साथ लंपट (लुम्पैन) लोग शामिल हो गए हैं। मैं इसके बारे में ज्यादा नहीं जानती, खास तौर से झारखंड के बारे में। लेकिन इस हमले में अगर उनका अनुशासन टूटता है तो उनके लिए बहुत ही मुश्किल आ जाएगी, क्योंकि एक समय ऐसा था जब उनके साथ बहुत ज्यादा बौद्धिक और नैतिक समर्थन था, जो अब भी है। अगर आप ऐसे काम करते रहेंगे तो आपका यह समर्थन बंद हो जाएगा। उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे जंगल से बाहर कैसे काम करेंगे। अगर जंगल से बाहर नहीं जा सकते तो हम सोचेंगे कि ये सिर्फ एक क्षेत्रीय प्रतिरोध है, चाहे जिसका भी हम समर्थन करें। बात यह है कि जंगल से बाहर इतनी बड़ी जो गरीबी पैदा की गई (मैनुफैक्चर्ड पॉवर्टी) है, उसको आप राजनीतिक कैसे बनाएंगे। क्योंकि लोगों के पास समय नहीं है, जगह नहीं है और ये जंगल से बाहर कैसे काम करेंगे, यह बहुत बड़ा प्रश्न है।

क्या यह हो सकता है कि वे हिंसा छोड़कर चुनावी राजनीति में आएं? 

हिंसा क्या होती है? अगर छत्तीसगढ़ के किसी गांव में एक हजार सीआरपीएफ के जवान आकर गांव को जलाते हैं, औरतों को मारते हैं और बलात्कार करते हैं, तो ऐसे हालात में आप क्या करेंगे? भूख हड़ताल पर तो नहीं बैठ सकते। मैं हमेशा से यही कहती आई हूं कि जिसे बुद्धिजीवी, अकादमिक लोग, पत्रकार और सिद्धांतकार आदि एक विचारधारात्मक तर्क कहते हैं,वह मुझे टैक्टिकल लगता है। यह सब कुछ लैंडस्केप (भौगोलिक स्थिति)पर निर्भर करता है। आप छत्तीसगढ़ में बिल्कुल वैसे नहीं लड़ सकते जैसे आप मुंबई या दिल्ली में लड़ते हैं और मुंबई-दिल्ली में बिल्कुल वैसे नहीं लड़ सकते जैसे आप छत्तीसगढ़ में लड़ते हैं। इसमें कोई द्वंद्व नहीं है। आप सड़कों पर गांधीवादी बन सकते हैं और जंगलों में माओवादी बनकर काम सकते हैं। गांधीवादी होने के लिए तो आपके आसपास टेलीविजन कैमरा और रिपोर्टर होना जरूरी है, अगर ऐसा नहीं है तो ये सब बेकार है। प्रतिरोध की विविधता बहुत जरूरी है। यह भी ध्यान रखना पड़ेगा कि हर काम करना माओवादियों की ही जिम्मेदारी नहीं है। दूसरी तरह के लोग दूसरी चीजें कर सकते हैं। जैसे लोग मुझे कहते हैं कि वहां बांध बन रहा है, यहां ये हो रहा है... मैं उनसे कहती हूं कि यार तुम भी तो कुछ करो। मैंने तो कभी नहीं कहा कि मैं तुम्हारी लीडर हूं। मैं वह कर रही हूं जो मैं कर सकती हूं। और आप वह करें जो आप कर सकते हैं।

मैग्लोमेनिएकल एप्रोच नहीं होनी चाहिए कि हर काम एक ही पार्टी या एक ही इंसान या एक बड़ा लीडर करेगा। बाकी लोग कुछ क्यों नहीं करते? एक ही पर क्यों निर्भर रहना चाहते हैं? माओवादी लोग गलतियां कर रहे हैं, लेकिन बहुत बहादुरी से लड़ रहे हैं और हम लोग सिर्फ बैठकर कहते हैं कि ये लोग ऐसे हैं, वैसे हैं। अरे यार, आप भी तो कुछ करो। अगर वाकई कुछ करना चाहते हो तो।

हमारे लेखकों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों, फिल्मकारों, रंग निर्देशकों के काम क्या भारतीय सच्चाई को अभिव्यक्त करते हैं? 

मैं पूछती हूं कि इंडियन रियलिटी (भारतीय यथार्थ) होती क्या है। मैं हमेशा से सोचती आई हूं कि बॉलीवुड के इतिहास में सबसे बड़ी थीम क्या है? सबसे बड़ी थीम तो प्यार है। लड़का लड़की से मिलता है और वे भाग जाते हैं... लेकिन हमारे समाज में तो यह बिल्कुल नहीं होता। सिर्फ दहेज, जाति, ये-वो और सिर्फ गणित ही गणित (कैल्कुलेशन) है। तो जो चीज समाज में है नहीं उसे हम फिल्म में जाकर देखते हैं। कहने की बात ये है कि हमारा पूरा समाज जाति के आसपास घूमने वाला छोटे दिमाग (स्मॉल माइंडिड) का जोड़तोड़ करने वाला है। हम बस लोगों को सिनेमाई पर्दे पर नाचते-गाते देखकर खुश हो जाते हैं। हमारे साहित्य का यथार्थ से कुछ लेना-देना नहीं है। इस मामले में यह बिल्कुल निरर्थक है। हालांकि, इसमें कुछ अपवाद जरूर हो सकते हैं। आजकल साहित्य और सिनेमा में जो हो रहा है उसे मैं 'क्लास पोर्नोग्राफी' कहूंगी। जिसमें लोग गरीबी की तरफ देखते हैं और कहते हैं कि ये लोग तो ऐसे होते हैं, वैसे होते हैं, गाली देते हैं, गैंग वॉर करते हैं। मतलब, अपने आप को बाहर रखकर ये चीजों को ऐसे देखते हैं जैसे उनका इनसे कुछ लेना-देना नहीं हो। यह ऐसा ही है जैसे गरीबों का ग्लेडिएटर संघर्ष देखना और फिर यह कहना कि ये कितने हिंसक होते हैं ! यह एक तरह की एंथ्रोपोलॉजी (नृशास्त्र) है, जहां पर आप युद्ध को बाहर से एक तमाशे की तरह देखते हैं और मजा लेते हैं। फिर एक और तरह से चीजों को महत्त्वहीन (ट्रिवीयलाइज) बनाते हैं। ये इतना 'ट्रिवियल' होता है कि आपके कान पर जूं भी नहीं रेंगती।

विश्व स्तर पर पूंजीवाद ने कमजोर समुदायों को और भी हाशिए पर तरफ धकेल दिया है। इन हालात में किस तरह के राजनातिक विकल्प उभर सकते हैं?

देखिए, मुझे लगता है कि इसका कोई भी सभ्य विकल्प नहीं है। केवल यह बात नहीं है कि सत्ता के पास सिर्फ पुलिस, सेना और मीडिया ही है, बल्कि कोर्ट भी उन्हीं के हैं। अब इनके आपस में भी 'जन आंदोलन' होने लगे हैं। और उनका अपना एक शील्ड यूनीवर्स (सुरक्षित खोलवाला संसार) है। इस सबको किसी सभ्य तरीके से बिल्कुल भेदा नहीं जा सकता। कोई सभ्य तरीके से आकर बोले कि मैं बहुत अच्छा हूं मुझे वोट दे दो, तो ऐसा हो नहीं सकता। दरअसल उनका अपना एक तर्क है। यही तर्क खतरनाक हिंसा और निराशा पैदा कर देगा। और ये गुस्सा इतना ज्यादा होगा कि ये लोग बच नहीं पाएंगे। अपने इस विशेषाधिकार के खोल में ये ज्यादा दिन सुरक्षित नहीं रह पाएंगे। अब अच्छा बनने में कोई समझदारी नहीं है। इस संदर्भ में मैं अब सभ्य नहीं हूं। मैं हैंडलूम साड़ी पहनकर यह नहीं कहूंगी कि मैं भी गरीब हूं! मैं बिल्कुल नहीं हूं। मैं भी इसी पक्षपाती व्यवस्था का हिस्सा हूं। मैं वह करती हूं जो मैं कर सकती हूं, लेकिन मैं यह नहीं मानती कि बदलाव एक बहुत ही खूबसूरत और शांत ढंग से आने वाला है। जो कुछ चल रहा है उसकी अनदेखी कर अब ये लोग अपने लिए ही एक खतरनाक स्थिति पैदा करने वाले हैं। मैं नहीं मानती कि हम इस बदलाव के बारे में कोई भविष्यवाणी कर सकते कि यह कैसे होने वाला है या कहां से आने वाला है। यह तय है कि यह बदलाव बहुत ही खतरनाक होगा। इस व्यवस्था को टूटना ही है, जिसने बहुत बड़े पैमाने पर अन्याय, फासीवाद, हिंसा, पूर्वाग्रहों और सेक्सिज्म (यौनवाद) को संरचनात्मक तौर पर पैदा किया है।

जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियां संसदीय राजनीति में हैं उनके बारे में आप क्या सोचती हैं? खास तौर पर अगर सीपीआई (भाकपा), सीपीएम (माकपा) और सीपीआई-एमएल (भाकपा-माले)जैसी कम्युनिस्ट पार्टियों के संदर्भ में बात करें। 

देखिए, जब पार्टियां बहुत छोटी होती हैं, जैसे कि सीपीआई (एमएल) और सीपीआई, तो आपके पास इंटिग्रिटी होती है। आप अच्छी पॉजिशंस और हाई मॉरल ग्राउंड (उच्च नैतिक आधार) ले सकते हैं। क्योंकि आप इतने छोटे होते हैं कि इससे आपको कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन अगर आप सीपीएम जैसी बड़ी पार्टी हैं तो स्थिति दूसरी होती है। अगर हम केरल और बंगाल के संदर्भ में सीपीएम की बात करें तो दोनों जगह इसके अलग-अलग इतिहास रहे हैं। बंगाल में सीपीएम बिल्कुल दक्षिणपंथ की तरह हो गई थी। वे हिंसा करने में, गलियों के नुक्कड़ों को कब्जाने में, सिगरेट वालों के खोमचे को कब्जाने में बिल्कुल दक्षिणपंथ जैसे थे। यह बहुत अच्छा हुआ कि जनता ने उनकी सत्ता को उखाड़ फेंका। हालांकि मैं निश्चिंत हूं कि ममता बनर्जी की सत्ता का दौर जल्दी खत्म हो जाएगा। दूसरी तरफ केरल में स्थिति अलग थी, क्योंकि वे सत्ता से हटते रहे हैं जो कि एक अच्छी चीज है। वे वहां पर कुछ अच्छी चीजें भी कर पाए। लेकिन इसका श्रेय पार्टी को बिल्कुल नहीं दिया जा सकता, बल्कि यह इसलिए था क्योंकि वहां पर सत्ता का संतुलन बना रहा। अगर आप देखें तो उनकी हिंसा अक्षम्य है। दूसरी तरफ जिस तरह मलियाली समाज आप्रवासी मजदूरों का शोषण कर रहा है वह बहुत शर्मनाक है। ऐसे में आप बताएं, सीपीएम अपने आप को कम्युनिस्ट पार्टी कैसे कह सकती है? जिस पार्टी ने ट्रेड यूनियनों को बर्बाद कर दिया और पश्चिम बंगाल में नव उदारवाद के साथ कदमताल मिलाते रहे। वे अक्सर यह तर्क देते हैं कि अगर हम सत्ता में नहीं रहेंगे तो सांप्रदायिक लोग सत्ता हथिया लेंगे। लेकिन आप मुझे यह बताएं कि क्या सीपीएम के लोग हिम्मत जुटाकर गुजरात गए? जहां खुलेआम इतनी मारकाट चल रही थी वे दुबक कर बैठे रहे। जब नंदीग्राम में लोगों को बेघर कर उजाड़ दिया गया तो वे महाराष्ट्र में आदिवासियों के साथ जाकर बैठ गए। मतलब जनता इतनी भी बेवकूफ नहीं है कि इतनी छोटी बातों को भी न समझ पाए। यह वाकई बहुत दयनीय है कि वाम (लेफ्ट) ने खुद को इतना नीचे गिरा दिया है। यहां तक कि ये संसदीय राजनीति में भी खुद को नहीं बचा पाए और जिन मुद्दों पर वामपंथी स्टैंड लेने चाहिए थे, ये वो तक नहीं ले पाए। इस सबके लिए ये खुद ही जिम्मेदार हैं और इनके साथ यही होना चाहिए था। इतने सालों में ये लोग कभी पार्टी को ऊंची जातियों के वर्चस्व से मुक्त नहीं करा पाए। और आज भी आप देखें कि पोलित ब्यूरो में यही लोग भरे पड़े हैं।

अगर लेफ्ट ने जाति के मुद्दे को सुलझाया होता, ईमानदारी से काम किया होता, इनके पास दलित नेता और बुद्धिजीवी होते और अगर ये पूंजीवाद की जगह लेफ्ट की भाषा बोलते तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इस देश में लेफ्ट आज कितना मजबूत होता? ये लोग अपनी जातीय पहचान को कभी नहीं छोड़ पाए। और इनकी निजी जिंदगी के बारे में ही तो मेरा उपन्यास गॉड ऑफ स्माल थिंग्स है।

वर्तमान हालात में कम्युनिस्ट पार्टियों का क्या भविष्य है? 

देखिए, मैं सीपीआई-एमएल, आइसा से कभी-कभी सहमत होती हूं। ये लोग शहरी गरीबों के बीच काम करते हैं। बिहार में ये जाति के सवाल के हल करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन ये सफल नहीं हो रहे हैं क्योंकि जैसा कि मैंने कहा कि इनकी ताकत बहुत ही सीमित है और ये हाशिए पर हैं। लेकिन बहुत सारी चीजें जो ये कहते हैं, उनका मैं सम्मान करती हूं। मैं बिल्कुल नहीं समझ पाती कि ये कैसे इतने हाशिये पर (मार्जिनलाइज्ड) रह गए और खुद को अप्रासंगिक बनाकर छोड़ दिया। मुझे माओवादियों और लिबरेशन के बीच विचारधारात्मक युद्धों को देखकर बहुत दुख होता है। इन लोगों ने टैक्टिक्स को विचारधारा के साथ जोड़कर भ्रम पैदा कर रखा है। सीपीआई (एमएल) के लोग जंगल के बाहर रहकर काम करते हैं और यह जरूरी नहीं कि वे हथियारों के साथ ही काम करें। लेकिन सीपीआई (एमएल) की राजनीति छत्तीसगढ़ में काम नहीं कर सकती। फिर आप देखिए कि अपने हाथों से इन्होंने खुद को हाशिए पर धकेल दिया है। ये छत्तीसगढ़ में माओवादियों के साथ गठजोड़ कर सकते थे। लेकिन ये राज्य से नफरत करने के बजाय एक दूसरे से ज्यादा नफरत करते हैं और अपना समय गंवाते हैं। जो कि कम्युनिस्टों की एक बड़ी खासियत है!

और सीपीएम किस तरफ बढ़ रही है...

सीपीएम बाकी संसदीय पार्टियों की तरह ही है। जिसे देखकर यह बिल्कुल नहीं लगता कि ये किसी भी तरीके से कम्युनिस्ट पार्टी है।

(नरेन सिंह राव मीडिया अध्यापन से जुड़े हैं और सिनेमा तथा साहित्य में दखल रखते हैं।)

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Unified BAMCEF Welcomes everyone democratic and secular!

Good Afrenoon!BAMCEF Unification Conference in Mumbai has been grand success. All factions have come together with representative delegates form most of the states. Ten member core committee which would include representatives from all existing central executive committees of bamcef factions and groups, ha been constituted to institutionalise the people`s democratic and secular movement for equality, freedom and material empowerment to form a nationwide joint front of all social an productive forces and all ambedkarites and secular and democratic non ambedkarites would be our part in the liberation movement nationwide.

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 3



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BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 2


Published on 5 Mar 2013

ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B.R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. 
Mr.CHAMANLALEX CEC MEMBER OF BAMCEF DELIVERING HIS SPEECH.


http://youtu.be/DEAL0Ct2DpY

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BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 1


Published on 5 Mar 2013

ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE WAS HELD AT AMBEDr.B.R. DKAR BHAVAN ,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013.
SUBACHAN RAM DELEVERING HIS SPEECH.

http://youtu.be/AHllbX4QrjU


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