Thursday, August 2, 2012

Calcutta’s ‘splendid’ isolation

http://www.telegraphindia.com/1120802/jsp/frontpage/story_15803877.jsp#.UBqTmKBmm9s

Calcutta's 'splendid' isolation

Calcutta, Aug. 1: If minimal exposure to global markets saved India from the Southeast Asian economic crisis in 1997, a somewhat similar situation helped Calcutta stand out like a beacon on Blackout Tuesday.

Not being fully synchronised with the eastern grid — staying connected to the grid at one point instead of four —appears to have played a crucial role in the success of CESC in sparing its 26 lakh consumers the trauma without break that the rest of Bengal and many other states underwent yesterday.

At the time of the collapse, at 1.01pm yesterday, CESC was connected with the eastern grid, which collapsed along with the northern and northeastern grids.

But the connection was at just one point — through its receiving station at Garden Reach (known as Southern) with the Howrah substation of the state-run distribution utility and then with the eastern grid. The distributor is the West Bengal State Electricity Distribution Company Limited (WBSEDCL).

At the three other substations of the distributor at Kasba, Liluah and Titagarh, CESC was connected to the network of the WBSEDCL but not with the eastern grid.

"As CESC is also not fully synchronised, which helps in maintaining a free flow of power, with the eastern grid, it is easy for the utility to snap ties during such crises to prevent a cascading impact," said a senior power department official.

According to him, the one-point connection with the grid and the absence of full synchronisation allowed CESC to isolate itself from the eastern grid in a split second when the collapse took place yesterday.

The isolation allowed CESC to serve the 567sqkm spanning Calcutta and Howrah. "Whichever utility faced a blackout yesterday was only because it was fully synchronised and thoroughly connected with the regional grid," said the official.

In contrast to CESC, which was connected at one point, the distributor was linked at 103 points in Bengal.

"It's really easy to isolate yourself when you're connected with the grid through just one point. The isolation technology available with CESC is basic and commonly used in India and elsewhere in the world," the power department official said.

The situation was more or less similar to that in India during the Southeast Asian economic crisis of 1997. Fifteen years ago, India's scant exposure to the global markets in the early days of liberalisation spared it the domino-like ramifications of the crisis.

However, CESC did succeed in spotting the problem on time — one of the most crucial and difficult tasks in transmission management. For some reason, others did not. (Raj Rao, an American electric company executive, told The New York Times that "my hunch is, somebody fell asleep and they did not cut off" the excess load.)

The power department official clarified that he was not grudging the achievement of CESC, which displayed remarkable alertness and came up with a rapid response, but putting matters in perspective.

When the collapse took place, the isolators at the circuits of CESC's Garden Reach-based Southern receiving station kicked in, detaching CESC from the eastern grid in less than a second.

Till 1.01pm, CESC was successfully meeting demand of around 1,460MW with its own generation of around 1,200MW and imports from the WBSEDCL. After the collapse, CESC was forced to resort to loadshedding because imports were not possible and it had to supply over 150MW to the state-run utility to help keep some essential services alive. That was the reason for phased power cuts in parts of the city, though there was never a blackout in Calcutta yesterday.

"We are not trying to take credit, but everyone's seen what happened yesterday. We were the only utility that functioned and we worked on a war footing to minimise inconvenience to our consumers," said CESC managing director Sumantra Banerjee this afternoon.

"We owe our performance on days like yesterday to large volumes of investment in technology and infrastructure over a decade and a half. We have an excellent team handling system operation. This cannot be achieved in a short time," he added.

Other sources in the power department pointed out that not being fully synchronised is "a bad idea", except on rare days like yesterday.

Some power distribution veterans said cascading failures in grids are rare phenomena whereas other glitches —which require support from the grid — take place at frequent intervals.

"If you are not fully synchronised, not connected at all four points, you cannot be rescued by the grid on days when you need support. There are at least six to seven such days every year," said an expert. "Days like yesterday are very rare. Investments in infrastructure should be made to connect fully with the grid to better protect yourselves from crises in areas you serve," he added.


Wednesday, August 1, 2012

अब पाकिस्तान से भी विदेशी​​ निवेश की छूट, बजट प्रस्तावों और आर्थिक सुधारों को अमल में लाने की उम्मीदें बढ़ गई!

अब पाकिस्तान से भी विदेशी​​ निवेश की छूट, बजट प्रस्तावों और आर्थिक सुधारों  को अमल में लाने की उम्मीदें बढ़ गई!

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

वित्तमंत्रालय का प्रभार संभालते ही विदेसी निवेश के दरवाजे सपाट कोलने की दिशा में भारी धमाका हुआ है। अब पाकिस्तान से भी विदेशी​​ निवेश की छूट दे दी गयी है।सरकार ने बुधवार को एक अहम फैसला करते हुए देश में पाकिस्तान से निवेश की अनुमति दे दी है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों को मजबूती देने और पाकिस्तान की तरफ से भारत को सबसे तरजीही राष्ट्र (एमएफएन) का दर्जा देने की दिशा में इसे अहम पहल माना जा रहा है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के यहां जारी एक प्रेस वक्तव्य में कहा गया, 'सरकार ने नीति की समीक्षा की है।। 1 और यह तय किया है कि पाकिस्तान के नागरिकों को और पाकिस्तान में पंजीकृत कंपनी को भारत में निवेश की अनुमति दे दी जाए।'चिदंबरम के वित्त मंत्री की कुर्सी संभालते ही अब अटके पड़े महत्त्वपूर्ण बजट प्रस्तावों और आर्थिक सुधारों  को अमल में लाने की उम्मीदें बढ़ गई हैं।पी. चिदंबरम ने चार साल के अंतराल के बाद आज एक बार फिर वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभाला। उनके सामने अर्थव्यवस्था को नरमी से उबारने की चुनौती है जबकि स्तर पर घरेलू मुद्रास्फीति का दबाव है और अंतर्राष्ट्रीय वातावरण अनिश्चिततापूर्ण बना हुआ है। मंत्रिमंडल में कल किए गए हल्के फेरबदल में चिदंबरम को गृह मंत्रालय से उठा कर वित्त मंत्रालय का कार्यभार सौंप दिया गया।बिजली मंत्री सुशील कुमार शिंदे गृह मंत्री बनाए गए हैं। बिजली मंत्रालय का कार्यभार एम वीरप्पा मोइली देखेंगे जो कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय के प्रभारी है। चिदंबरम आज पहले कुछ समय के लिए गृह मंत्रालय गए और उसके बाद नार्थ ब्लॉक स्थित वित्त मंत्रालय में अपना नया कार्यभार संभालने पहुंच गए। समझा जाता है कि आज सुबह उन्होंने सोनिया गांधी से भी मुलाकात की।चिदंबरम ऐसे समय वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभाल रहे हैं जब देश की आर्थिक वृद्धि दर नौ साल के न्यूनतम स्तर 6.5 फीसदी तक नीचे आ चुकी है। ऐसे समय घरेलू और विदेशी निवेशकों के विश्वास को फिर से बहाल करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी ने राष्ट्रपति चुनाव में उतरने के लिए 26 जून को वित्त मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। तब से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मंत्रालय का कामकाज देख रहे हैं। मुखर्जी ने 25 जुलाई को भारत के राष्ट्रपति का पद संभाला।

इस बीच प्रणव जमाने में अर्थव्यवस्था के सूत्रधार बने प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार,कभी आर्थिक मंदी, तो कभी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अपनी बेबाक राय से सुर्खियों में रहने वाले कौशिक बसु रिटायर हो गये। अब गुजराल की विदाई होनी है। प्रणव मुखर्जी के जाने के बाद वित्त सचिव आर एस गुजराल के जाने की अटकलें भी तेज हो गई हैं। उनकी जगह एक्सपेंडिचर सेक्रेटरी सुमित बोस वित्त सचिव बनाए जा सकते हैं। गुजराल को दूसरी अहम जिम्मेदारी दी जा सकती है। गार की टीम की विदाई के बाद विदेशी पूंजी प्रवाह बढाने के लिए चिदंबरम क्या क्या गुल ​​खिलाते हैं, यह नजारा तो सामने आने ही वाला है। पर जाते जाते बसु भ्रष्टाचार के मामले में अन्ना ब्रिगेड के प्रति जो समर्थन व्याक्त कर​ ​ गये, उसका तात्पर्य समजना बाकी है। सिविल सोसाइटी और विपक्ष दोनों को ब्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद चिदंबरम को फिर वित्त मंत्री बनाये जाने पर एतराज है। ऐसे में बसु के बयान को गहराई से समझने की जरुरत है।कौशिक बसु ने सिविल सोसायटी की तारीफ की है। कौशिक बसु ने कहा कि ‎भ्रष्टाचार बड़ी समस्या है। और इसके संबंध में सिविल सोसायटी जिस तरह के कदम उठा रही है वह काबिल-ए-तारीफ है।सिविल सोसाइटी की ओर से लोकपाल बिल की तेज होती मांग के बीच मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने कहा है कि देश को भ्रष्टाचार से निपटने के लिए पेशेवर खाका तैयार करने की जरूरत है। बसु का यह बयान तब आया है, जबकि समाजसेवी अन्ना हजारे भ्रष्टाचार से निपटने के लिए प्रभावी लोकपाल लाने की मांग को लेकर अनशन पर बैठे हैं।अपने कार्यकाल के आखिरी दिन पत्रकारों से बातचीत में बसु ने कहा कि वह सिविल सोसाइटी के दबाव के समर्थन में हैं क्योंकि इससे सरकार में शामिल लोगों पर भ्रष्टाचार से निपटने के लिए कदम उठाने का जोर तो पड़ा। लेकिन भ्रष्टाचार से निपटने का खाका तैयार करने के लिए काफी पेशेवर होने की जरूरत है।उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार का पूरी तरह सफाया संभव नहीं है, लेकिन इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है। हमें इसी दिशा में काम करना होगा। बसु ने कहा कि देश में भ्रष्टाचार से खफा समाजसेवियों और लोगों से उन्हें पूरी सहानुभूति है। उन्होंने कहा कि जब आप भ्रष्टाचार रोकने के लिए किसी नौकरशाही को लगाते हैं, तब आप भ्रष्टाचार की एक और संभावना तैयार कर रहे होते हैं।विदेश में जमा काले धन को भारत लाने की संभावना पर उन्होंने कहा कि सरकार को इसे लेकर सावधान रहना होगा क्योंकि बहुत से लोगों ने वैध गतिविधियों के लिए भी विदेशी कंपनियों में पैसा लगाया है। काले धन को लाने के चक्कर में वैध कारोबार प्रभावित नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि आप भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए सावधानी से आगे नहीं बढ़ेंगे तो हो सकता है कि विकास की रफ्तार ही थम जाए।

रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे रक्षा, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा को पाकिस्तान से होने वाले विदेशी निवेश से अलग रखा गया है। पड़ोसी देश से आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रस्तावों को विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड से अनुमति लेनी होगी। भारतीय उद्योग जगत ने फैसले का स्वागत करते हुये कहा कि पाकिस्तान के कारोबारी सीमेंट, कपड़ा और खेलकूद जैसे क्षेत्रों में निवेश की संभावनायें तलाश सकते हैं। वाणिज्य एवं उद्योग मंडल फिक्की महासचिव राजीव कुमार ने कहा, 'यह बड़ा फैसला है।। अब पाकिस्तान को भी भारत को सबसे तरजीही राष्ट्र का दर्जा दे देना चाहिये।'भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने कहा,''पाकिस्तान को भी अब इसी तरह का कदम उठाते हुए भारतीय व्यावसायियों को पाकिस्तान में निवेश की अनुमति देनी चाहिए।'

उठापटक भरे कारोबार में मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में आई तेजी ने बाजार को संभाला। सेंसेक्स 21 अंक चढ़कर 17257 और निफ्टी 11 अंक चढ़कर 5240 पर बंद हुए। छोटे और मझौले शेयरों में 1 फीसदी की मजबूती दिखी।बाजार में उतार-चढ़ाव भरा कारोबार नजर आया। कारोबार के दौरान निफ्टी 5200 के ऊपर बने रहने में कामयाब रहा। कमजोर अंतर्राष्ट्रीय संकेतों की वजह से बाजारों ने गिरावट के साथ शुरुआत की।

दूसरी ओर,बिजली मंत्रालय का काम संभालते ही वीरप्पा मोइली ने भरोसा दिलाया है कि तीनों ग्रिड से बिजली सप्लाई पूरी तरह सामान्य हो गई है और भविष्य में दोबारा ग्रिड फेल नहीं होगा।दुनिया के सबसे बड़े बिजली संकट का सामना करने के बावजूद राज्यों का रवैया बदला नहीं है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली अब भी उत्तरी ग्रिड से अपने कोटे से ज्यादा बिजली ले रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक पंजाब 800 मेगावाट ज्यादा बिजली ले रहा है। सिर्फ पंजाब ही नहीं दूसरे राज्य भी ज्यादा बिजली ले रहे हैं।देश में बिजली की कमी कितनी बड़ी समस्या है, ये बात पावर मंत्रालय आंकड़ों से पता चल सकता है। आंकड़ों के मुताबिक साल 2010-11 में देश भर में 7.25 हजार करोड़ यूनिट यानी कुल जरूरत का 8.5 फीसदी से ज्यादा बिजली की कमी थी। साथ ही, बिजली की जरूरत हर साल 10 फीसदी बढ़ने का अनुमान है।दुनिया के सबसे बड़े ब्लैकआउट से देश को उबारने में बिजली की जगह डीजल ने ली। यही वजह रही कि लगातार दो दिन ग्रिड फेल होने से देश में डीजल की खपत तीन गुना तक बढ़ गई। बिजली की किल्लत से प्रभावित राज्यों में न केवल डीजल की मांग तेजी से बढ़ी बल्कि इस कारण कई पेट्रोल पंप ड्राई भी रहे।

आयात में आई कमी के चलते जून महीने में देश का व्यापार घटा कम हुआ है। आयात में कमी की वजह से ही व्यापार घाटा 15 महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया है। जून में व्यापार घाटा 28.5 फीसदी घटकर 1,030 करोड़ डॉलर हो गया है। वहीं साल 2011 के जून महीने में व्यापार घाटा 1,440 करोड़ डॉलर रहा था।

हालांकि जून महीने में देश का निर्यात घट गया है। यूरोप, अमेरिका में मंदी का असर निर्यात में साफ दिख रहा है। लगातार दूसरे महीने निर्यात में गिरावट आई है। साल 2012 के जून महीने में साल-दर-साल आधार पर निर्यात 5.45 फीसदी घटकर 2,510 करोड़ डॉलर हो गया है। लेकिन अच्छी खबर ये है कि जून में देश का आयात घट गया है। इस साल जून महीने में साल-दर-साल आधार पर आयात 13.5 फीसदी घटकर 3,540 करोड़ डॉलर रहा।

प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने के बाद गृह मंत्री पी. चिदंबरम का दबदबा अधिकार प्राप्त मंत्री समूहों में दबदबा बढ़ गया है। मौजूदा 15 जीओएम और ईजीओएम में से 7 की अगुवाई चिदंबरम कर रहे हैं, जबकि रक्षा मंत्री एके एंटनी 3 ईजीओएम और चार जीओएम के प्रमुख हैं।शरद पवार के इस्तीफे के बाद गृहमंत्री पी चिदंबरम को टेलीकॉम स्पैक्ट्रम के फैसले से जुड़े एंपावर्ड ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स का अध्यक्ष बना दिया गया है। सरकार के इस फैसले का विपक्ष और टीम अन्ना कड़ा विरोध कर रहे हैं। दरअसल टेलीकॉम घोटाले में ही चिदंबरम कोर्ट में घसीटे जा चुके हैं और विपक्ष इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहता।हालांकि दिल्ली की निचली अदालत ने उन्हें क्लीन चिट दे दी थी लेकिन अब ये मामला सुप्रीम कोर्ट में है।

चिदंबरम के खिलाफ याचिका दर्ज करने वाले सुब्रह्मण्यम स्वामी उन्हें ईजीओएम का अध्यक्ष बनाए जाने को सुप्रीम कोर्ट की मर्यादा के खिलाफ बता रहे हैं। दरअसल इस ईजीओएम के अध्यक्ष प्रणब मुखर्जी थे। उनके इस्तीफे के बाद शरद पवार को अध्यक्ष बनाया गया। लेकिन विवादों के डर से पवार ने पद स्वीकार नहीं किया। गुरुवार को दोबारा गठित ईजीओएम में रक्षा मंत्री ए के एंटोनी, टेलिकॉम मंत्री कपिल सिब्बल, सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी, कानून मंत्री सलमान खुर्शीद, प्रधानमंत्री दफ्तर में राज्य मंत्री वी नारायणसामी और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया के नाम शामिल हैं।

चिदंबरम को अध्यक्ष बनाए जाने का सिविल सोसाइटी ने भी विरोध किया है। टीम अन्ना ने चिदंबरम पर हमला बोलते हुए कहा है कि उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गंभीर अपराध का मामला चल रहा है। ऐसे में उन्हें ईजीओएम का अध्यक्ष बनाए जाने का क्या मतलब है।

जुलाई 25  को 6:40 से 7:40 बजे तक टीम अन्‍ना ने मंत्रियों के खिलाफ फेहरिस्‍त में से पिटारा खोला। पहला नाम था प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का। फिर पी चिदंबरम और उनके बाद कपिल सिब्‍बल का।2006-2007 में तत्कालीन कोयला मंत्री श्री शिबू सोरेन जेल चले गए थे। नवंबर 2006 से मई 2009 तक प्रधनमंत्री खुद ही कोयला मंत्री थे। 2009 में श्री प्रकाश जायसवाल कोयला मंत्री बने। देश का सबसे बड़ा कोयला घोटाला 2006-2010 के बीच हुआ। इस दौरान कोयले के ढेरों ब्लॉक आनन-फानन में कौड़ियों के भाव में दे दिए गए। ये कोयले की खानें सिर्फ 100 रूपये प्रति टन की रॉयल्टी के एवज में बांट दी गई।

ऐसा तब किया गया जब कोयले का बाज़ार मूल्य 1800 से 2000 रुपये प्रति टन के मूल्य पर था। 2006 में माइंस और मिनरल एक्ट (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन एक्ट में संशोधन का प्रस्ताव राज्यसभा में लाया गया था। इस संशोधन प्रस्ताव के मुताबिक कोई भी ब्लॉक नीलामी करके ही निजी कंपनियों को दी जा सकती थी। इस कानून को संसद में चार साल तक लंबित रखा गया और जब तक यह कानून संसद में लंबित रहा तब तक कोयले की ढेरों खदानें सरकार ने बिना नीलामी के अपने चहेतों को मुफ्त में दे दी। CAG के अनुमान के मुताबिक इससे देश को कई लाख करोड़ रूपये का घाटा हुआ।

पी. चिदंबरम वित्तमंत्री थे तो उनके अधीनस्थ प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग ने इस देश के सबसे बड़े हवाला व्यापारी हसन अली के मुख्य साथी काशीनाथ तापुरिया के खिलाफ जांच की और 20 हजार करोड़ रूपये की टैक्स चोरी का मामला बनाया। एक तरपफ हमारे वित्त मंत्री श्री पी. चिदंबरम इनकी टैक्स चोरी पकड़ रहे थे और दूसरी तरपफ उनकी धर्मपत्नी नलिनी चिदंबरम, तापुरिया के वकील के तौर पर उसे कलकत्ता हाईकोर्ट में बचाने की कोशिश कर रही थीं। प्रश्न उठता है कि हमारे देश के वित्त मंत्री और गृह मंत्री के बीवी बच्चे हवाला डीलरों और हथियारों के दलालों का इस तरह से संरक्षण करेंगे तो इस देश की सुरक्षा का क्या होगा?

कृषि मंत्री शरद पवार एक ईजीओएम और तीन जीओएम की अगुवाई कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ईजीओएम की संख्या पहले के 12 से घटाकर छह कर दी है। इससे पहले सभी ईजीओएम की अध्यक्षता प्रणब मुखर्जी कर रहे थे।

इसके अलावा जीओएम की संख्या भी अब काफी कम 15 कर दी गई है। इससे पहले इसकी संख्या 27 थी। विभिन्न मामलों पर गठित ईजीओएम और जीओएम की अगुवाई किसी वरिष्ठ मंत्री को दी जाती है। जिन मुद्दोंं पर ईजीओएम को खत्म किया गया है उनमें खाद्य सुरक्षा अधिनियम, राष्ट्रीय राजमार्ग विकास योजना, सेज से जुड़े मुद्दे और तेल विपणन कंपनियों के घाटे को कम करने पर विचार करने के लिए गठित ईजीओएम शामिल थे।

इस समय एंटनी गैस प्राइसिंग, मास रेपिड ट्रांजिट सिस्टम, अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट्स आदि पर गठित ईजीओएम की अगुवाई कर रहे हैं, जबकि चिदंबरम स्पेक्ट्रम आवंटन और केंद्रीय सरकारी इकाइयों के प्रदर्शन पर ईजीओएम की अध्यक्षता कर रहे हैं। शरद पवार को सूखे से निपटने के लिए गठित ईजीओएम का अध्यक्ष बनाया गया है। ईजीओएम के अलावा जिन जीओएम की अगुवाई चिदंबरम कर रहे हैं उनमें नागरिक उड्डयन, प्रसार भारती संबंधी मुद्दे, प्रतिस्पर्धा एक्ट में संशोधन, कोयला नियामक के गठन संबंधी मुद्दे आदि पर बने जीओएम शामिल हैं।

उद्योग मंडल एसोचैम ने दावा किया कि निवेशकों को आकर्षित करने के मामले में गुजरात सबसे अव्वल राज्य के रूप में उभरा है। उसने 16.28 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव हासिल किए।

एसोचैम की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2011 के आखिर तक देश के 20 राज्यों में कुल मिलाकर 120.34 लाख करोड़ रुपये का निवेश हुआ, जिसमें से 13.52 प्रतिशत हिस्सा गुजरात को मिला। इस तरह से गुजरात सबसे अधिक 16.28 लाख करोड़ रुपये मूल्य के सहमति पत्र (एमओयू) हासिल कर सबसे आकर्षक निवेश स्थल के रूप में सामने आया।

एसोचैम गुजरात काउंसिल के चेयरपर्सन भाग्येश सोनेजी ने बताया कि गुजरात में कुल निवेश प्रस्तावों में से 39.2 प्रतिशत बिजली, 24.2 प्रतिशत विनिर्माण, 16.2 प्रतिशत सेवा तथा 14.3 प्रतिशत रीयल एस्टेट में आए। हालांकि इसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि परियोजनाओं के कार्यान्वयन की दर के लिहाज से गुजरात राष्ट्रीय औसत से भी काफी पीछे है।

एसोचैम के महासचिव डीएस रावत ने बताया कि गुजरात में परियोजना कार्यान्वयन की दर 41.9 प्रतिशत है जो 53.9 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। रिपोर्ट में कहा गया है कि झारखंड, गुजरात, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु व मध्य प्रदेश में परियोजना कार्यान्वयन की दर सबसे कम पाई गई है। निवेश आकर्षित करने के लिहाज से पांच शीर्ष राज्यों में गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, ओडिशा व कर्नाटक हैं।

कैसे मनाएं कंधमाल की बरसी

कैसे मनाएं कंधमाल की बरसी

http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/20-2009-09-11-07-46-16/25363-2012-07-31-05-48-42
Tuesday, 31 July 2012 11:17

जॉन दयाल
जनसत्ता 31 जुलाई, 2012: इस साल चौबीस अगस्त को कंधमाल की घटना को चार वर्ष पूरे हो जाएंगे। बंदूकों और कुल्हाड़ी के जरिए यह खूनी तांडव कई हफ्तों तक चलता रहा। तीन हफ्तों तक चली हिंसा की घटनाओं के महीनों बाद भी हिंसा की छिटपुट घटनाएं तीन महीने तक होती रहीं। उपद्रवियों से अपनी जान बचाने के लिए बावन हजार से ज्यादा लोगों को जंगलों में पनाह लेने को मजबूर होना पड़ा। करीब छह हजार घरों को आग के हवाले कर दिया गया, जबकि तीन सौ से ज्यादा धार्मिक स्थल और चर्च द्वारा संचालित संस्थान नष्ट कर दिए गए। साथ ही लगभग सौ लोगों को निर्मम तरीके से मौत के घाट उतार दिया गया, जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं। इस मामले में सिर्फ एक व्यक्ति को दोषी पाया गया। जबकि अन्य मामलों में गंभीर खामियों के साथ की गई जांच और उसकी रिपोर्ट, आतंकित चश्मदीदों के मुकरने और न्यायालय के निष्क्रिय रवैये के चलते मुख्य अपराधी कानून के फंदे से बचने में कामयाब रहे।
सैकड़ों परिवार अब भी बेघर हैं। चर्च की ओर से भारी मदद दिए जाने के बावजूद सैकड़ों घरों का पुनर्निर्माण अभी तक पूरा नहीं हो पाया है, क्योंकि बहुत सारे लोग अब भी पैसा हड़पने की जुगत में लगे हुए हैं। वहीं हजारों बेरोजगार पड़े हुए हैं जबकि सैकड़ों बच्चों को पढ़ाई-लिखाई से हाथ धोना पड़ा और स्थानीय लोगों का अभी अपना कारोबार खड़ा करना बाकी है। मानवीय तौर पर देखा जाए, तो पूरे कंधमाल को मानसिक आघात से बाहर निकलने के लिए चिकित्सकीय और मनोवैज्ञानिक सहयोग की सख्त जरूरत है। उपद्रवियों के खौफ का अंदाजा एक पादरी की इस बात से सहज ही लगाया जा सकता है। उनका कहना है कि ''मुझे आज भी अपने इलाके में वापस लौटने से डर लगता है। मैं अभी तक उस खौफ से उबर नहीं पाया हूं।''
राहत और पुनर्वास कार्यक्रम पर चर्च ने करोड़ों रुपए खर्च किए, लेकिन उनके प्रयासों में तालमेल का अभाव स्पष्ट झलकता है। चर्च ने हिंसा के दौरान पहले महीने से ही शरणार्थियों के भोजन से लेकर आवासीय पुनर्निर्माण के लिए प्रत्येक प्रभावित परिवार को तीस हजार रुपए तक की राशि दी, क्योंकि सरकार की ओर से दी जाने वाली बीस से पचास हजार रुपए की आर्थिक मदद नाकाफी थी। स्थान और आकार के लिहाज से एक घर के पुनर्निर्माण पर सत्तर हजार से एक लाख रुपए तक का खर्च आ रहा था। ज्यादातर मामलों में नष्ट किए गए घर पुनर्निर्माण के तहत बनाए गए घरों से बड़े थे। लेकिन इस पर किसी ने विचार नहीं किया कि इतनी कम रकम में कोई परिवार कैसे घर बना सकेगा और जरूरत की घरेलू चीजें जुटा पाएगा।
भ्रष्टाचार का आरोप वैसे तो किसी चर्च पर  नहीं लगाया जा रहा है लेकिन प्रत्येक चर्च- कैथोलिक, प्रोस्टेंट, इवैजेंलिकल और पेंटीकॉस्ट- को कंधमाल में 2007 से अब तक किए गए खर्च का ब्योरा तैयार करने की जरूरत है। जाहिर है कि आर्थिक मदद मुहैया कराने वाली एजेंसियां और देश और दुनिया भर के उदार चर्च यह उम्मीद करेंगे और जानना चाहेंगे कि उनके दान किए धन से पीड़ितों को कितना लाभ हुआ। यहां प्रार्थना स्थलों के पुनर्निर्माण में सरकारी सहायता बिल्कुल नहीं मिली है। ऐसी स्थिति में भारत में ईसाई समुदाय के खिलाफ हुई इस हिंसा की चौथी बरसी का अवलोकन, प्रार्थना और विरोध के अलावा कैसे किया जाए।
मेरे विचार से न्याय के लिए संघर्ष के रूप में इसका अवलोकन किया जाए। यही सबसे अच्छा तरीका हो सकता है। ओड़िशा ही नहीं, गुजरात जैसे राज्य को भी संवैधानिक सबक सीखने की जरूरत है, जहां वर्ष 2000 में मुसलिम समुदाय का निर्मम जनसंहार हुआ। इसके अलावा, 1984 में सिख समुदाय के खिलाफ दिल्ली समेत देश के तमाम शहरों में भारी रक्तपात हुआ था। सिख वकीलों, सेवानिवृत्त जजों और विधवाओं ने न्याय के लिए लड़ने का हमें उल्लेखनीय सबक सिखाया है। अपने खिलाफ जनसंहार की घटना के दशकों बाद भी उनके उत्साह में रत्ती भर कमी नहीं आई है। उन्होंने अपने जुनून की बदौलत न्याय की लड़ाई में उल्लेखनीय कामयाबी हासिल की है जिसका नतीजा निश्चित रूप से फलदायी रहा।
सिख समुदाय ने दिखा दिया है कि संघर्ष के जरिए उचित राहत और मुआवजा हासिल किया जा सकता है। उन्होंने सिविल सोसायटी के साथ प्रभावशाली संपर्क बनाया, जिसने रक्तपात के जिम्मेदार लोगों को माफी मांगने को मजबूर किया। साथ ही सिख दंगों के लिए जिम्मेदार ताकतवर राजनीतिकों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित कराई है। वहीं मुसलिम समुदाय ने न्याय के लिए नागरिक और राजनीतिक साधनों का प्रयोग किया है और इस तरह सिविल समाज के साथ अपने नेटवर्क की प्रासंगिकता को साबित किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात मामले में कई ऐसे फैसले दिए जिनसे न्याय सुनिश्चित हो सका है। कुल मिला कर उम्मीद है कि राजनेता, पुलिस अफसर और न्यायिक पदों पर बैठे लोग अपराध के लिए जिम्मेदार लोगों की सजा मुकम्मल करेंगे।
कंधमाल मामले

में भी आर्कबिशप राफेल चीनाथ के सुप्रीम कोर्ट जाने पर ही सफलता मिली। कोर्ट के आदेश पर हिंसा प्रभावित जिलों में राहत-कार्य करने पर कलेक्टर कृष्ण कुमार द्वारा ईसाई संगठनों पर लगी रोक हटानी पड़ी। इसके बाद चीनाथ उचित राहत और पुनर्वास की मांग लेकर दोबारा कोर्ट की शरण में पहुंचे।
एक धार्मिक समूह ने कंधमाल जिले में हुई हत्याओं के मामलों की नए सिरे से जांच करने की मांग के साथ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। हम चर्च और पीड़ितों से हत्या के सभी मामलों में दोबारा सुनवाई शुरू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए कहते रहे हैं। क्योंकि त्वरित न्यायालयों की सुनवाई से न्याय की एक तरीके से हत्या ही की गई है।
कंधमाल मामले में सरकार और प्रशासन को साथ मिल कर काम करने की जरूरत है। किसी भी तरह का सहयोग (राशि के रूप में) या दान देने के बजाय जरूरत इस बात की है कि सरकार प्रशासन के जरिए कंधमाल में घरों के पुनर्निर्माण का पूरा खर्च उठाए। बजाय इसके कि अधिकारी मनमर्जी तरीके या अपनी इच्छा से कुछ सीमित आर्थिक राशि देने की घोषणा कर दें। बिना यह जाने कि एक घर के निर्माण में र्इंट, सीमेंट, स्टील, लकड़ी और एस्बेटस या स्टील की चादर की वास्तव में कितनी आवश्यकता हो सकती है।
यह बात हमारे मामलों में भी लागू होती है। यह तो सरकार का काम है कि वह लोगों के लिए रोजगार स्थापित करे। हल्दी और अदरक जैसे स्थानीय कारोबार और स्व सहायता समूहों को दोबारा खड़ा करे। तभी चर्च के राहत-कार्य का टिकाऊ नतीजा निकलेगा और वहां उजड़ चुके लोगों का जीवन फिर से पटरी पर लाया जा सकेगा। इस कड़ी में गुजरात दंगे को लेकर आए फैसले का जिक्र करना बेहद जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने गोधरा कांड के बाद भड़के दंगों में क्षतिग्रस्त किए गए पांच सौ से ज्यादा धार्मिक स्थलों को मुआवजा देने के गुजरात हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। मुआवजा नहीं देने की मोदी सरकार की मांग को गुजरात हाईकोर्ट ने इस साल आठ फरवरी को खारिज कर दिया था। न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की पीठ ने गुजरात सरकार से क्षतिग्रस्त किए गए धार्मिक स्थलों का और उनके पुनर्निर्माण पर आने वाली वास्तविक लागत का विवरण पेश करने को कहा था। इस पर राज्य सरकार ने दलील दी थी कि सार्वजनिक कोष का इस्तेमाल धार्मिक प्रयोजनों के लिए नहीं किया जा सकता।
लेकिन मोदी सरकार यह तर्क पेश करते हुए भूल गई कि उसने कुछ ही साल पहले शबरी कुम्भ पर करोड़ों रुपए बेहिचक दिल खोल कर खर्च किए थे। एक स्वयंसेवी संगठन 'इस्लामिक रिलीफ कमेटी आॅफ गुजरात' की याचिका पर हाईकोर्ट के कार्यवाहक न्यायाधीश भास्कर भट््टाचार्य और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला ने पांच सौ से ज्यादा क्षतिग्रस्त धार्मिक स्थलों को मुआवजा देने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने साथ ही गुजरात के सभी छब्बीस जिलों के न्यायाधीशों को भी यह आदेश दिया कि वे अपने जिले में धार्मिक स्थलों के पुनर्निर्माण से जुड़े मुआवजे के आवेदनों को स्वीकार कर उस पर फैसला करें। उनसे इस संबंध में छह महीने के भीतर अपने फैसले भेजने को कहा गया है। हमें इस दिशा में सक्रिय होने की जरूरत है।
मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन सिख विरोधी दंगें हों या गुजरात जैसे जनसंहार, मीडिया के बड़े हिस्से की भूमिका पर सवाल खड़े होते रहे हैं। सांप्रदायिक दंगों के मामलों में मीडिया के बड़े हिस्से की भूमिका पर प्रेस परिषद से लेकर दूसरी कई स्वतंत्र जांच एजेंसियों ने गंभीर टीका-टिप्पणी की है। कंधमाल की वारदातों के समय भी हमें ऐसा ही देखने को मिला। कंधमाल की बाबत मीडिया की भूमिका पर कई शोध हुए हैं और उनमें धार्मिक दुराग्रह साफ तौर पर चिह्नित हुआ है। हमें इस बात के लिए माहौल बनाना होगा कि मीडिया की भूमिका जब तक धर्मनिरपेक्षता पर आधारित नहीं होगी तब तक लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होने के उसके दावे को सही नहीं माना जा सकता।
कंधमाल के मामले में मुकम्मल न्याय पाने का रास्ता अभी तय करना है। किसी को दान या आर्थिक सहायता देना आसान है, मगर न्याय के लिए संघर्ष करना आसान नहीं। जबकि न्याय की खातिर संघर्ष के जरिए ही किसी समाज के स्वाभिमान और आत्म-विश्वास को जीवित और सक्रिय बनाए रखा जा सकता है।
इस काम के लिए समय, पैसे और एक ऐसी टीम की जरूरत है जिसे हार कतई स्वीकार न हो। कहें कि चार वर्ष पूर्व हमलों के शिकार परिवारों को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष को मिशन मानने वाले कार्यकर्ताओं के एक समूह की जरूरत है। कंधमाल में हुए हमले का असर पूरे समाज पर हुआ है तो संघर्ष के जरिए ही पूरे समाज में ऊर्जा का संचार किया जा सकता है। कंधमाल के पीड़ितों को इंसाफ दिलाने की खातिर ऐसे ही संघर्ष का संकल्प लेने की जरूरत है।
 
 

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ओलंपिक: बैडमिंटन में फिक्सिंग, 8 खिलाड़ी अयोग्य घोषित

ओलंपिक: बैडमिंटन में फिक्सिंग, 8 खिलाड़ी अयोग्य घोषित

Wednesday, 01 August 2012 19:17

लंदन, एक अगस्त (एजेंसी) ओलंपिक बैडमिंटन टूर्नामेंट में मैच फिक्सिंग में शामिल आठ खिलाड़ियों को इन खेलों से अयोग्य घोषित कर दिया गया है। इस मामले की जानकारी रखने वाले वरिष्ठ सूत्र ने आज यह जानकारी दी।
इन खिलाड़ियों में चार दक्षिण कोरिया के तथा इंडानेशिया और चीन की दो . दो खिलाड़ी शामिल हैं। इन्हें विश्व बैडमिंटन महासंघ :डब्ल्यूबीएफ : की अनुशासनात्मक जांच के बाद अयोग्य घोषित किया गया।
इन खिलाड़ियों पर आरोप था उन्होंने पसंदीदा ड्रा हासिल करने के लिये जानबूझकर अपने मैच गंवाये। इसके बाद आरोपों की आज अनुशासनात्मक सुनवाई की गयी।
डब्ल्यूबीएफ ने चीन, दक्षिण कोरिया और इंडोनेशिया की युगल खिलाड़ियों पर मैच जीतने के लिये अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास नहीं करने और खेल के लिये अपमानजनक और हानिकारक रवैया अपनाने के लिये अपनी आचार संहिता के तहत आरोप लगाये थे।
इस मामले में सुनवाई उत्तरी लंदन बैडमिंटन स्थल वेम्बले एरेना के पास स्थित होटल में की गयी। बीडब्ल्यूएफ अधिकारियों ने सबसे पहले दक्षिण कोरियाई खिलाड़ियों से पूछताछ की। इसके बाद चीन और इंडोनेशिया के खिलाड़ियों से पूछताछ की गयी।
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने बैडमिंटन महासंघ को स्वयं इस विवाद से निबटने के लिये कहा था। आईओसी प्रवक्ता मार्क एडम्स ने कहा, ''हमें महासंघ पर पूरा भरोसा है। उन्हें इस तरह के विवादों से निबटने का अनुभव है। ''
दुनिया के चोटी के पुरुष खिलाड़ी और 2004 के ओलंपिक एकल चैंपियन तौफीक हिदायत ने इस स्थिति को 'सर्कस मैच' करार दिया। उन्होंने भी खिलाड़ियों को ओलंपिक से बाहर करने की अपील की थी।
हिदायत ने कहा, ''यदि उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाता है तो मुझे खुशी होगी। मैं जानता हूं कि मैं इंडोनेशिया से हूं और महिला युगल जोड़ी इंडोनेशिया की है लेकिन मैं ऐसा खेल के हित में कह रहा हूं। जो कुछ हुआ वह खेल भावना के अनुकूल नहीं है। ''
इन मैचों पर तब संदेह हुआ जबकि चीनी टीम आसानी से डेनमार्क की टीम से हार गयी थी। उनकी योजना यह थी चीन स्वर्ण और रजत पदक जीते लेकिन यह तभी संभव था जबकि चीनी जोड़ी मैच हारती। इससे उसे सेमीफाइनल से पहले अपनी हमवतन जोड़ी से नहीं भिड़ना पड़ता।
एक अधिकारी ने गोपनीयता की शर्त पर कहा, ''इस तरह की घटनाएं आम हैं लेकिन ओलंपिक जैसी बड़ी प्रतियोगिता में ऐसा नहीं होता है। ''
जिन खिलाड़ियों को बाहर किया गया है उनमें से दो खिलाड़ियों ने जान बूझकर नेट पर सर्विस की या शटलकाक वाइड फेंक दी। ग्रुप चरण के लिये क्वालीफाई कर चुकी दो जोड़ियों ने कमजोर प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ खेलने के लिये ऐसा किया।
चीन की यू यांग और वांग शियाओली और दक्षिण कोरिया के गैर वरीय जुंग क्युंग और किम हा ना के बीच मैच संदेह के घेरे में है। चीनी जोड़ी यह मैच भारी अंतर से हारी।
बाद में दक्षिण कोरिया के तीसरी वरीयता प्राप्त हा जे और किम मिन जुंग ने इंडोनेशिया के मेलियाना जौहरी और पोली ग्रेसिया के बीच मैच की भी बीडब्ल्यूएफ जांच कर रहा है ।
इस बीच चीनी मीडिया ने जानबूझकर ओलंपिक मैच हारने के आरोपों के बाद इन आठों खिलाड़ियों की निंदा की ।
शिन्हुआ न्यूज एजेंसी के अधिकारी ने कहा, ''कोर्ट पर इन चार टीमों में जज्बे की कमी दिखी और इनमें जीत की इच्छा भी नहीं थी। इस तरह का बर्ताव उचित स्पर्धा की ओलंपिक भावना का पूरी तरह से उल्लघंन करता है । ''
चीन की ओलंपिक एथलीटों का यह दूसरा विवाद था क्योंकि 16 वर्षीय तैराक ये शिवेन के 400 मी व्यक्तिगत मेडले में रिकार्ड के साथ स्वर्ण जीतने के बाद डोपिंग का संदेह जताया जा रहा है।


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Date: 2012/7/31
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उस दुनिया का दूसरा सच

by समयांतर डैस्क

शिवानी चोपड़ा

नगरवधुएं अखबार नहीं पढ़तीं: अनिल यादव; पृष्ठ:112; मूल्य : रु. 100 ; अंतिका प्रकाशन

ISBN 9789380044675

nagarvadhuain-akhwar-nahi-padti-anil-yadavकथा अपने समय को भाषा में लिखने का आख्यान है। यही कोशिश इस संग्रह की पहली कहानी में भी की गई है। बनारस जैसे पुराने, परंपरावादी और धार्मिक संस्कृति और ठगी से लैस परिवेश, जिसे कहानी में काशी कहा गया है, की नगरवधुओं के नैरेटिव को प्रस्तुत किया गया है। वे पूरे नगर की वधुएं थीं और आज उन्हें ही नगर से बाहर निकाला जा रहा है। कहानी संग्रह विमर्श के वैचारिक फ्रेमवर्क को तोड़कर सामाजिक यथार्थ को उसके आरपार देखने की कोशिश करता है। स्त्री, दलित, अल्पसंख्यक, अवसरवादी राजनीति और उदारीकरण के दौर में पिछड़ा साधारण आम आदमी जो अलगाव का शिकार होता जा रहा है—इन सभी पर केंद्रित कहानियां इस संग्रह में मिलती हैं।

कहानियों का यह पहला संग्रह लेखक ने तमाम वेश्याओं को समर्पित किया है। इसी से कहानियों में अभिव्यक्त विषयवस्तु का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसका आवरण प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक ने बनाया है, यह चित्र एक खड़े हुए बैल का है, जो अपनी जगह से हिल नहीं सकता। यह बैल अपने ही बोझ से परेशान और त्रस्त, अपने सींग निकाले आक्रमण करने के लिए तैयार है, जो प्रतीक है उस विशाल युद्धरत परिस्थिति का जो टस से मस नहीं हो रही, जिसे बदल पाना अब स्वप्न में भी संभावित नहीं लगता। इस संग्रह में छह कहानियां हैं, जिनके विषय प्रौढ़ और जटिल हैं। आज जब आलोचना के टूल्स ही कथा साहित्य के विषय तय कर रहें हैं तब रचनाकार के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण काम हो जाता है कि वह कैसे विषयों में नयापन रचे जिससे पाठक के मन में कौतुक व जिज्ञासा बनी रहे। लेकिन इस संग्रह की सभी कहानियों में हमारे आसपास लगातार बदल रहे यथार्थ को एक खबरी और खोजी की तरह भेदने की कोशिश की गई है। इनमें विमर्शवाद से आगे बढ़ कर वास्तविकता की त्रासदियों को ह्युमर का टच दिया गया है। कहानी-संग्रह का शीर्षक संग्रह की पहली कहानी 'नगरवधुएं अखबार नहीं पढ़ती' पर आधारित है।

कहानी की शुरुआत फोटो जर्नलिस्ट प्रकाश के दु:स्वप्न से होती है जिसमें एक कैप्शन दिया गया है, यह कहानी को नई तकनीक में ढालता है। ' सैकड़ों नंगी, मरियल, उभरी पसलियों वाली कुलबुलाती औरतें.....' यह दृश्य एक पुराने शहर की अभावग्रस्त व बेहद गरीब वेश्याओं का है। ये वेश्याएं शरीफों के मुहल्लों को खराब कर रहीं हैं, तब वेश्याएं पूछतीं हैं कि हमें बनाने और बसाने वाला कौन है? वेश्यावृत्ति के कलंक को मिटा देने वाले नेताओं, सरकारी किस्म के समाजसुधारकों व महिला एक्टिविस्टों को बेनकाब किया गया है। मंड़ुवाडीह की बस्ती से वेश्यावृत्ति को खत्म करने का उनके पास एक ही उपाय है कि वेश्याएं शहर छोड़ दें, धर्म और संस्कृति की राजधानी में अचनाक कुछ ऐसा बदलाव आया कि सरकार अब इस कलंक को और बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। काशी की पूरी संस्कृति और भाषा में ही विरोधाभास है। इन वेश्याओं की चर्चा करना अखबार में वर्जित है, अगर नाम दिया भी जाता है तो मां या बहन कह कर संबोधित किया जाता है। कहानीकार ने इसे आचार्य चतुरसेन शास्त्री के जमाने की बची हुई जूठन कहा है। 'अपहरण की जगह बलान्नयन, बलात्कार की जगह शील भंग जैसे प्रयोग प्रचलित थे, सूट के नीचे जनेऊ की तरह अखबारों के व्यक्तित्व में ये शब्द छिपे हुए थे।'

आधुनिक और पुरातनपंथी विचारों के घालमेल वाली इस व्यवस्था में सभ्य समाज की खोखली नैतिकता, कानून, राजनीति और धर्म के चरित्र में व्याप्त विरोधाभास वास्तव में रिफलैक्सिव हैं, जो इन संरचनाओं की बनावट में रचे-बसे और बुने हुए हैं। वेश्यावृति अपने आप में एक अपराध या एक समस्या नहीं है, यह इस व्यवस्था की एक संरचना है। ऐसी व्यवस्था जिसमें गुलामी, भेदभाव और कई तरह की असमानताएं हैं , वहां नैतिकता के मिथक गढ़े जाते हैं परंतु असली चेहरा क्रूर और हिंस्र है। इसकी झलक इन कहानियों में भी मिलती है, जैसे- 'नौकरशाही और धर्म का संबंध अरहर और चने के पौधों जैसा अन्योन्याश्रित है।' या... 'धर्म की छतरी के नीचे यहां आधुनिक और पुरातन , वैराग्य और ऐश्वर्य, धंधे और अध्यात्म, सहजता और तिकड़म ईश्वर की उपस्थिति में इस कौशल से आपस में घुल-मिल जाते हैं कि कहीं कोई जोड़ नजर नहीं आता। जो जितने शक्तिशाली और संपन्न दिखते हैं उनकी आत्मा उतनी ही खोखली और असुरक्षित हो जाती है।' एक शहर के भी कई हाशिए होते हैं, ये नगरवधुएं न केवल इसलिए बहिष्कृत हैं क्योंकि ये देह-व्यापार करती हैं, बल्कि इसलिए भी क्योंकि ये अत्यधिक गरीब और लाचार भी हैं। इनके माध्यम से सामाजिक-आर्थिक लेन देन वाले सत्ता संबंधों के जटिल तंत्र को बेपर्दा किया गया है। आज जब यह बताना मुश्किल हो गया है कि कौन असामाजिक है और कौन राजनीतिक, वहां उत्पीडि़त और अभावग्रस्त वर्ग के आंदोलन को कमजोर करना आसान हो जाता है। वेश्याएं शहर से उजाड़े जाने के विरोध में आंदोलन करती हैं पर उन्हें शहर से बाहर पुन:स्थापित करने और देह व्यापार की जगह रोजगार के नए धंधों में लगवाने के सरकारी वादे किए जाते हैं। परंतु वेश्याएं सरकारी संस्थानों के संरक्षण का उपहास उड़ाती हैं, और वापस अपने धंधे पर लौटने की विनती करती हैं।

अखबार की खबर जिन विवरणों को बताने से परहेज करती है, प्रकाश का कैमरा उन्हें देखता है। वेश्याओं के आंदोलन की कोई खबर अखबार में नहीं छप पाती पर वे अपने अनुभव से जानती हैं कि उनका आखिरी हक, उनकी देह भी अब वे नहीं बेच पाएंगी। उनकी जिस बस्ती से पुलिस हफ्ता वसूल करती थी, उसी पर बुलडोजर चलाया जाएगा। सभ्य समाज की ओड़ी हुई नैतिकता तब पूरी तरह से झूठी साबित होती है जब वेश्याएं कहती हैं कि उनके कोठों पर आने वालों में बाप भाई जैसा कोई रिश्ता या सामाजिक दबाव नहीं रहता है, और न ही हिंदू मुसलमान होने का कोई फर्क रहता है। शहर के अंदर कई शहर होते हैं जहां विस्थापन और भूमि अधिग्रहण किया जाता है। पर सारा सूचना तंत्र इस हेर फेर की दास्तान को दफन कर बैंगन के पत्तों पर अल्लाह के हस्ताक्षर, खीरे में से भगवान का निकलना और गणेश जी का दूध पीना जैसी फूहड़ और झूठी खबरें देता है। अखबार और वेश्याएं एक दूसरे से अलग नहीं, दोनों बाजार में बिक रहें हैं, गलत तरीके से और उनका सच या तो अधूरा बताया जाता है या सामने ही नहीं आ पाता।

संग्रह की अन्य कहानियां अपने शिल्प में पहली कहानी से अपेक्षाकृत छोटी हैं। 'दंगा भेजियो मौला' में गरीबी और गंदगी का ऐसा चित्र प्रस्तुत किया है जो बदहाली की सारी सीमाओं को तोड़ देता है। शहर से बाहर गंदे नाले पर बसी उजाड़ बस्ती समाज का वीभत्स यथार्थ है। जिंदगी की ऐसी बदतर स्थिति जहां शायद कोई इसलिए जी रहा है कि जिंदा है। सामुदायिक सौहार्द का लिटमस टैस्ट क्यों फेल हो जाता है, इस विडम्बना का यथार्थ अपने से बड़ी त्रासद स्थिति का खुलासा करता है। जिंदगी बसर करने की स्थिति उस अमानवीय अवस्था में पहुंच गई है कि हिंसा शब्द उसके आगे छोटा जान पड़ता है। दंगा, सांप्रदायिक तनाव और राजनीति इस भीषण स्थिति से निपटने के लिए उपाय के रूप में सामने आते हैं। राजनीति, दंगा, मुसलमान जैसे शब्द समाज में प्रतीक बन गए हैं, इन्हें इसी रूप में देखने का आदी हो चुका समाज वास्तविकता से लगातार दूर होता जा रहा है। साहित्य की संरचना यथार्थ के इस क्रूर चेहरे को पढऩे व अर्थ देने की कोशिश करती है। मोमिनपुरा इलाके का भी कुछ ऐसा ही हाल है जिसकी खबर लेने कोई सरकारी मुलाजिम या राजनेता तभी आता है जब कोई बड़ी राजनितिक खबर बनती है जैसे दंगा या सांप्रदायिक हिंसा जैसी घटनाएं हो जाएं। वहां रहने वाले लोग अपने अनुभव से जानते हैं कि कस्बे की बदहाली को सुधारने का एक ही उपाय है — दंगा। 'दंगा भेजियो मोरे मौला', वरना हम सब इस नर्क में सड़ कर मर जाएंगे। गू-मूत में लिथड़ कर मरने की जिल्लत से बेहतर है कि खून में डूब कर मरें।

'लोक कवि का बिरहा' दलित समुदाय के जीवन से जुड़ी कहानी है। बिरहा गाने वाला लोक कवि रामजनम गांव से शहर जाने, सरल-साधारण जीवन से राजनीति में प्रवेश करने, अभाव से अवसरवाद की ओर जाने की कीमत चुकाता है। वह जीवन के हर अनुभव व अवसर पर बिरहा गा सकता था। उसकी यही कला उसे लोकप्रिय बनाती है और दलित पार्टी की राजनीति में विधायक बनाती है, जहां वह अपमान और अवहेलना सहता है। शहर की चकाचौंध और बाजारूपन उससे गीतों का असली रूप भी छीन लेते हैं। पहले इन गीतों में चिबिल्लापन और हंसी थी, जीवन के हर मौके पर गाए जाते थे- विवाह, बरही, तेरही, गृहप्रवेश, कराहा, यज्ञ, दुकान का उद्घाटन या कोई प्रेम प्रसंग लेकिन अब शहर में बिरहा-लोकगीत राजनीति, विवाद, दंगे, दुर्घटना से लेकर अखबार की खबरों और फिल्मी धुनों का घोल था। जो बिरहा व्यंग्य का, विरोध का और हास्य का प्रतीक था, जिसका स्वरूप अब बदल चुका था। यह कहानी रामजनम के ग्रामीण दलित जीवन के माध्यम से भ्रष्ट राजनीति, सांस्कृतिक बदलाव और उसके वस्तुकरण पर व्यंग्य है।

'लिबास का जादू', 'उस दुनिया को जाती सड़क' और अंतिम कहानी 'आर.जे साहब का रेडियो ' पहली तीन कहानियों की अपेक्षा भिन्न इस अर्थ में हैं कि इनमें सीधे-सीधे अभावग्रस्तता नहीं है, जितना कि संवेदन-शून्यता या सेंसेबिलिटी के विकसित न होने से पैदा होने वाली समस्याओं को दिखाया गया है। नलिन बाजार के माया जाल से अपनी पहचान तय करता है या कहें बाजार ही उसके लिए सब तय कर रहा है और उसकी अपनी स्वतंत्र सोच को घुन की तरह खाए जा रहा है। नीलिमा सामान्य इच्छाओं को पूरा करने का तरीका जानती है, 'मैं इन कमीजों की तरह तुम्हारे साथ सडऩा नहीं चाहती... मैं जीना चाहती हूं' । शहर के उन्मुक्त परिवेश में भी प्रेम के असफल हो जाने की कहानी 'लिबास का जादू' दरअसल वस्तुकरण और बाजार के हावी हो जाने से सेल्फ के विभाजित हो जाने की ओर इशारा करती है।

'उस दुनिया को जाती सड़क', कहानीकार के बचपन, गांव, उसके आसपास के जंगल और कच्ची सड़क की ओर जाने वाली दुनिया है, जो अब लुप्त हो गई है। नब्बे के दशक के पहले की दुनिया और मुक्त बाजार, निजीकरण के दौर की तेज रफ्तार से बदलती दुनिया के फर्क को कहानी में दर्ज किया गया है। इन दो युगों के बीच का अंतर लेखक के अपने अनुभव से जुड़ा हुआ है। बचपन का गांव, मौसी का घर, जंगल और घास की महक, हैंडपंप के हैंडिल का स्वाद- यह सब एक स्मृति में तब्दील हो चुका है। दूसरी ओर बनती हुई सड़क थी, जिसे बचपन में बनते देखा था पर किस तरफ जाएगी यह सड़क? यह एक सवाल था, जो अब भी एक महत्त्वपूर्ण सवाल है कि हम विकास के किस मॉडल को अपनाते हुए अपने बचपन की स्मृतियों से पीछा छुड़ा रहे हैं। क्योंकि अब ... 'नाना का वह गांव अतीत में लुप्त हो चुके किसी ग्रह के अवशेष सा लगता है।'

आर.जे साहब का रेडियो एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में काम करने वाले मुलाजिम के जीवन के खोखलेपन पर केंद्रित है। मध्यवर्ग का एक बड़ा हिस्सा ऐसी ही खोखली और उबाऊ जिंदगी जी रहा है। वे अपने ही शहर के हाशिए पर बसे कस्बे की गंदगी और गरीबी से अनजान हैं। वह अपनी परेशानियों में इतना कैद है कि उसकी संवेदना उस अभावग्रस्त जीवन की मुश्किलों को पहचानना तो दूर एक नजर देखने की कोशिश भी नहीं करते। ऐसा वर्ग नौकरी तरक्की, ट्रांसफर, विदेश यात्रा, बोनस, शेयर मार्किट के उतार-चढ़ाव से लेकर बदलती सरकार और अवैध संबंधों के किस्सों में फंसा रहता है। अचानक एक दिन इस जीवन की ऊब और क्रम को तोड़ते हुए वे शहर के बाहर बसी आबादी की दुनिया में प्रवेश करते हैं। यह आबादी चूहे, कुत्ते और बूचडख़ानों से फैंके छीछड़ खाती है, जो लगातार बढ़ती जा रही है और अब सारे शहर में धुस कर कब्जा कर रही है। पर शहर की खूबसूरती को ध्वस्त करने वाली यह आबादी अपने बहुमत से भय उत्पन्न करती है कि आर.जे साहब जैसे वर्ग की दुनिया मिटती जा रही है। इसलिए जिस घर और नौकरी से वे भागे थे, उस सुरक्षा के घेरे में पुन: लौट जाते हैं, अपनी बीवी व बेटी के पास और पहले की तरह रेडियो सुनने लगते हैं।

वर्चुअल दुनिया, अखबार और रेडियो सूचना के ये सभी तंत्र विस्मृति पैदा करने वाले यंत्र हैं। जो आम समाज के समक्ष सच का पूरा विवरण नहीं देते और काल्पनिक दुनिया के रहस्य और छद्म से सत्ता के भ्रष्ट और झूठे तंत्र को मजबूत करते जाते हैं। वर्चुअल दुनिया में चमक, रोशनी की चकाचौंध और भरपूर संपन्नता और विलास के माया जाल को सच्चाई समझने वाला वर्ग यह भूल जाता है कि यथार्थ का असली चेहरा क्रूर और वीभत्स है जिसे साहित्यकारों का भी एक छोटा भाग अभिव्यक्त करने की दृष्टि रखता है। अलग और नया कहने की दौड़ में जटिल विषयवस्तु को जटिल भाषा या शिल्प से सजाना आवश्यक नहीं। कहानीकार की भाषा शैली कहानी की उम्र को बढ़ाती है। इसलिए लेखक उसे जितना जमीन से और पाठक के मानस से जोड़ेगा, कहानी उतनी ही स्फूर्त, ऐंद्रिय और सफल होगी।

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Fwd: बीजापुर जनसंहार पर सीडीआरओ की रिपोर्ट



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From: reyaz-ul-haque <beingred@gmail.com>
Date: 2012/7/31
Subject: बीजापुर जनसंहार पर सीडीआरओ की रिपोर्ट
To: alok putul <alokputul@gmail.com>


सिरकेगुडम में लोगों की बेरहमी से हत्या की गई। गाँववालों के अनुसार जो लोग गोलियों से नहीं मरे, उन्हें पुलिस ने गाँव से ली गई कुल्हाड़ियों से मार डाला। गाँव के बाहर के बहुत सारे प्रत्यक्षदर्शियों ने यह बताया कि कुछ लोगों के सीने और ललाट पर कुल्हाड़ी से मारे जाने के निशान थे। इस तरह की जानकारी देने वालों में मीडिया के वे लोग भी शामिल थे जिन्होंने लाशों को दफनाए जाने से पहले देखा था।

बीजापुर जनसंहार पर सीडीआरओ की रिपोर्ट



Fwd: ऐ भगत सिंह तू जिंदा है- कबीर कला मंच का एक गीत



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From: reyaz-ul-haque <beingred@gmail.com>
Date: 2012/8/1
Subject: ऐ भगत सिंह तू जिंदा है- कबीर कला मंच का एक गीत
To: alok putul <alokputul@gmail.com>


फिर से कबीर कला मंच का एक गीत. यह गीत सुनेंगे तो शायद समझ में आए कि निजाम में बैठे लोगों के लिए डफली बजा कर गीत गाने वाला यह सांस्कृतिक संगठन इतना खतरनाक क्यों लगने लगा था. कबीर कला मंच ने बाबा साहेब आंबेडकर के विचारों को देश के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन के संदर्भ में देखने का एक रचनात्मक नजरिया पेश किया. वे दलितों की मुक्ति का रास्ता तलाशने में लगे हुए थे कि पिछले साल पुलिस ने उनके कलाकारों के खिलाफ दमन अभियान शुरू किया. तब मंच को भूमिगत हो जाना पड़ा. इसके अधिकतर कलाकार अभी जेल में हैं और फिल्मकारों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों का एक समूह कबीर कला मंच बचाव समिति के तहत उनकी रिहाई की मांग कर रहा है. 

यह गीत लिखा और गाया है शीतल साठे ने.

ऐ भगत सिंह तू जिंदा है हर एक लहू के कतरे में