Sunday, April 1, 2012

अब सिर्फ तीन माह के लिए वैध होंगे चेक, ड्राफ्ट

अब सिर्फ तीन माह के लिए वैध होंगे चेक, ड्राफ्ट

Sunday, 01 April 2012 12:26

नयी दिल्ली, एक अप्रैल (एजेंसी) चेक और ड्राफ्ट अब सिर्फ तीन माह के लिए वैध होंगे। पहले यह समय सीमा छह माह थी। अब जारी करने की तिथि के तीन माह से अधिक के चेक और ड्राफ्ट बैंकों द्वारा स्वीकार नहीं किए जाएंगे। 
भारतीय रिजर्व बैंक ने चेक, बैंक ड्राफ्ट और इसी तरह की अन्य बैंक सुविधाओं की वैधता अवधि घटाकर तीन माह करने की घोषणा की थी। यह आदेश आज से प्रभावी हो गया है।
रिजर्व बैंक ने अपने आदेश में कहा था कि 1 अप्रैल, 2012 से बैंक ऐसे चेक, ड्राफ्ट, पेआर्डर या बैंकर्स चेक का भुगतान नहीं करेंगे, जो जारी करने की तिथि के तीन माह बाद पेश किए जाएंगे। 

केंद्रीय बैंक ने यह निर्देश इन शिकायतों के बाद दिया है कि कुछ लोग छह माह की वैधता सीमा का दुरुपयोग कर रहे हैं और इनका इस्तेमाल नकदी के रूप में कर रहे हैं। एक वरिष्ठ बैंक अधिकारी ने कहा कि केंद्रीय बैंक का यह फैसला पूरी तरह उचित है, क्योंकि चेक या ड्राफ्ट के लिए तीन माह की अवधि पर्याप्त है।


जमीयत के दोनों धड़ों में फिर खिंची तलवारें

http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/1-2009-08-27-03-35-27/15436-2012-04-01-06-06-18

Sunday, 01 April 2012 11:35

सुरेंद्र सिंघल 
देवबंद, 1 अप्रैल। देवबंदी मसलक के मुसलिमों के सामाजिक व मजहबी प्रमुख संगठन जमीयत उलमा-ए-हिंद के दोनों धड़ों के बीच दूरी और तनाव बढ़ने से इस्लामिक शिक्षण संस्था दारुल उलूम पर संकट के बादल फिर मंडरा सकते हैं। मौलाना असद मदनी के निधन के बाद से जमीयत उलमा-ए-हिंद दो धड़ों में बंट गई थी। एक धड़े पर उनके बेटे महमूद मदनी सांसद और दूसरे पर उनके भाई व दारुल उलूम के हदीस के विद्वान मौलाना अरशद मदनी का कब्जा हो गया था। दोनों धड़े गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी समर्थक माने जाने वाले दारुल उलूम के मोहतमिम मौलाना गुलाम मौहम्मद वस्तानवी को संस्था से निकाले जाने के मुद्दे पर जरूर एक हो गए थे लेकिन दारुल उलूम की मजलिसे शूरा (सर्वोच्च अघिकार प्राप्त प्रबंधक समिति) के सदस्य व एयूडीएफ सांसद मौलाना बदरुद्दीन अजमल के मुद्दे पर उनमें तनाव और दूरियां बढ़ गई थीं। मौलाना अरशद मदनी की अगुवाई वाले धड़े के देवबंद में 24-25 मार्च को हुए राष्ट्रीय अधिवेशन के बाद उस समय उनके बीच तनाव पैदा हो गया, जब देवबंद से लौटे सैकड़ों प्रतिनिधियों को दिल्ली जमीयत के दफ्तर मस्जिद अब्दुल नबी में देर रात महमूद मदनी समर्थक लोगों ने वहां से जबरिया निकालने का काम किया। 
इस घटना से गुस्साए मौलाना अरशद मदनी ने 27 मार्च को नई दिल्ली हाई कोर्ट में दो याचिकाएं दायर कीं। एक में महमूद मदनी और उनके करीबी कुछ हामियों के खिलाफ अवमानना का आरोप लगाया तो दूसरे में यह मांग की कि जमीयत के दिल्ली दफ्तर में उन्हें भी सुरक्षा गार्ड आदि नियुक्त करने का अधिकार दिया जाए। अवमानना मामले में मौलाना अरशद ने आरोप लगाया कि महमूद मदनी और उनके पीए मुबस्सिर अंसारी आदि पांच-छह लोगों ने जमीयत कार्यकर्ताओं को कार्यालय के उस हिस्से से बाहर निकालने का काम किया, जिसका स्टे हाई कोर्ट से मिला हुआ है। 
महमूद मदनी धड़े के नियाज अहमद फारुखी ने शनिवार को जनसत्ता को बताया कि हाई कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जीएस सिस्टानी ने अवमानना संबंधी मौलाना अरशद मदनी की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उन्हें दफ्तर परिसर में जिन तीन कमरों के इस्तेमाल का स्टे मिला है, वे उन्हीं का इस्तेमाल कर सकते हैं और वहां उतनी क्षमता के ही मेहमानों को बुला और ठहरा सकते हंै। जबकि 26 मार्च की घटना के रोज वहां दो-तीन सौ लोग जमा हो गए थे। नियाज अहमद फारुखी ने यह भी बताया कि याचिका की दूसरी मांग पर न्यायमूर्ति जीएस सिस्टानी ने महमूद मदनी पक्ष को अपना जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए, जिस पर 14 मई 2012 को मस्जिद नबी के इस्तेमाल प्रकरण पर फैसला देते समय विचार किया जाएगा। जाहिर है इस मुद्दे पर फिलहाल मौलाना अरशद मदनी को मायूसी हाथ लगी है। 

जमीयत के दोनों धड़ों के बीच महमूद मदनी की अगुवाई वाली जमीयत की असम इकाई के अध्यक्ष मौलाना बदरुद्दीन अजमल मुद्दे पर भी तलवारें खिंच गई हैं। पहले देवबंदी मदरसों के राष्ट्रीय अधिवेशन और बाद में जमीयत के अधिवेशन के दौरान मौलाना बदरुद्दीन के खिलाफ आपित्तजनक आठ पेज की पुस्तिका जारी कर उन पर हिंदुओं की मूर्ति पूजा करने और गैर इस्लामिक रीतिरिवाज करने का आरोप लगाया गया। इसका मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने जोरदार खंडन किया। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से उनके खिलाफ की गई इस घिनौनी साजिश की सीबीआई जांच की मांग भी की।  
जमीयत के इन दोनों धड़ों के बीच का तनाव और विवाद अगर जारी रहता है तो दारुल उलूम पर भी इसका असर पड़े बिना नहीं रहेगा। इन हालात से यह भी साफ हो गया कि लोकप्रिय और प्रगतिशील गुजराती मौलाना गुलाम मौहम्मद वस्तानवी को भी एक साजिश के तहत दारुल उलूम के मोहतमिम पद से हटाने का काम किया गया था। अब मौलाना वस्तानवी पक्ष के मजलिसे शूरा के सदस्य मौलाना बदरुद्दीन अजमल भी उन्हें शूरा से हटाने की साजिश की बू इस पूरे विवाद में महसूस कर रहे हैं। लेकिन उनका दावा है कि इस बार उनके विरोधियों की चालें अल्लाह कतई सफल नहीं होने देगा।

असभ्यता का पुनर्पाठ

असभ्यता का पुनर्पाठ

Sunday, 01 April 2012 14:23

मधुकर उपाध्याय 
जनसत्ता 1 अप्रैल, 2012: यह लगभग मान लिया गया है कि जहां कृति होती है, विकृति भी वहीं रहती है। इस अवधारणा के साथ कि दरअसल दोनों में बहुत फासला नहीं होता और अंतर, अगर हो भी तो, बहुत बारीक होता है। अक्सर सिर्फ नजरिए का। जैसे कि विकृति स्वयं कृति हो और फर्क केवल दृष्टि में हो। उसकी स्थापना में नहीं। यानी कि उसके रेशे जब उलझे हुए दिखने लगें तो तात्कालिक रूप से असहज बनाने के बावजूद वे कई बार, और प्राय:, नएपन के दरवाजे खोलने को उद्यत दिखते हैं। यह संभावना बनाते हुए कि चक्रीय जीवनक्रम में एक न एक दिन उन्हें कृति की तरह स्वीकार कर लिया जाएगा। वही नए मानक होंगे। तब तक बने रहेंगे, जब तक कृति और विकृति दोनों अगला कदम बढ़ाने के लिए तैयार न हों। एक साथ। 
उन्हें साथ चलना होता है, हाथ में हाथ डाले, और घूम-फिर कर लौटना होता है। वहीं, जहां से उन्होंने चलना शुरू किया था। उनका साथ होना अनिवार्यता है। तयशुदा हकीकत की तरह कि एक की शिनाख्त के लिए दूसरे का होना जरूरी है। इस हद तक कि एक के गायब होने पर दूसरे की पहचान बिला जाने का खतरा हो। अपना डर, अपना संकोच एक विकट किस्म की आत्मीयता गढ़ता हो। दो निहायत विपरीत ध्रुवों के बीच। नएपन की ललक कृति-विकृति दोनों का स्वागत करने के लिए द्वार खोलती हो और नए संभावना-संसार में उनके दाखिल होते ही खिसक कर किसी अगले दरवाजे के पास जा खड़ी होती हो। अच्छी तरह जानते-समझते कि आज नहीं तो कल, वे आएंगे गलबहियां करते और दस्तक देंगे। 
यह अक्सर चिढ़ की आत्मीयता होती है। करीब-करीब उस तरह प्रगाढ़, जिसके नमूने आमफहम हों और उन्हें ढूंढ़ने के लिए किसी शोध की आवश्यकता न हो। हर जगह फैले-बिखरे। जीवन, समाज, भाषा, सरकार, पक्ष-विपक्ष और जो कुछ भी हमारे आसपास है। लेकिन इससे यह विवशता जन्म नहीं लेती कि उन्हें जस-का-तस स्वीकार कर लिया जाए। मान लिया जाए कि एक के लिए दूसरे को घर में जगह देना मजबूरी है। उनके आपसी रिश्ते जो हों, कृति के साथ खड़ा होना और अगले दरवाजे की ओर बढ़ना वह पुनर्पाठ है, जिसे हर कुछ समय बाद दोहराना होता है ताकि विलोम इतना बड़ा न हो जाए कि स्वयं को कृति घोषित करने की तानाशाही पर उतर आए। सिर्फ इतना डर भी असभ्यता और बर्बरता से लड़ने के लिए पर्याप्त है।
इस पुनर्पाठ की जद्दोजहद के नमूने इतने होंगे कि उन्हें सूचीबद्ध करने की कोशिश कभी कामयाब नहीं हो सकती। ऐसा प्रयास किया भी नहीं जाना चाहिए। इसलिए भी नहीं कि इसकी ऊब कहीं खुद रचनाकर्म से ध्यान न हटा दे। पर इसका विरोध जरूरी है। मकबूल फिदा हुसेन के चित्र हों या एके रामानुजन की तीन सौ रामायण, कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जिनके पक्ष में खड़ा होना अपने पक्ष में खड़ा होना है। उनके विरोध के मूल में सांप्रदायिकता है तो ऐसे मामले भी कम नहीं हैं जहां तथाकथित विकास, सुविधा, जड़ता, अश्लीलता, सतहीपन या कुछ और कृति को लगभग धमकी देने के तेवर में नजर आते हैं। उसे खा जाने को खड़े होते हैं। डस लेने के लिए फन उठाए फुंफकारते हैं। 
विकृति सार्वभौमिक है। हर दौर में, हर जगह उपलब्ध। दुर्भाग्य से उसका अनिवार्य विरोध और चर्चा केवल कुछ ठिकानों पर महदूद होकर रह जाती है। या तब तक नहीं होती जब तक वह इतनी मुखर और चपल न हो जाए कि हमारे घर की सांकल पीटने लगे। छोटी-मोटी विकृतियों को विसंगति मान कर दरकिनार करने की प्रवृत्ति का खमियाजा भुगतने से बेहतर यही होगा कि उसे वहीं देखा, समझा और रोका जाए, जहां से उसे खाद-पानी मिलता है। वहां तफ्तीश करके उन्हें अपेक्षाकृत आसानी से काटा-छांटा जा सकता है। विकास जैसे सर्व-स्वीकार्य तर्क का खोखलापन आसानी से देखा जा सकता है। सुविधा-असुविधा को मामूली फेरबदल से सुलझाया जा सकता है।


>चित्रकार जतीन दास को यह अंदाजा नहीं रहा होगा कि सहूलियत का खेल एक दिन उन्हें धकिया कर भिलाई के उस मुर्गा चौक से बाहर कर देगा, जिसे उन्होंने खुद गढ़ा था। पंद्रह साल पहले जतीन ने भिलाई इस्पात प्राधिकरण के आग्रह पर तीस फुट ऊंचा और तीस फुट के दायरे में फैला एक मुर्गा बनाया था, जो तब तक के अनाम एक गोलंबर का नाम ही बन गया। शहर उसी मुर्गे के किनारे गोल-गोल घूमते अपने घर पहुंच जाता था। कुछ लोग उसे देखने आते थे। रघु राय उसकी फोटो खींचते थे। मुर्गा चौक भिलाई की पहचान बन गया कि शहर की दूरियां वहां से नापी जाने लगीं। अचानक एक दिन किसी को वह बदरंग लगा और आनन-फानन में, कृति और कलाकार की परवाह किए बिना, असंवेदनशील ढंग से उसका नए सिरे से रंग-रोगन कर दिया गया। 
तब तक सहूलियत और विकास का तर्क नहीं था, पर पहुंचने ही वाला था। भिलाई बड़ा हो रहा था और मुर्गा उसे अखरने लगा था। विकृति ने तय पाया कि अब मुर्गा, मुर्गा चौक पर बांग नहीं देगा। वह चिड़िया है और उसे चिड़ियाघर में होना चाहिए। चौराहे पर नहीं। बस, पूरी कृति को एक दिन में उखाड़ दिया गया। 'मैत्री गार्डन' चिड़ियाघर पहुंचा दिया गया। स्थानीय तौर पर अखबारों के स्तर पर थोड़ा-सा विरोध हुआ, पर वह विकृति के इस हमले को रोक पाने के लिए सर्वथा नाकाफी था। वैसे भी बहस में कलाकार के मौलिक अधिकारों का हनन मुद्दा नहीं था। मुर्गा चौक सहूलियत का शिकार हो गया। विकास के नाम पर बलि। गो कि शुरू में अपनी नींद तोड़ने के लिए विकास ने खुद उसे अपने शहर बुलाया था। 
विकास का दंश नर्मदा और टिहरी ने झेला है।   तमाम उन छोटे गांवों और किसानों ने भी, जहां कुछ दिन बाद गंगा और यमुना एक्सप्रेस-वे बनेंगे। उनके अनगिनत छोटे पर अर्थपूर्ण स्मृति चिह्न- चौक-चौबारे, ठीहे, 'हर्रे मामा' और 'बरम बाबा'- अगली पीढ़ी तक स्मृतियों से भी गायब हो जाएंगे। तब उनके पास क्या बचेगा? शायद कुछ नहीं। या शायद कुछ नया, जो उनका अपना नहीं होगा। वे कट चुके होंगे अपने अतीत से। इसलिए भी जतीन दास की कृति पर सुनियोजित हमला खतरनाक है। हुसेन और रामानुजन पर सांप्रदायिक ताकतों के हमले भयावह हैं, पर विकास की विकृति से लड़ना संभवत: उससे अधिक कठिन होगा, क्योंकि उसके पैरोकार 'जनहित' की जमीन पर खड़े दिखते हैं। दावा करते हैं। 
अगर विकास का अनिवार्य अर्थ विस्थापन है तो हम निश्चित तौर पर एक निहायत खतरनाक दौर में दाखिल हो चुके हैं। विकास आपको अचानक तर्कशून्य और संज्ञाशून्य बनाने की कुव्वत रखता है और यह हुआ तो किसी मूर्च्छित व्यक्ति की तरह हमें स्मृतियों से काट कर कहीं भी फेंका जा सकता है। उस वक्त, जब आंखें खुलें और होश आए, बहुत देर हो चुकी होगी और हमारे पास खड़े हो सकने लायक जमीन भी नहीं होगी। लोग चल रहे होंगे, कहीं पहुंचेंगे नहीं। स्मृति रेलगाड़ी की नहीं होती, उसमें यात्रा कर रहे लोगों की होती है। हवाई जहाज सपने नहीं देखता, हमें ही देखने होते हैं। वरना एक दिन विकास होगा, हम नहीं होंगे।
कृति और उसकी स्मृति बची रहे, यह जरूरी है। लेकिन वह बचे कैसे? स्वयं को स्मारकों के रूप में सुरक्षित करके या किताबों के हर्फ  बन कर? गीत-संगीत में? वह तो हर हाल में विकास की विकृति की आंखों में चुभेगी। विकृति को इसकी परवाह नहीं होती, उसके स्मारक नहीं होते। वे दिमाग में, सोच में रहती हैं। उनके लिए भौगोलिक सीमाएं मायने नहीं रखतीं। बल्कि आश्वस्ति का एक भाव रहता है कि उनकी जगह सुनिश्चित है। ठीक इसका उल्टा भी उतना ही सही है, पर पता नहीं क्यों कृति इतना आश्वस्त नहीं होती। कुछ संकोची प्रवृत्ति की। थोड़ा सहमी। किसी आशंकित सवारी की तरह सहयात्रियों को कनखियों से देखती। यह भी पता नहीं होता कि बगल की सवारी उतर जाएगी तो फिर कौन आ बैठेगा वहां।



टाट्रा विवाद: ऋषि को देश छोड़कर जाने पर रोक

टाट्रा विवाद: ऋषि को देश छोड़कर जाने पर रोक

Sunday, 01 April 2012 15:33

नयी दिल्ली, एक अप्रैल (एजेंसी) सीबीआई टाट्रा मामले मे अनिवासी भारतीय व्यापारी रवि ऋषि को देश छोड़कर जाने का एक आदेश जारी किया है।

केन्द्रीय जांच ब्यूरो :सीबीआई: ने सेना के लिए टाट्रा ट्रकों की खरीद में कथित अनियमितताओं के मामले में आरोपी लंदन के अनिवासी भारतीय व्यापारी रवि ऋषि के खिलाफ देश छोड़कर जाने से रोकने का एक आदेश :रेस्ट्रेंट आर्डर: जारी किया है। आधिकारिक सूÞत्रों ने कहा कि सीबीआई ने सभी हवाई अड्डों और बाहर जाने वाले सभी रास्तों पर अलर्ट जारी कर दिया ताकि ऋषि देश से बाहर नहीं जा पायें।
इस संबंध में टिप्पणी के लिए ऋषि उपलब्ध नहीं हो सके लेकिन जब उनकी कंपनी से संपर्क किया गया तो उसने इस मामले में सिर्फ इतना कहा कि वह सीबीआई के साथ सहयोग कर रहे हैं।
सेना के लिए टाट्रा ट्रकों की खरीद में कथित अनियमितता के मामले में सीबीआई की प्राथमिकी में आरोपी बनाये गये 57 वर्षीय ऋषि से सीबीआई ने अब तक दो बार पूछताछ की है और उन्हें फिर से समन किये जाने की संभावना है।

ऋषि ने अपने उच्च्पर लगे आरोपों को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए कहा कि ट्रकों को सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड के जरिये बेचा गया था। 
उन्होंने साथ ही कहा कि सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह द्वारा टाट्रा ट्रकों के संबंध में लगाये गये आरोप बेबुनियाद हैं।
सीबीआई के इस कदम से पहले सेना प्रमुख ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि लेफ्टिनेंट जनरल :सेवानिवृत्त: तेजिंदर सिंह ने उन्हें 'दोयम दर्जे' के ट्रकों की खरीद को हरी झंडी दिखाने के बदले रिश्वत देने की पेशकश की थी।
लेफ्टिनेंट जनरल तेजिंदर सिंह ने आरोपों को खारिज करते हुए सेना प्रमुख तथा कुछ अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया है।
सीबीआई अधिकारी सेना प्रमुख से कुछ और जानकारी मांगेंगे।
सूत्रों ने कहा कि कथित घूस की पेशकश के मामले में सेना प्रमुख द्वारा जल्द ही कुछ और सामग्री उपलब्ध कराने की उम्मीद है।

 

वीके सिंह को जबरन छुट्टी पर भेज देना चाहिए: ब्रजेश मिश्र

वीके सिंह को जबरन छुट्टी पर भेज देना चाहिए: ब्रजेश मिश्र

Sunday, 01 April 2012 12:41

नयी दिल्ली, एक अप्रैल (एजेंसी) पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र  चाहते हैं कि जनरल वीके सिंह को जबरन छुट्टी पर भेजा जाए।

 

थलसेना प्रमुख और सरकार के बीच जारी विवाद के बीच पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र ने घूस के प्रस्ताव संबंधी आरोप पर कोई कार्रवाई नहीं करने के लिए दोनों को जिम्मेदार ठहराया लेकिन वह चाहते हैं कि जनरल वीके सिंह को जबरन छुट्टी पर भेजा जाए।

जनरल सिंह के 14 करोड़ रूपये के घूस देने के प्रस्ताव संबंधी आरोप पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा, ''मेरा नजरिया है कि मंत्री और सेना प्रमुख दोनों कोई कार्रवाई नहीं करने के लिए जिम्मेदार हैं।''
गौरतलब है कि जनरल सिंह ने आरोप लगाया था कि एक अनुबंध को मंजूरी देने के लिए उन्हें 14 करोड़ रूपये की रिश्वत देने की पेशकश की गई जिसके बारे में उन्होंने रक्षा मंत्री को सूचित किया था।
पूछे जाने पर कि क्या सेना प्रमुख को बर्खास्त या उन्हें जबरन छुट्टी पर भेजा जाना चाहिए, मिश्र ने 'डेविल्स एडवोकेट' कार्यक्रम में करन थापर से कहा, ''अगर उनकी बर्खास्तगी हुई तो कुछ और भी हो सकता है। अगर उन्हें अनिवार्य छुट्टी पर भेजा जाता है तो उन्हें बर्खास्त नहीं किया जा रहा है।''

मिश्र ने कहा, ''उनसे कहा जाना चाहिए कि आप सरकारी वेतन पर दो महीने की छुट्टियां बिताइये और फिर वेतन लीजिये और घर जाइये।''
प्रधानमंत्री को लिखे जनरल सिंह के पत्र के लीक होने के बारे में मिश्र ने सेना प्रमुख के करीबी सहयोगियों को जिम्मेदार ठहराने का प्रयास किया।
उन्होंने कहा, ''प्रधानमंत्री जिनका मैं बहुत सम्मान करता हूं, ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो इस तरह का कुछ लीक करें। मैं यह स्वीकार नहीं कर सकता कि प्रधानमंत्री कार्यालय में किसी नौकरशाह ने इसे बाहर दिया हो। इसलिए अगर जनरल ने इस पत्र को खुद लीक नहीं किया है तो हो सकता है कि उनके किसी दोस्त ने ऐसा किया हो।''
जनरल सिंह की थ्री कार्प्स कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल दलबीर सुहाग के खिलाफ सीबीआई जांच कराने की सिफारिश पर उन्होंने कहा कि सेना प्रमुख ऐसा करने के लिए अधिकृत नहीं हैं।

बकरे की अम्मा कब तक खैर मनायेगी? जरा याद करो वित्त मंत्री का बजट भाषण और आंखों में भर लो पानी!

बकरे की अम्मा कब तक खैर मनायेगी? जरा याद करो वित्त मंत्री का बजट भाषण और आंखों में भर लो पानी!

मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

मुंबई में कल से विमान ईंधन का दाम 66,989.74 रुपये से बढ़कर 68,806.82 रुपये प्रति किलोलीटर हो जाएगा। एयरलाइन की परिचालन लागत में जेट फ्यूल की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत बैठती है। विमान ईंधन के दामों में बढ़ोतरी पर तत्काल किसी एयरलाइन से प्रतिक्रिया नहीं ली जा सकी।

बकरे की अम्मा कब तक खैर मनायेगी?जरा याद करो वित्त मंत्री का बजट भाषण और आंखों में भर लो पानी! दयावान होने के लिए क्रूर तो बनना ही होगा, शेक्सपीयर के इन शब्दों का उपयोग वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कठोर वित्तीय फैसलों को नरम तरीके से समझाने के लिए किया। उन्होंने कहा कि कुछ कष्टप्रद नीतिगत फैसले लंबे समय के लिहाज से फायदेमंद रहते हैं।आर्थिक समीक्षा में संकेत दिया गया है कि बचत खातों पर ब्याज दरों को बाजार शक्तियों के हवाले कर दिए जाने से वित्तीय बचत में वृद्धि होगी और मौद्रिक नीति के असर के नीचे तक पहुंचने में मदद मिलेगी। अन्य प्रमुख क्षेत्रों में घरेलू वित्तीय बाजारो की गहराई, विशेषकर कॉरपोरेट बांड बाजार को मजबूत बनाना जरूरी है। नये साल में आपकी आमदनी कितनी बढ़ेगी ये तो पता नहीं, लेकिन महंगाई की मार जरूर बढ़ने वाली है। फोन बिल से लेकर कार तक सब कुछ महंगा हो जाएगा। आज से आपको सर्विस टैक्स यानी सेवा कर 10.3 फीसदी के बजाय 12.36 फीसदी देना होगा।मतलब अगर आप रेस्टोरेंट में खाना खाते हैं या हवाई सफर करते है या फिर सैलून में हेयर कटिंग कराते हैं तो भी आपको पहले के मुकाबले दो फीसदी ज्यादा सर्विस टैक्स देना पड़ेगा।जिस देश की करीब पचास प्रतिशत जनता उसके द्वारा तय किये गये मानकों पर गरीबी रेखा पर या उसके नीचे हो उस देश की आर्थिक नीतियों के बारे में आप क्या कहेंगे?भारत ने वर्ष 2011-12 में भी अपनी राजकोषीय गतिविधियों में कोई बदलाव नहीं लाया। वर्ष 2009-10 के बाद से कर और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का अनुपात बिगड़कर 7 फीसदी के इर्दगिर्द आ गया। कुल राजस्व प्राप्तियों को भी इसी नतीजे से गुजरना पड़ा। कुल खर्च और जीडीपी का अनुपात 15.5 से 16 फीसदी के बीच बना रहा। हालांकि वर्ष 2011-12 के दौरान इसे घटाकर 15 फीसदी के नीचे लाया गया।

नए कारोबारी साल की शुरुआत तकरीबन सभी चीजों के दाम बढ़ने से हो रही है। बजट में बढ़े एक्साइज ड्यूटी और सर्विस टैक्स बढ़ने से खाना-पीना, घूमना-फिरना सब कुछ महंगा होने जा रहा है।पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी का फैसला शनिवार को एक दिन के लिए टाल दिया गया। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां की बैठक में कोई फैसला नहीं होने की वजह से ऐसा किया गया है। इससे पहले अटकलें लगाई जा रही थी कि शनिवार रात से पेट्रोल के दाम में कम से कम 3 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी हो सकती है। लेकिन तेल कंपनियों की पेट्रोल कीमत की समीक्षा बैठक में बढ़ोतरी की घोषणा नहीं की गई। पेट्रोल की बिक्री पर करीब साढ़े सात रुपये प्रति लीटर का घाटा झेल रही तेल कंपनियां दाम बढ़ाने के लिए दबाव बनाए हुए हैं। कड़े आर्थिक निर्णय लेने में सरकार को आ रही दिक्कतों को देखते हुए तेल कंपनियों को पेट्रोल के दाम बढ़ाने पर बार-बार सोचना पड़ रहा है। पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी होती है तो ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के शेयर में तेजी देखी जा सकती है।राजकोषीय घाटा घटाने के लिए टैक्स का बोझ दस्तूर मुताबिक आम झनता पर लाद दिया गया है। जैसे बकरे को घास पानी देकर बलि के लिए तैयार किया जाता है, तरह तरह के करतब दिखाकर प्रणव दादा वह भी कर चुके हैं। हम पहले से कहते रहे हैं कि बजट घाटे में संवेदनशील बताते हुए रक्षा पर होने वाले व्यय की चरचा तक नहीं की जाती। घोटाले दबा दिये जाते हैं। पर इस बार आर्मी चीफ के बेबाक खुलासे से भानुमती का पिटारा ही खुल गया है।सवाल है कि लगातार रक्षा बजट में भारी वृद्धि के बावजूद सुरक्षा तैयारियों में खामियां क्यों रह जाती हैय़ समूता राजनीतिक वर्ग इस सवाल को दबाने और घोटालों को रफा दफा करने में एकजुट है।यानी माहौल ऐसा रहे जिससे देश में आर्थिक सुधार की हवा बहे। इसके लिए राष्ट्रवाद के मायने  बदल चुके हैं। ... और सामरिक नीति के साथ-साथ विदेश नीति भी हथियारों के सौदों पर आ टिकी है। घोटालों में क्तम राजस्व और कालाधन की वापसी की जादुगरी अगर प्रणव बाबू दिखा पाते तो शायद वर्षों उन्हें बिना टैक्स लगाये चैन की नींद नसीब होती। बहरहाल पचानब्वे फीसद बहिष्कृत जनता को इसकी सूचना तक नहीं है कि आखिर उनका गला रेंतने के क्या क्या इंतजाम किये गये हैं। भाजार में ईमानदार लोगों की ऐसी की तैसी हो रही है। फर्जीवाड़ा करने वालों की चांदी कट रही है। सरकारी रियायतें और प्रोत्साहन भी उन्ही के लिए है। छोटे निवेशकों का कोई माई बाप नहीं है। मौजूदा आर्थिक नीतियों के चलते मध्यम व निम्न वर्गीय परिवारों के समक्ष जटिल समस्याएं पैदा कर दी है। रोटी-दाल, चिकित्सा व बच्चों की शिक्षा का ही इंतजाम करने में लोग कर्ज से दबे जा रहे हैं। परिवार के हर सदस्य के खर्चो में कटौती के बाद भी मासिक अर्थ व्यवस्था पटरी पर नहीं लौट रही। ऐसे में आने वाले समय में घर चलाना काफी मुश्किल होगा। यही सोचकर लोगों का सुकून अब छिनने लगा है।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम नेशनल एल्यूमीनियम कंपनी (नालको) में अपनी दस फीसदी और इक्विटी बेचने पर गंभीरता से विचार कर रही है। वित्त राज्यमंत्री एस एस पलानी माणिक्कम ने मंगलवार को राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में यह जानकारी दी। बता दें कि नालको एशिया की सबसे बड़ी एल्यूमीनियम कंपनी है और वेदांता समेत कई निजी कॉरपोरेट समूहों ने इस पर निगाहें गड़ा रखी हैं।कंपनी की 1288.61 करोड़ रुपए की इक्विटी का 87.15 फीसदी हिस्सा अभी भारत सरकार के पास है। उसका पांच रुपए अंकित मूल्य का शेयर विनिवेश की खबर आने के बाद बीएसई में 3.92 फीसदी बढ़कर 55.70 रुपए पर पहुंच गया। दस फीसदी विनिवेश के बाद कंपनी में सरकार की हिस्सेदारी घटकर 77.15 फीसदी रह जाएगी।

इस बीच लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों ने विमान ईंधन एटीएफ के दाम 3 प्रतिशत बढ़ा दिए हैं। इस महीने एटीएफ कीमतों में यह तीसरी वृद्धि है। इससे संकट में फंसी एअऱ इंडिया और दूसरी विमानन कंपनियों कोफिर छूना लगना तय है।इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने कहा कि शनिवार आधी रात से दिल्ली में जेट फ्यूल का दाम 1,850.96 रुपये प्रति किलोलीटर या 2.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ 67,800.30 रुपये प्रति किलोलीटर हो जाएगा। इससे पहले 1 मार्च को एटीएफ का दाम 3.2 प्रतिशत बढ़ाया गया था। वहीं 16 मार्च को कीमतों में 1,298.88 रुपये प्रति किलोलीटर की वृद्धि की गई थी। सोमवार से लोगों को ऑटो और घरेलू ईंधन की कीमतों में एक बार फिर वृद्धि का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि सरकारी तेल विपणन कम्पनियों (ओएमसी) के दबाव के चलते सरकार ईंधन के दामों की समीक्षा शनिवार को की है। शनिवार को कीमत पर फैसला नहीं लिया गया है लेकिन सोमवार को पेट्रोल के दाम बढ़ सकते हैं।कंपनियां इस बारे में बात कर रही हैं कि अगर सरकार उनको होने वाले नुकसान की भरपाई कर दे तो वो पेट्रोल के दाम नहीं बढ़ाएंगी।सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को पेट्रोल की प्रति लीटर बिक्री पर होने वाला नुकसान 7.65 रुपये पर पहुंच गया है। बहरहाल, सरकार की तरफ से शुल्क में कमी और सब्सिडी मुआवजा के बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं होने की वजह से कंपनियां असमंजस में हैं।

एक प्रमुख पेट्रोलियम कंपनी के अधिकारी ने कहा कि हमें पेट्रोल पर प्रति लीटर 7.65 रुपये का नुकसान हो रहा है। इसमें 20 प्रतिशत का बिक्रीकर जोड़ने के बाद दिल्ली में पेट्रोल के दाम 9.18 रुपये प्रति लीटर बढ़ाने की जरूरत होगी।

सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों ने सरकार से कहा है कि यदि वह खुदरा मूल्य में बढ़ोतरी नहीं चाहती है, तो उसे नुकसान की भरपाई करनी चाहिए। साथ ही कंपनियों ने पेट्रोल पर 14.35 रुपये प्रति लीटर के उत्पाद शुल्क में कटौती की मांग की है।

अधिकारी ने कहा कि हमने सरकार को साफ कर दिया है कि यदि इन मांगों को पूरा नहीं किया जाता है तो हमारे पास पेट्रोल के दाम बढ़ाने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचेगा। इंडियन आयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम प्रत्येक पखवाड़े खुदरा कीमतों की समीक्षा करती हैं। तेल कंपनियां संभवत: रविवार को कीमतों की समीक्षा करेंगी। पेट्रोल कीमतों में दिसंबर में आखिरी संशोधन के समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम 109 डॉलर प्रति बैरल थे, जो इस समय 134 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच चुके हैं। पेट्रोलियम कंपनियों ने एक दिसंबर को पेट्रोल कीमतों में 0.78 रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी। दिल्ली में आईओसी के पेट्रोल पंप पर फिलहाल पेट्रोल का दाम 65.64 रुपये प्रति लीटर है। बीपीसीएल और एचपीसीएल के पंपों पर कीमतों में कुछ पैसे का अंतर है।

चालू वित्त वर्ष के बजट में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने करों की दर और दायरा बढ़ाकर आम लोगों पर करीब 45,000 करोड़ रुपये के टैक्स का बोझ लादा है। उत्पाद शुल्क की दर को 10 से 12 प्रतिशत करने का असर बाजार में उपलब्ध तमाम उत्पादों पर होगा। सीमेंट, ब्रांडेड रेडिमेड गारमेंट से लेकर सोना और रत्‍‌नाभूषण सभी चीजों की कीमतों में वृद्धि होगी।


आज से आपका फोन पर बातचीत करना भी महंगा हो जाएगा, क्योंकि फोन बिल पर लगने वाला सर्विस टैक्स भी अब 12.36 फीसदी हो गया है. मतलब साफ है कि आपकी जेब पर अब और तेजी से चलेगी महंगाई की कैंची।

ट्रेन में जनरल, स्लीपर और एसी थर्ड क्लास से सफर करने वाले यात्री भले ही किराया बढ़ोतरी के बोझ से बचकर राहत महसूस रहे हैं, लेकिन एसी सेकेंड क्लास और एससी फर्स्ट क्लास के मुसाफिरों पर पड़ने लगी है दोहरी मार।

एक तरफ एसी फर्स्ट में 30 पैसे प्रति किलोमीटर और एसी सेकेंड में 15 पैसे प्रति किलोमीटर किराया बढ़ाय़ा गया है तो दूसरी तरफ बढ़े हुए किराए पर 3.6 फीसदी का सर्विस टैक्स देना होगा।

ट्रेन ही नहीं, हवाई यात्रियों पर भी दोहरी मार पडेगी. हवाई सफर पर बढ़ा हुआ सर्विस टैक्स तो लागू हो ही चुका है अब आने वाले दिनों में किराया भी बढ़ना तय है क्योंकि हवाईजहाज का ईंधन शनिवार से तीन फीसदी महंगा हो गया है।

ज़ाहिर है कि ईंधन के इस बढ़े दाम का बोझ भी तमाम एयरलाइन्स हमेशा की तरह मुसाफिरों पर ही थोपेंगी. पिछले एक महीने में एटीएफ के दाम बढ़ाए जाने का ये तीसरा मौका है।

अगर आप गर्मी से बचने के लिए आज एसी, फ्रिज, या कपड़े धोने के लिए वॉशिंग मशीन और आरामदायक सफर के लिए कार खरीदने की सोच रहे हैं तब भी आप को बजट के चाबुक की मार महसूस होगी क्योंकि वित्त मंत्री ने इस बार एक्साइज ड्यूटी में दो फीसदी बढ़ोतरी कर दी है।

बढ़ा हुआ सर्विस टैक्स भी उपभोक्ताओं पर भारी पड़ रहा है। अब इसके दायरे में उन क्षेत्रों की सरकारी सेवाएं भी जुड़ रही हैं, जहां वे निजी क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। इसके तहत रेल में एसी फर्स्ट क्लास और एसी सेकेंड क्लास में यात्रा करने वाले यात्रियों को रविवार से ज्यादा किराया देना होगा। साथ ही प्लेटफॉर्म टिकटों के लिए भी 3 रुपये की बजाए 5 रुपये देने होंगे। संशोधित किराये के अनुसार एसी टू टियर के किराए में 15 पैसे प्रति किलोमीटर और एसी फर्स्ट क्लास के किराए में 30 पैसे प्रति किलोमीटर की वृद्धि हो गई है।  

हालांकि, सरकारी तेल कंपनियों ने शनिवार को पेट्रोल की कीमत बढ़ाने का फैसला टाल दिया है, लेकिन कंपनियों ने इसके लिए सरकार पर दबाव बना रखा है। तेल कंपनियों को पेट्रोल की प्रति लीटर बिक्री पर होने वाला नुकसान 7.65 रुपये पर पहुंच गया है। बहरहाल, सरकार की तरफ से शुल्क में कमी और सब्सिडी मुआवजा के बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं होने की वजह से कंपनियां असमंजस में हैं। एक प्रमुख पेट्रोलियम कंपनी के अधिकारी ने कहा कि हमें पेट्रोल पर प्रति लीटर 7.65 रुपये का नुकसान हो रहा है। इसमें 20 प्रतिशत का बिक्रीकर जोड़ने के बाद दिल्ली में पेट्रोल के दाम 9.18 रुपये प्रति लीटर बढ़ाने की जरूरत होगी। सरकारी तेल कंपनियों ने सरकार से कहा है कि अगर वह खुदरा मूल्य में बढ़ोतरी नहीं चाहती है, तो उसे नुकसान की भरपाई करनी चाहिए। साथ ही कंपनियों ने पेट्रोल पर 14.35 रुपये प्रति लीटर के उत्पाद शुल्क में कटौती की मांग की है।

चेक और ड्राफ्ट अब सिर्फ तीन माह के लिए वैध होंगे. पहले यह समय सीमा छह माह थी।अब जारी करने की तिथि के तीन माह से अधिक के चेक और ड्राफ्ट बैंकों द्वारा स्वीकार नहीं किए जाएंगे।भारतीय रिजर्व बैंक ने चेक, बैंक ड्राफ्ट और इसी तरह की अन्य बैंक सुविधाओं की वैधता अवधि घटाकर तीन माह करने की घोषणा की थी. यह आदेश आज से प्रभावी हो गया है।रिजर्व बैंक ने अपने आदेश में कहा था कि 1 अप्रैल, 2012 से बैंक ऐसे चेक, ड्राफ्ट, पेआर्डर या बैंकर्स चेक का भुगतान नहीं करेंगे, जो जारी करने की तिथि के तीन माह बाद पेश किए जाएंगे।

रविवार से क्या हुआ महंगा
-यात्रा, घूमना-फिरना, खाना-पीना होगा महंगा -
एसी-1, एसी-2 के यात्रियों को चुकाना होगा ज्यादा किराया
-प्लेटफॉर्म टिकटों के लिए 3 रुपये की बजाय 5 रुपये देने होंगे -
बिजली, जमीन, फ्लैट और बाइक व कार के लिए चुकाने होंगे ज्यादा पैसे -
सोना, प्लेटिनम खरीदना होगा महंगा -ब्रांडेड कपड़े और शराब होगी महंगी -
लाइफ इंश्योरेंस के साथ मोटर इंश्योरेस होगा महंगा  
और क्या आया बदलाव
चेक, ड्राफ्ट और पे-ऑर्डर की वैधता 6 महीने से घटकर 3 महीने रह जाएगी
-पोस्ट ऑफिस डिपॉजिट, पब्लिक प्रॉविडेंट फंड, नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट जैसी बचत स्कीमों में निवेश पर ज्यादा मिलेगा ब्याज

वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि मुद्रास्फीति छह से सात प्रतिशत के दायरे में रह सकती है इससे कम नहीं।उन्होंने कहा कि यदि मुद्रास्फीतिक धारणा इससे कम रहती है तो अर्थव्यवस्था में सुस्ती आ सकती है और आर्थिक वृद्धि पर इसका असर होगा।

वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि मुद्रास्फीति में हाल के दिनों में नरमी आई है और रिजर्व बैंक द्वारा मौद्रिक नीति तैयार करते समय इसपर गौर किया जाएगा। उन्होंने कहा कि मुझे उम्मीद है कि रिजर्व बैंक मौद्रिक नीतिगत दरों पर निर्णय लेते समय इसे ध्यान में रखेगा।

फरवरी 2012 में थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति 6.95 प्रतिशत रही थी जबकि इससे पिछले महीने जनवरी में यह 6.55 प्रतिशत थी।

वित्त मंत्री ने कहा कि वर्ष 2012-13 का बजट राजकोषीय मजबूती, मुद्रास्फीति में नरमी और देश को फिर च्े उच्च आर्थिक वृद्धि के रास्ते पर लाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। मुखर्जी ने माना कि वह बजट में कोई ठोस घोषणा नहीं कर पाए। इसके लिए उन्होंने सत्ता पक्ष के समीकरणों की तरफ इशारा किया। उन्होंने कहा कि आपके पास शासन करने का अधिकार तो है, लेकिन आपको दूसरों को भी अपने साथ रखना होगा। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए ही मुझे बजट प्रस्ताव रखने पड़े।

सब्सिडी पर उन्होंने कहा कि हमें इसमें चयन करना होगा। खाद्य सब्सिडी हमें देनी होगी लेकिन अन्य क्षेत्रों में हमें अपनी भुगतान क्षमता के अनुसार कदम उठाना होगा। अगले वर्ष के दौरान सब्सिडी को जीडीपी के दो प्रतिशत पर रखने का फैसला किया गया है।

Fwd: Manual scavenging documentary-Erode District



---------- Forwarded message ----------
From: Shiva Shankar <sshankar@cmi.ac.in>
Date: Sun, Apr 1, 2012 at 10:05 AM
Subject: Manual scavenging documentary-Erode District
To:



---------- Forwarded message ----------
Date: Wed, 28 Mar 2012 12:30:39 +0530
From: Karuppu Samy <ksamy2005@gmail.com>
Subject: Manual scavenging documentary film -Erode.District

Dear Friends,

Greetings from Rights Education and Development Centre (READ)!

As you know, we are working for eradication of manual scavenging in Erode district.

We did a data base of 146 manual scavengers, they are cleaning human excreta.

Also recently we did a video document on this.

This video and our appeal we submitted to Erode district adminstration.

Also, we concentrate on Scavengers' children education, health, housing, entitlements.

Therefore let us together end caste based occupation and protect human rights and dignity.

So we share this video with you.

Video web link :

http://youtu.be/Nyb94PUiSHk

Thanks and regards

R.Karuppusamy


http://youtu.be/Nyb94PUiSHk

 Rights education and development centre-READ
 27/1.Muniyappar.Street,Rangasamuthiram,
 Sathyamangalam.638402,Erode.District
 Tamilnadu,Tele.+91-4295-224313,mobile+91-9842090035
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